अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
अध्याय-दस
उपसंहार
अशफाक उल्ला खाँ का जीवन साम्प्रदायिक एकता और देश को
स्वतंत्र करने की मानसिकता में बीता। यही कारण था कि वे एक आदर्श
युवा की भाँति युवाओं में प्रेरणा के स्तम्भ बने रहे। अशफाक के बलिदान
के बाद तमाम प्रतिक्रियाएं हुईं और अशफाक की भरपूर सूचना ली गयी।
वे मिसाल बन गये। यह बात और है कि अशफाक की फाँसी से युवा
वर्ग निराश जरूर हुआ लेकिन वहीं वह ऊर्जा को भरकर नये भारत की
कल्पना में आ गया।
क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा से निराशा व क्षोभ तो हुआ और
इसे बनारस से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र ने जनता की इस
असहाय स्थिति पर खेद भी प्रकट किया। इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका
'चाँद' (नवम्बर 1928) अंक फाँसी विशेषांक के रूप में निकला।¹
अखिल भारतीय कांग्रेस ने अपने अधिवेशन में सरकार की तीव्र
आलोचना की कि उसने जनता की भावनाओं की उपेक्षा करके
क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा दी। क्रांतिकारियों के परिवार के प्रति
कांग्रेस ने अपनी सहानुभूति प्रदान की।²
अशफाक उल्ला खाँ अपने खानदान पर लगे दाग धो देना चाहते
थे और उन्होंने अपने कृतित्व से यह दाग धो भी डाला। अशफाक का
प्रारम्भिक जीवन सिर्फ खेलकूद में ही नहीं वरन् देश की चिन्ता और आम
लोगों को शोषण से निजात दिलाने के वैचारिक मंथन में बीता। वे हमेशा
धीर-गम्भीर बने रहते और कभी अपनी सुन्दरता और देह बल का
अभिमान न करते।
1.स्वतंत्रता आन्दोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान-डॉ०एन.सी.मेहरोत्रा पृष्ठ144
2.दि हिस्ट्री ऑफ दि इंडियन नेशनल काँग्रेस, भाग-एक-पृष्ठ 540, पट्टाभि
सीतारमैया
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हाँ इतना अवश्य था कि उन्हें अपने बल पर विश्वास था। खुद के
विचारों में स्वस्थ मानसिकता बना लेना अशफाक की खूबी थी। देश के
सशस्त्र क्रांति के प्रयास में अपने जीवन की आहुति देने वाले अशफाक
उल्ला खाँ ने जब क्रांतिकारी आन्दोलन में प्रवेश किया तो वे छात्र ही थे।
फाँसी के समय उनकी उम्र मात्र 27 वर्ष की थी। अशफाक का क्रांतिकारी
जीवन लगभग सात वर्ष का रहा और इतने ही अल्पकाल में वे देश की
राजनीति और समाज की धड़कन से परिचित हो गये थे। अशफाक उल्ला
खाँ सिर्फ एक सिपाही ही नहीं थे कि लड़े और मृत्यु को प्राप्त हो गये।
वे हमारे समय के क्रांतिकारियों में प्रखर चिन्तक के रूप में भी हमारे बीच
उपस्थित होते हैं। उनकी कविताएँ एवं उनके वैचारिक लेख और राष्ट्र के
नाम संदेश तथा उनके द्वारा लिखे गये पत्रों से स्पष्ट हो जाता है कि वे
किस हद तक वैचारिक धरातल पर दृढ़ थे। यह स्पष्ट है कि क्रांतिकारी
गतिविधियों, फरारी जीवन, जेल की जिन्दगी में से ऐसा समय ही नहीं
मिला कि वे बाकायदा अपने विचार लिपिबद्ध कर पाते।
इन्ही में से समय निकाल कर जो उन्होंने लिखा है वह बहुत थोड़ा
है, जिसे पढ़कर लगता है कि वे चाहते हुए भी अपने सोचे हुए को कागज
पर उतार नही सके। वे बहुत कुछ लिखना चाहते थे, वे बच्चों के लिए
पुस्तकों की रचना करना चाहते थे, उन्हें भावी पीढ़ी की बहुत चिन्ता थी,
लेकिन उनकी इच्छा अधूरी रह गयी। उनके लिखे पत्रों, कविताओं और
डायरी में लिखे अंशों से हमें उनके जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी
मिलती हैं।
देश की स्वतंत्रता और हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए शहीद होने वाले
अशफाक ने फाँसी से पहले अपनी डायरी में हिन्दुस्तान का नक्शा भी
