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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 530 में से

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पृष्ठ 232

[Header] बाह्यार्थभङ्गवादः १८३

पीतत्वेन पीतस्यैव नीलत्वेनानुपलम्भम् । स एव मूलं सर्वविरो-
धानाम् । अन्यथोपलम्भानुपलम्भयोरप्यसिद्धिरेव ।
यदपि नोपलभ्यत इत्युच्यते तदप्युपलभ्यत एव । यदि-
दमश्वादिकमुपलभ्यते तन्नोपलभ्यत इत्युक्त्यैव निर्वृत्तेः । तेना-
त्मना नोपलभ्यत इति चेत् , तत् किं सहोपलम्भेऽपि नीला-
त्मना पीतमुपलभ्यते यतो न विरोधः स्यात् ?

नहीं होता, इसे ही हम असांकर्य कहते हैं। और यही असांकर्य सभी
विरोधोंका ( बाह्य वस्तुओंके विरोधका और ज्ञानके भी विरोधका )
मूल है ।
यदि केवल सहोपलम्भके कारण अविरोध होगा तो उपलम्भ और
अनुपलम्भमें भी विरोधकी सिद्धि नहीं हो सकेगी । क्योंकि उपलम्भ
और अनुपलम्भकी भी एक साथ प्रतीति होती है । क्योंकि जो गवादिकी
अनुपलब्धि कही जाती है, वह भी एक प्रकारसे उपलब्धि ही है । कारण,
जो यह अश्वादिकी उपलब्धि है, उसे ही हम गवादिकी अनुपलब्धि
कहकर अभिव्यक्त करते हैं । अथवा जो अश्वादिकी उपलब्धि कही
जाती है, वह भी एक प्रकारसे अनुपलब्धि ही है । क्योंकि गवादिकी
अनुपलब्धिको ही हम अश्वादि-उपलब्धिशब्दसे अभिव्यक्त करते हैं ।
इस प्रकार सहप्रतीतिके कारण उपलम्भ और अनुपलम्भ भी परस्पर
अविरोधी होने लगेंगे ।
यदि कहें कि—उपलम्भ और अनुपलम्भमें अविरोधका प्रसङ्ग देना
तब समुचित होता, जब कि जिसरूपसे अश्वकी उपलब्धि होती है,
उसीरूपसे उसकी अनुपलब्धि भी होती, किन्तु ऐसा न होकर अश्वत्व-
रूपसे अश्वकी उपलब्धि होती है और गोत्वरूपसे उसकी अनुपलब्धि
होती है । अतः उक्त विभिन्न प्रकारसे उपलम्भ और अनुपलम्भकी
सहप्रतीति दिखलाकर उसमें विरोधकी असिद्धि नहीं कही जा सकती
है । अर्थात् एक ही रूपसे उपलम्भ और अनुपलम्भ दोनोंके होनेमें
परस्पर विरोध होगा ही—तो क्या नील और पीतका साथ-साथ उपलम्भ
होनेपर भी नीलरूपसे पीत उपलब्ध होता है कि उनमें परस्पर
विरोध न हो ?