आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः १९१
भेदोऽपि विकल्पाकार, न तु बाह्य इति चेत्, यद्यसन्ने-
वासौ, कथं विकल्पाकारः ? तदाकारश्चेत्, कथमसन्निति
परिभावय ।
अस्तु तर्हि सन्नेवेति चेत्, नन्वद्वयदर्शि चेद् विज्ञानम्
कथं भेदप्रथा ? आकारद्वयदर्शि चेत्, कथमेकं सद्द्वयात्मकम् ?
चित्राकारमिति चेत्, चित्रमेकमनेकं वेति विकल्पगलितमेव
नीलादिमें ग्राह्य-ग्राहकभाव नहीं चाहता । इस प्रकार अरुचिरोगसे
ग्रस्त इस वादीकी रुचि दूध छोड़कर सौवीर¹ (कांजी) में ही हो
रही है ।
यदि कहो कि—नील-पीतादिका भेद तथा स्वयं नील-पीतादि भी
सविकल्पकद्वारा भासित तो होता है किन्तु वह भी विकल्पका ही आकार
है, न कि उससे भिन्न बाह्य वस्तु है—तो यदि वह भेद असत् ही है
तो वह सत्रूप विकल्पका आकार कैसे हो सकता है ? यदि वह
विकल्पका आकार है तो वह असत् कैसे हो सकता है ?