बनाया था और देखने से लगता है कि वे खूब रोये थे। सुनने-देखने में
यह भी आता है कि आँसुओं के निशान अभी तक ज्यों के त्यों हैं।
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आज भी देश के नाम उनका संदेश प्रासंगिक है। उनकी कविताएं
हमें एक सूत्र में बाँधती हैं।
न कोई इंगलिश, न कोई जर्मन,
न कोई रशियन, न कोई तुर्की।
मिटाने वाले है अपने हिंदी,
जो आज हमको मिटा रहे हैं।
यह कहना सर्वथा गलत है कि क्रांतिकारियों के पास कोई विचार
नहीं था। अपने संदेश में अशफाक ने स्पष्ट कहा है कि वे किस तरह की
आज़ादी चाहते हैं। अशफाक की कल्पना समाजवादी थी, जहाँ कोई ऊंच
है न नीच। अशफाक ने किसान, मजदूरों की तरक्की की बात भी कही।
वे कारखानों और गांवों में लोगों के बीच जमकर काम करने में विश्वास
रखते थे। अशफाक शोषण के कारणों की बात करते है और उसके
खिलाफ जंग लड़ने की बात करते हैं।
<u>देश वासियों के नाम भेजा गया संदेश</u>
‘‘बिरादराने वतन की खिदमत में उनके उस भाई का सलाम पहुँचे
जो उनकी इज्जत व नामू से वतन की खातिर फैजाबाद जेल में कुर्बान हो
गया। आज जबकि मैं यह पैगाम बिरादराने वतन को भेज रहा हूँ, इसके
बाद मुझको तीन दिन और चार रातें और गुजारनी हैं और फिर मैं हूँगा
और आगोशे मादी वतन होगा। हम लोगों पर जो जुर्म लगाये गये थे
वह इस सूरत में पब्लिक में लाए गये कि हमको बहुत से लोग
गेरेतालीमय़ाफ्ता या हुकूमत के दस्तरख्वान की पसेखुर्दा हड्डियाँ चचोड़ने
वाले थे, डाकू, खूनी, कातिल के लकब से पुकारा किए। मैं आज इस
फाँसी की कोठरी में बैठा हुआ भी खुश हूँ और अपने उन भाइयों का
शुक्रिया अदा करता हूँ। और कहूँगा -
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मर मिटा आप पै कौन! आपने यह भी सुना,
आपकी जान से दूर! आप से शिकवा है मुझे।
खैर यह तुम्हारा फैल है कि हमारी कुर्बानियों को कबूल न करो
और यह हमारा फर्ज है कि बार-बार ठुकराओ मगर हम तुम्हारा ही दम
भरे जायेंगे। बिरादराने वतन, मैं उसी पाक व मुकद्दस वतन ही की
कसम खाकर कहूँगा कि हम नंगे नामूसे वतन पर कुर्बान हो गए। क्या
यह शर्म की बात नहीं कि हम अपनी आँखों से देखते कि नित नए
मुज़ालिम हो रहे है और गरीब हिन्दुस्तानी हर हिस्साये मुल्क और
खित्तयेदुनिया में जलील और रुसवा हो रहे हैं और कहीं न ठिकाना है
न सहारा। किस्सा मुख्तसर ये कि हमारा वतन भी हमारा नहीं। हम पर
टैक्स की भरमार, हमारी माली हालत का रोज बरोज गिरते जाना, 33
करोड़ बहादुर हिन्दुस्तानी हिन्दू और मुसलमान भेड़-बकरियों की मानिंद
बनाए गए। हमारे गोरे आका हमें ठोकरे मार दें तो बाज-पुर्स न हो।
जनरल डायर जलियावाला बाग को नमूनये हशर बना दे। हमारी माताओं
की बेइज्जती करें। हमारे बूढ़ों और बच्चों पर बम के गोले, गन-मशीनों
की गोलियाँ बरसाएं और हर नया दिन हमारे लिए नई मुसीबते लेकर
आए। फिर भी हम बादये गफलत रहें और ऐशो-इशरत में अय्यायें- जवानी
गुजार देते। यह खयाल करके -
जनूने हुब्बे वतन का मजा / शबाब में हैं,
लहू में फिर यह रवानी रहे / रहे न रहे।
जो भी किया, भला किया, आज हम नाकाम रहे, डाकू हैं।
कामायाब होते मुहिब्बते वतन के पाक लकब से पुकारे जाते। और जो भी
आज हम पर झूठी गवाहियाँ दे गए, हमारे नाम के जयकारे लगाते -
बहे बहरे फना में जल्द / यारब लाश बिस्मिल की,
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कि भूखी मछलियाँ हैं/जौहरे शमशीरे कातिल की।
आह! क्या ऐसे दौर की जिन्दगी प्यारी ख्याल की जा सकती है।
जबकि हमारे ही गिरोह-सियासी में खलफिशार मचा है। कोई तबलीग का
दिलददा है, जो कोई शुद्धि पर मर मिटने को बाइसेनिजात समझ रहा है।
