आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः १८९
प्रवृत्तोऽसि किमर्थं च ? अन्वयव्यतिरेकाप्रतीतौ किं च हेतो-
र्बलम् ? कुतश्च विप्रतिपत्तिः कीदृशे चेति ? सोऽयं विचार-
मारभते, भेदं तु सांप्रतमपि नेच्छति, नूनमुन्मत्तोऽप्यनेन
जितः ।
विकल्पारूढ एव भेदो व्यवहाराङ्गं नानुभवारूढ इति
चेत्, सोऽपि सत्योऽसत्यो वा भासते न वेति विकल्पान्
नातिवर्तते ।
एवं भेदके अस्फुरणसे पक्ष, साध्य, हेतु, दृष्टान्त आदिका विभाग
नहीं हो सकनेसे अनुमानकी प्रवृत्ति भी कैसे हो सकेगी ? एवं किसे
जनानेके लिये अनुमानमे प्रवृत्त हुए हो ? क्योंकि तुम्हारे मतमे वादि-
प्रतिवादीमे भी भेद नहीं है । एवं तत्त्वनिर्णय विजय आदि उद्देश्योंके
असत् होनेसे किस प्रयोजनके लिये अनुमानमे प्रवृत्ति होगी ?
एवं भेदके अभावमे अन्वय-व्यतिरेककी भी प्रतीति नहीं हो सकनेसे
पक्षसत्त्व विपक्षव्यावृत्तत्व आदि हेतुका बल भी कैसे हो सकेगा ? एवं
विचार प्रवर्तक विप्रतिपत्ति भी कैसे हो सकेगी ? क्योंकि भेदके बिना
प्रतीतियोंमे भी विरोध नहीं हो सकेगा । विरुद्धा प्रतिपत्ति ही तो विप्रति-
पत्ति कहाती है । साथ ही भेदके अभावमे विप्रतिपत्तिके विषय भी
क्या होंगे ? इस प्रकार यह वादी विचार तो प्रारम्भ करता है किन्तु
विचारके लिये अपेक्षित भेद को प्रतीयमान भी नहीं मानना चाहता
है । निश्चित ही, इसने नैयायिकको कौन कहे उन्मत्तको भी जीत
लिया है ।
यदि कहो कि—सविकल्पकज्ञानका विषय (काल्पनिक) जो भेद,
वही पूर्वोक्त विविध व्यवहारोंके लिये अपेक्षित है । इसलिये व्यवहारों
की उपपत्तिके लिये भेदको निर्विकल्पकज्ञानका विषय (पारमार्थिक)
माननेकी आवश्यकता नहीं है—तो वह सविकल्पकज्ञान का विषयभेद
भी सत्य है या असत्य है ? तथा भासित होता है या नहीं भासित होता,
इत्यादि विकल्पोंसे नहीं बच सकता है । अर्थात् भेद यदि सत्य है और
भासित होता है तो हमारा ही अभीष्ट सिद्ध हुआ । सत्य भी भेद यदि