आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः १८५
कुतो विवेचनम् ? नानापुरुषापेक्षयाऽपि सन्दिग्धम् । परेण
परस्यावेदनात् क्व सन्देह इति चेत्, अभेदेनैव तत्त्वविवेचनं
साध्यम्, तथा च किं तेनोपन्यस्तेन
तज्जातीयस्य तु बाह्यवद् विज्ञानस्यापि विवेचनमेवेति ।
सहोपलम्भ होगा, उसी नील-पीतका उसी क्षणमें दूसरे पुरुषके द्वारा
विवेचन ( भेदज्ञान ) हो सकता है—तो भी "अन्य पुरुषद्वारा उस
क्षणमें नील-पीतका विवेचन हुआ ही" ऐसा निश्चय नहीं होनेसे सन्देहा-
स्पद है । और सन्देहात्मक विवेचन तो ज्ञानके सम्बन्धमे भी कहा
जा सकता है । क्योंकि नील-पीतादि बाह्यके समान ही एक साथ
उपलब्ध होनेवाले नील और उसके ज्ञानमे भी अन्य पुरुषद्वारा विवेचन
हो सकता है ।
यदि कहें कि—अन्यसे अन्यका ज्ञान नहीं हो सकनेसे ज्ञानमे
विषयसे विवेचन ( भिन्नत्व ) का सन्देह भी कैसे हो सकता है ? एव
ज्ञान यदि अपने विषयसे भिन्न होता तो वह ज्ञान उस विषयका प्रकाशक
ही नहीं होता । क्योंकि परस्पर भिन्नमे प्रकाश्यप्रकाशकभाव माननेमे
अश्व भी गौका प्रकाशक होने लगेगा । अतः प्रकाश्यप्रकाशकभाव होनेके
कारण विषय और ज्ञानमे कथमपि विवेचन ( भिन्नत्व ) का सन्देह भी
नहीं हो सकता है—तो आप अभेदके द्वारा ही नीलविषय और उसके
ज्ञानमे अविवेचन सिद्ध करेंगे । ऐसी स्थितिमे ज्ञानका अपने ग्राह्य-
विषयके साथ अभेद सिद्ध करनेके लिये विवेचनानुपपत्तिका हेतु बनानेसे
भी क्या लाभ होगा ? अर्थात् ज्ञान और विषयमे पहले विवेचनानुपपत्ति
सिद्ध हो तो अभेद सिद्ध होगा और पहले अभेद सिद्ध हो जाय तो
अविवेचन सिद्ध हो । इस प्रकार अन्योन्याश्रयदोष होनेसे ज्ञान और
विषयका अभेद और अविवेचन नहीं सिद्ध हो सकेगा ।
यदि कहें कि—क्षणिक होनेके कारण भेदज्ञान होनेके कालमे नष्ट
हो जानेसे एकसाथ उपलब्ध हुए नीलव्यक्ति और पीतव्यक्तिका उस पुरुष
द्वारा परस्पर विवेचन ( भेदग्रह ) भले मत हो, फिर भी "नीलजातीय
पीतजातीयसे भिन्न है" इस प्रकारसे बाह्यवस्तुका विवेचन तो उस पुरुष
द्वारा हो सकता है—तो इस प्रकारसे विवेचन विज्ञानका भी हो ही