मुझे तो रह-रहकर इन दिमागों और अक्लों पर तरस आ रहा है जो कि
बेहतरीन दिमाग हैं और माहरीने सियासत हैं। काश कि वह अज़ादिए
मिस्र की जद्दोजहद एहरारान मिस्र के कारनामें और बर्तानवी सियासी
चाले स्टडी कर लें और हमारे हिन्दुस्तान की मौजूदा हालत से मुकाबिला
व मवाज़ना करें, क्या ठीक वही हाल इस वक्त नहीं है। गवर्नमेंट के
खुफिया एजेन्ट प्रोपेगेंडा मजहबी बुनियाद पर फैला रहे हैं। इन लोगों का
मकसद मजहब की हिफाजत या तरक्की नहीं है बल्कि चलती गाड़ी में
रोड़ा अटकाना है। मेरे पास वक्त नहीं है न मौका है कि सब कच्चा
चिट्ठा खोलकर रख देता जो मुझे अय्यामे फरारी में और उसके बाद
मालूम हुआ है। यहाँ तक मुझे मालूम है कि मौलवी नियामतुल्ला
कादियानी कौन था कि काबुल में संगसार किया था। वह ब्रिटिश एजेन्ट
था। जिसके पास हमारे करमफरमा खान बहादुर, तसद्दुम हुसैन साहब
डिप्टी सुपरिटेंडेन्ट सी०आई०डी० गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया पैगाम लेकर गए थे
मगर बेदारमगज हुकूमत काबुल ने इलाज जल्द कर दिया और मर्ज को
फैलने न दिया। मैं अपने हिन्दुओं और मुसलमान भाइयों को बता देना
चाहता हूँ कि सब ढोंग हैं, जो सी०आई०डी० के खुफिया खजाने के रूपये
से रचा गया है। मैं मर रहा हूँ और वतन पर मर रहा हूँ। मेरा फर्ज है
कि हर नेको बद बात भाइयों तक पहुंचा दूँ। मानना न मानना उनका
काम है। मुल्क के बड़े-बड़े लोग इससे बचे हुए नहीं हैं। बस आवाम को
आँखे खोलकर इत्तबा करना चाहिए।
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भाइयों! तुम्हारी खानाजंगी तुम्हारी आपस में फूट, तुम दोनों में से
किसी के भी सूदमंद साबित न होगी। यह गैर मुमकिन है कि 7 करोड़
मुसलमान शुद्ध हो जाएँ और वैसे ही यह भी महमल-सी बात है कि 22
करोड़ हिन्दू मुसलमान बना लिए जाएं। मगर हाँ यह आसान है और
बिल्कुल आसान है कि यह सब मिलकर गुलामी का तौक गले में डाल
लें। ऐ वह कौम जिसका कोई कौमी झंडा नहीं-ऐ वह कि तेरा वतन मेरा
वतन नहीं-ऐ कि दूसरों की तरफ हाथ फैलाए हुए रहम की दरख्वास्त पर
नजर रखनेवाली बेकस कौम तेरी अपनी गलतियों का यही नतीजा है कि
आज तू गुलाम है और फिर वही गलतियाँ कर रही है कि आने वाली
नस्लों के लिए धब्बा गुलामी का छोड़ जाएगी कि जो भी सर जमीने हिन्द
पर कदम रखेगा, गुलामी में रखेगा और गुलाम बनाएगा। ऐ खुदावंदे
कुद्दूस क्या कोई ऐसा सबेरा नहीं आयेगा कि जिस सुबह को तेरा
आफताब आजाद हिन्दुस्तान पर चमके और फिजाए हिन्द आजादी के नारों
से गूँज उठे। कांग्रेस वाले हों कि सौराजिस्ट तलबीगवाले हो कि
शुद्धिवाले, कम्युनिस्ट हो कि रिवोल्यूशनरी, अकाली हो कि बंगाली, मेरा
पयाम हर फरजंदेवतन को पहुँचे। मैं हर शख्स को उसकी इज्जत व
मजहब का वास्ता देता हूँ। अगर वह मजहब का कायल नहीं तो उसके
जमीर को और जिसको भी वह मानता हो, अपील करता हूँ कि हर
काकोरी केस के मर जाने वाले नौजवानों पर तरस खाओ। और फिर
हिन्दुस्तान को सन् 20 व 21 वाला हिन्दुस्तान बना दो। फिर अहमदाबाद
कांग्रेस जैसा इत्तिहाद इत्तिफाक का नजारा सामने हो। बल्कि उससे
बढ़कर हो और मुकम्मल आजादी का जल्द-से-जल्द ऐलान करके इन गोरे
आकाओं को हटा दो कि ये अब केंचुली उतार चुके हैं और अब वह किसी
मंत्र से बस में न होंगे-तबलीग व शुद्धि वालो खुदारा-आंखें खोलो, कहाँ
थे और कहाँ पहुँच गये, अपनी-अपनी शान खत्म करो, सोचो तो मजहब
में जबरदस्ती इखतिलाफे राय पर जंग, एक काम नामुकम्मल छोड़कर
दूसरी तरफ रुजू हो गये।
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आज कौन ऐसा हिन्दू या मुसलमान है जो मजहबी आजादी इतनी
रखता है कि जितना उसका हक है? क्या गुलाम कौम का कोई मजहब
नहीं होता? तुम अपने मजहब का सुधार क्या कर सकते हो? तुम खुदा
की इबादत पुरसुकून तरीके पर करो। तुम ईश्वर का ध्यान खामोशी से
करो और दोनों मिलकर इस सफेद भूत को मंत्र से जंत्र से उतार भगाओ।
इसी की यह सारी कार्यवाही है। जब यह भूत उतर जाएगा, हमारी आँखें
खुल जायेंगी। आओ हमारी भी सुनो, पहले हिन्दुस्तान को आजाद करो,
फिर कुछ और सोचना, खुदा ने जिसके लिए जो रास्ता मुंतखिब कर दिया
है, वह उसी पर रहेगा। तुम किसी को भी नहीं हटा सकते। <u>आपस में</u>
<u>मिल-जुलकर रहो और मुत्तहिन्द हो जाओ नहीं तो सारे हिन्दुस्तान की</u>
<u>बद बख्ती का वार तुम्हारी गर्दन पर है और गुलामी का बाइस तुम हो।</u>
कम्युनिस्ट ग्रुप के अशफाक की गुजारिश है कि तुम इस गैरमुल्की
की तसव्वुर करते हो, देसी चीजों से नफरत, विदेशी पोशाक और
तर्जेमआशरत के दिलदादा हो, इससे काम नहीं चलेगा। अपने असली रंग
में आ जाओ। देश के लिए जिओ, देश के लिए मरो। मैं तुमसे काफी तौर
पर मुत्तफिक हूँ और कहूँगा कि मेरा दिल गरीब किसानों के लिए और
दुखिया मजदूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं अपने अय्यामे फरारी में
भी अक्सर इनकी हालत देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इनके साथ
दिन गुजारने का मौका मिला है। मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा कि मेरा बस
हो तो मैं दुनिया की हर मुमकिन चीज इनके लिए वक्फ कर दूँ। हमारे
शहरों की रौनक इनके दम से है। हमारे कारखाने उनकी वजह से आबाद
और काम कर रहे हैं। हमारे पंपों से इनके हाथ का पानी निकालते हैं,
गर्ज कि दुनिया का हर एक काम इनकी वजह से हुआ करता है। गरीब
किसान बरसात के मूसलाधार पानी और जेठ-बैसाख की तपती दोपहर में
भी खेतों पर जमा होते हैं और जंगल में मँडलाते हुए हमारी खुराक का
सामान पैदा करते हैं।
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यह बिल्कुल सच है कि वह जो पैदा करते है जो वह बनाते हैं उनमें
उनका हिस्सा नहीं होता, हमेशा दुखी और मफलूकुल हाल रहते हैं। मैं
इत्तिफाक करता हूँ कि इन तमाम बातों के जिम्मेदार हमारे गोरे आका
और उनके एजेन्ट हैं। मगर इनका इलाज क्या है कि उनको उस हालत
पर ले आएँ कि वह महसूस करने लगें कि वह क्या हैं। इसका वाहिद
जरिया यह है कि तुम उन जैसी वज़ा किरा इख्तियार करो और
जेंटलमैनी छोड़कर देहात का चक्कर लगाओ। कारखानों में डेरे डालो
और उसकी हालत स्टडी करो और उनमें एहसास पैदा करो। तुम कैथरीन
ग्रांड मदर ऑफ रशिया की सवानेह उम्री पढ़ो और वहां के नौजवानों की
कुर्बानियाँ देखो। तुम कालर टाई और उम्दा सूट पहनकर लीडर जरूर
बन सकते हो, मगर किसानों और मजदूरों के लिए फाइदेमन्द साबित नही
हो सकते। दीगर पॉलिटिकल जमाअतों से मुत्तहिद होकर काम करो और
अपनी माद्दापरस्ती से किनारा करो कि यह फिजूल है जो तुम्हे दूसरी
जमाअतों से अलग किये हुए हैं।
मेरे दिल में तुम्हारी इज्जत है और मैं मरते हुए भी तुम्हारे सयासी
मकसद से बिल्कुल मुत्तफिक हूँ। मैं हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी का
ख्वाहिशमंद था जिसमें गरीब खुश और आराम से रहते। खुदा मेरे बाद
वह दिन जल्द आए जबकि छत्तरमंजिल लखनऊ में अब्दुल्ला मिस्त्री लोको
वर्कशाप और धनिया चमार, किसान भी मिस्टर खलीकउज्जमा और
जगत नारायण मुल्ला व राजा साहब महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे
हुए नजर पड़े। मेरे कामरेडो मेरे रिवोल्यूशनरी भाइयों -तुमसे मैं क्या कहूँ
और तुमको क्या लिखूँ, बस अब तुम्हारे लिए क्या कुछ कम मुसर्रत की
बात होगी, जब सुनोगे कि तुम्हारा एक भाई हँसता हुआ फाँसी पर चला
गया और मरते-मरते खुश था। मैं खूब जानता हूँ कि जो स्प्रिट तुम्हारा
तबका रखता है - चूँकि मुझको भी फख्र है और अब बहुत ज्यादा फख्र है
कि एक सच्चा रिवोल्यूशनरी होकर मर रहा हूँ।
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मेरा पयाम तुमको पहुँचाना फर्ज था, मैं खुश हूँ-मसरूर हूँ, मैं उस
सिपाही की तरह हूँ जो फायरिंग लाइन पर हंसता चला जा रहा हो और
खंदको में बैठा हुआ गा रहा हो। तुम्हें दो शेर हसर मोहानी साहब का लिख
रहा हूँ -
जान को महवे गम बना दिल को वफा निहाद कर,
बंद ये इश्क है तो यू कता रहे मुराद की।
ऐ कि निजाते हिन्द की दिल से है तुझको आरजू,
हिम्मते सर बुलन्द से यास का इंसदाद कर।
हजार दुख क्यों न आएँ-बहरे जख्खार दरमियान में मौंजे
मारें-आतिशी पहाड़ क्यों न हायल हो जाएँ मगर ये आजादी के शेरों
अपने-अपने गरम खून को मातृभूमि पर छिड़कते हुए और जानों को
मातृवेदी पर कुर्बान करते हुए आगे बढ़े चले जाओ। क्या तुम खुश न
होगे जब तुमको मालूम होगा कि हम हँसते हुए मर गए। मेरा वजन
जरूर कम हो गया है और वह मेरे कम खाने की वजह से हो गया है।
किसी डर या दहशत की वजह से नहीं हुआ है-और मैं कन्हाई लाल दत्त
की तरह वजन न बढ़ा सका मगर खुश हूँ और बहुत खुश हूँ। क्या मेरे
लिए इससे बढ़कर कोई इज्जत हो सकती है कि सबसे पहला और अब्बल
मुसलमान हूँ जो आजादिए वतन की खातिर फाँसी पा रहा हूँ - <u>मेरे</u>
<u>भाइयो! मेरा सलाम लो और इस नामुकम्मल काम को, जो हम से रह</u>
<u>गया है तुम पूरा करना।</u> तुम्हारे लिए यू०पी० में मैदाने-अमल तैयार कर
दिया है, तुम्हारा काम जाने। इससे ज्यादा उम्दा मौका तुम्हारे हजार
प्रोपेगंडे से न होता। स्कूल और कालेजों के तुलवा हमारी तरफ दौड़ रहे
हैं, अब बहुत अर्से तक दिक्कत न होगी -
201
उठो-उठो सो रहे हो नाहक/पयामे बाँगे जरस तो सुन लो,
बढ़ो कि कोई बुला रहा है, निशाने मंजिल दिखा-दिखाकर।
ज्यादा क्या लिखूँ, सलाम लो-और कमर हिम्मत बाँध लो और
मैदाने-सियासी लीडरों मेरा सलाम कबूल करो और तुम हम लोगों को उस
नजर से न देखना जिस नजर से दुश्मनाने वतन और खाइनीने कौम
देखते थे। न हम डाकू थे न कातिल -
कहाँ गया कोहेनूर हीरा/किधर गई हाय मेरी दौलत,
वह सबका सब लूटकर कि उलटा/हमीं को डाकू बता रहे हैं।
हमीं को दिन-दहाड़े लूटा, फिर हमीं डाकू हैं। हमारे भाइयों और
बहनों और बच्चों को जलियानवाला बाग में भून डाला और अब हमीं को
कालस बलूट फैसले में लिखा जाता है। अगर हम ऐसे हैं तो वह कैसे हैं
और किस खिताब से पुकारे जाने के काबिल हैं, उन्होंने हिन्दुस्तान का
सुहाग लूट लिया, जिन्होंने लाखों बहादुरों को अपनी गरज के लिए
मेसोपोटामिया और रूस के मैदान में सुलवा दिया, खुँख्वार जानवर,
जालिम दरिंदे वह हैं कि हम? हम बेवश थे, कमजोर थे, सब कुछ सुन
लिया और ऐ वतनी भाइयों यह सब तुमने सुनवाया। आओ फिर मुत्तहिद
हो जाओ, फिर मैदाने अमल में कूद पड़ो और मुकम्मल आजादी का
ऐलान कर दो। अच्छा अब मैं रुखसत होता हूँ और हमेशा के लिए
खैरबाद कहता हूँ। खुदा तुम्हारे साथ हो और फिजाये हिंद पर आजादी
का झंडा जल्द लहराए। मेरे पास न वह ताकत है कि हिमालय की चोटी
पर पहुँचकर एक ऐसी आवाज निकालूँ जो हर शख्स को बेदार कर दे और
न वह असबाव है कि जिससे फिर तुम्हारे दिल मुश्ताइल कर दूँ कि तुम
उसी जोश से आगे बढ़कर खड़े हो जाओ जैसे सन् 20 या 21 में थे। मैं
चंद सुतूर के बाद रुख़सत होता हूँ : -
202
To every man upon this earth,
Death cometh soon or late,
But (then) how can a man die better,
Than facing fearful odds,
For the ashes of his fathers and,
Temples of his God.
बाद को मैं इन भाइयों से रुखसत शुक्रिया के साथ होता हूँ जिन्होंने
हमारी मदद जाहिर तौर पर की या पोशीदा और यकीन दिलाऊँगा कि
अशफाक आखिरी दम तक सच्चा रहा और खुशी-खुशी मर गया और
ख्यानते-वतनी का उस पर कोई नहीं लगाया जा सकता। वतनी भाइयों
से गुजारिश है कि मेरे बाद मेरे भाइयों को वक्त जरूरत न भूलें और
उनकी मदद करें और उनका खयाल करें।
वतन पर मर मिटने वाला
अशफाक वारसी 'हसरत'
अज, फैजाबाद जेल
मेरी तहरीर मेरे वतनी भाइयों तक पहुँच जाए। ख्वाह विद्यार्थी जी
अखबार के जरिए से या अग्रेजी, हिन्दी, उर्दू में छापकर कांग्रेस के अय्याम
में तकसीम करा दें, मशकूर हूँगा। मेरा सलाम कबूल करें और मेरे भाइयों
को न वह कभी भूलें और न मेरे वतनी भाई फरामोश करें। अलविदा !
अशफाक उल्ला वारसी 'हसरत'
फैजाबाद
जेल
19 दिसम्बर
1927¹
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 148-156
203
अशफाक चले गये और अलविदा से पहले देश के नाम अपना
संदेश छोड़ गये। संदेश के माध्यम से हम उनके वैचारिक धरातल को
ठीक से समझ सकते हैं, उनके कृतित्व व्यक्तित्व के विषय में तमाम
सच्चाइयों का पता भी चलता है।
फाँसी पर जाने के पूर्व अशफाक ने कहा भी था - "भारत माता के
रंगमंच पर अपना पार्ट अब हम अदा कर चुके। हमने गलत-सही जो कुछ
किया वह स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना से किया। हमारे इस काम की कोई
प्रशंसा करेगा तो कोई निंदा। किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा
हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ी है। क्रांतिकारी बड़े वीर योद्धा और बड़े
अच्छे वेदान्ती होते हैं। वे सदैव अपने देश की भलाई सोचा करते हैं। वे
कहते है कि हम देश को भयग्रस्त करते हैं, किन्तु बात ऐसी नहीं हैं।
इतनी लम्बी मियाद तक हमारा मुकदमा चला, मगर हमने किसी एक
गवाह तक को भयग्रस्त करने की चेष्टा नहीं की, न किसी मुखबिर को
गोली मारी। हम चाहते तो किसी गवाह, किसी खुफिया पुलिस के
अधिकारी या किसी अन्य ऐसे आदमी को मार सकते थे, किन्तु यह
हमारा उद्देश्य नही था। हम तो कन्हाईलाल दत्त, खुदी राम बोस, गोपी
मोहन साहा आदि की स्मृति में फाँसी पर चढ़ जाना चाहते थे।
जजों ने हमें निर्दय, बर्बर, मानव कलंक आदि विशेषणों से याद
किया है। किन्तु हम पूछते हैं कि क्या इन जजों ने जलियावाला बाग में
गोली चलाते देखा या सुना, क्या उसने निरस्त्र भारतीयों-स्त्री पुरुष, बाल
वृद्ध सब पर गोलियाँ नहीं चलायी थी। कितने जजों ने उसे इन विशेषणों
से विभूषित किया। फिर क्या यह मजाक हमारे ही साथ उड़ाने को है।
भारतीय भाइयों, आप कोई हों, चाहे जिस धर्म या सम्प्रदाय के अनुयायी
हों, परन्तु आप देशहित में एक जुट होकर योग दीजिए। आप लोग व्यर्थ
में लड़-झगड़ रहे हैं। सब धर्म एक है, रास्ते चाहे भिन्न-भिन्न हो परन्तु
लक्ष्य सबका एक ही है।
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फिर यह झगड़ा बखेड़ा क्यों? हम मरने वाले काकोरी के अभियुक्तों
के लिए आप लोग एक हो जाइए और सब मिलकर नौकर शाही का
मुकाबला कीजिए। यह सोचकर कि 7 करोड़ मुसलमान भारतवासियों में मैं
सबसे पहला मुसलमान हूँ जो भारत माता की स्वतंत्रता के लिए फाँसी पर
चढ़ रहा हूँ, मैं मन ही मन अभिमान का अनुभव कर रहा हूँ किन्तु मैं
यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ किं मैं हत्यारा नहीं था, जैसा कि मुझे
साबित किया गया है।
अब मैं विदा होता हूँ। ईश्वर आप सबका भला करे। इस अवसर
पर एनुद्दीन, मजिस्ट्रेट श्रीखैरात अली, पब्लिक प्रोसीक्यूटर, सी०आई०डी०
के अधिकारी खासकर खान बहादुर तसद्दुक हुसैन साहब तथा अन्य
गवाहों को धन्यवाद देना अनुचित न होगा। क्योंकि इन्ही की कृपा से
यह मान मर्यादा प्राप्त हुई। मेरे परिवार में आज तक देश सेवा के लिए
कोई त्याग न हुआ था, अब यह कलंक छूट जायेगा। अन्त में अपने
साथी अभियुक्तों तथा मुखबिरों और इकबाली मुलजिमों से भी वन्दे करता
हूँ। सबको आखिरी सलाम। भारतवर्ष सुखी हो मेरे भाई आनंद लाभ करें।''¹
निश्चित ही अशफ़ाक को समझना अपने देश की संस्कृति की झलक
पाना है। अशफाक उल्ला खाँ ने स्वतंत्रता को मेहनतकश जनता के
जीवन की स्वतंत्रता से जोड़ा था। क्योंकि उनके लिए देश केवल धरती,
जंगल पहाड़, नदी नाले से नहीं है। जनता के बिना देश या राष्ट्र का
कोई मतलब नही होता। उन्हें पता था देश की बहुसंख्यक जनता गाँव में
रहती है। अधिकतर लोग गरीबी की चक्की में पिस रहे हैं, कम दिहाड़ी
पर कारखानों में काम कर रहे हैं, लाखों सड़क पर हैं। इसलिए देश को
आजाद करना है तो इन्हें आगे लाना होगा। किसानों, मजदूरों को
संगठित करना होगा।
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -156-157
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अशफाक ने कहा है कि -'मेरा दिल गरीब किसानों और दुखियों
मजदूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं तो अपने अय्यामें फरारी में भी
अक्सर इनकी हालत देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इनके साथ दिन
गुजारने का मौका मिला है। निश्चित ही अशफाक उल्ला खाँ उस दौर के
क्रांतिकारियों में एक मजबूत चरित्र के रूप में नजर आते हैं। जहाँ एक
तरफ संवेदनशील और प्रगतिशील कवि, शायर के रूप में हमे नजर आते
है वही वे एक कुशल पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में दृढ़ता से खड़े दिखते
हैं और अन्त तक उनके विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया। प्रमुख
क्रांतिकारी नेता अमर शहीद सरदार भगत सिंह ने लिखा है कि -‘‘आप
(अशफाक) श्री राम प्रसाद के दायें हाथ थे, मुसलमान होने के बावजूद
आपको कट्टर आर्य समाजी धर्म से हर दर्जे तक का प्रेम था। दोनों प्रेमी
एक बड़े काम के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर अमर हो गये।‘’
शहीदे आज़म अशफाक उल्ला खाँ ने देश की आजादी के लिए
अपने प्राणों की आहुति दी। उनका यह उत्सर्ग आने वाली पीढ़ियाँ सदैव
स्मरण करेंगी तथा उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व से हमेशा प्रेरणा पाती
रहेंगी।
अशफाक के शब्द आज भी स्मृति में है और गूँजते हैं -
‘‘कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह है,
रख दे कोई जरा - सी खाके वतन कफन में।‘’
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अध्याय-एक
अध्याय-एक
प्रस्तावना
मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है कि वह दासत्व स्वीकार नहीं करना
चाहता। इसी अस्वीकार के कारण स्वतंत्र होने हेतु अनेक आन्दोलन हुए।
मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अनेक उपाय अपनाता है। वह संघर्ष करता
है। वह लड़ता है, जीवन कुर्बान करता है लेकिन गुलामी के धागे में
बँधना स्वीकार नहीं करता है। इतिहास गवाह है कि व्यक्ति को कभी
गुलामी कबूल नहीं हुई और यह बंधन यदि विदेशी हो तो मुक्त होने की
छटपटाहट बढ़ जाती है। भाषा, संस्कृति का मेल हो तो कुछ देर के लिए
दासत्व बर्दाश्त किया जा सकता है। यही कारण था कि देशी दास भाव ने
कभी बड़ा आन्दोलन खड़ा नहीं किया लेकिन जब वही भाव विदेशी हो
गया तो बेचैनी बढ़ गयी। प्राचीन काल पर दृष्टि डालें तो गुलामी की
मानसिकता और स्पष्ट हो जायेगी। मिश्र में दासों को (युद्धबंदी) मुर्दा
कहते थे और मार डालते थे। ये युद्धबंदी अपने श्रम के कारण लाभकारी
सिद्ध हुए, तब इन्हें मारना बन्द हो गया और 'जिन्दा मुर्दा' की संज्ञा में
होते हुए दास बनाये गये। रोम में दासों को इटली भेजा जाता था।
यूनान में एटिटका के किसान कर्ज के कारण दास बने।¹
भारत की यह विशेषता रही है कि दास प्रथा के बावजूद भारत की
मानवतावादी एवं उदारवादी दृष्टि रही है। इतिहास में उत्पीड़न से मुक्ति के
लिए वीरतापूर्वक संघर्षों का वर्णन मिलता है। जबकि विदेशी ताकतें भारत
के उदारवादी गुणों का लाभ उठाती रही हैं। तमाम कारणों के बावजूद
भारत में क्रांति का अभियान अपने सुपरिणाम तक चला। जिसका नेतृत्व
महान चिन्तकों, अदम्य साहस से भरे देशभक्तों ने किया। परिणाम यह
हुआ कि क्रान्ति सफल हो गयी,
1- प्राचीन विश्व इतिहास का परिचय, प्रगति प्रकाशन, पृष्ठ-45, 143
1
विजयी क्रांति ने नया प्रभात देखा था और हम 1947 में स्वतंत्र राष्ट्र के
इतिहास का शुभारम्भ देख सके।
भारत के इस महान आन्दोलन का शुभारम्भ स्वतंत्रता संग्राम (1857)
के क्रांतिकारी पृष्ठभूमि से हुआ। इस संघर्ष का प्रारम्भ सिपाही मंगल
पाण्डे के विद्रोह से हुआ जिसे कुछ इतिहासकारों ने 'सिपाही विद्रोह' की
संज्ञा दी। लेकिन अनेक ऐतिहासिक खोजों/अनुसंधानों से यह भी सिद्ध
हो जाता है कि यह देश की गुलामी के विरुद्ध एक सुनियोजित जनक्रांति
थी। इसे ब्रिटिश सत्ता द्वारा कुचलने का पूरा प्रयास किया गया। अंग्रेजी
सत्ता ने किसी को तोप से, किसी को तलवार से और अनेक
क्रांतिकारियों को फाँसी के तख्ते पर लटका कर इस इनकलाब को दबाने
की पूरी कोशिश की। फाँसी का फन्दा हो या बर्बर शासकों द्वारा कठोर
कारावास का असहनीय कष्ट, राष्ट्रप्रेमी वीरों की राष्ट्र उपासना और
गगनचुम्बी साहस को कोई भी सत्ता वैचारिक धरातल पर दबा न सकी
थी। स्वतंत्र भारत के निर्माण में अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुतियां
मुस्कुराते हुए दी। यह दिगर बात है कि कुछ ऐसे भी नाम है जिनका
उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में नही हुआ।¹ लेकिन ऐसे भी महत्वपूर्ण
नाम हैं जिनका उल्लेख इतिहास की पुस्तकों की गरिमा बढ़ाता है। आज
की पीढ़ी उन नामों से ऊर्जा पाती है और गौरवान्वित होती है। यही
कारण है कि भारतीय राष्ट्र के जीवन में समाजवाद से लड़ने वाली जुझारू
शक्तियाँ आज भी हमारे पुरुषत्व, हमारे जीवन और हमारे राष्ट्र-प्रेम को
रह-रह कर चुनौती दे रही हैं।
1- काकोरी स्मृतिदिवस शहीद प्रस्तावना लेखक - (हेमवतीनंदन
बहुगुणा) - डा० भगवानदास माहौर
2
1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक बहुत महत्वपूर्ण घटना थी
और इसमें संदेह नही है कि भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की गिनती
आधुनिक समाज के सबसे बड़े आन्दोलनों में की जाती है।¹ इस
आन्दोलन को कोई भी नाम मिले लेकिन यह सत्य प्रतीत होता है कि
यह एक व्यापक जन आन्दोलन था, इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
कहा जा सकता है। क्रांति के इस संग्राम को पाकिस्तानी इतिहासकारों ने
आजादी की जंग कहा है।² 1857 तक अंग्रेज भारत में शक्तिशाली तो हो
ही चुके थे। देशी राजे और जनता दोनों ही आतंकित थे। लेकिन यह
सत्य है कि शासन सदैव आतंक से नही चलाया जा सकता था। हाँ यह
हो सकता है कि कोई बुद्धिमान विदेशी शासक अपनी नीति कुशलता से
किसी देश में अपना शासनकाल बढ़ा सकता है लेकिन आतंक के बल पर
उसे स्थायित्व प्रदान नहीं कर सकता। 1857 का विद्रोह भले सफल नहीं
हुआ लेकिन उसके अनेक अनुभव प्राप्त हुए। अनुभव का धरातल चाहे
अंग्रेज हो चाहे भारतीय। अंग्रेजों ने अनुभव किया कि हिंसात्मक कार्यों में
वे भारतीयों से बढ़कर हैं। भारतीयों ने अनुभव किया कि उनमें आपस में
फूट थी, कुछ अंग्रेजों के पक्ष में, कुछ विद्रोह में सहायता दे रहे थे। साथ
ही उन्होंने यह भी अनुभव किया कि जो संगठन उन्होंने बनाया था वह
देश के दूर-दूर के भागों को अपने में समेटने में समर्थ नही था।³ तमाम
आरोहों अवरोहों के बावजूद क्रान्ति जब एक बार मन में बैठ जाती है तो
परिणाम तक जाये बिना थम नहीं सकती। क्रांति की यात्रा धीमी पड़
सकती है, घटनाएं थम सकती हैं लेकिन भीतर की आग सुलगती रहती
है। राख के ढेर में कहीं न कहीं एक चिंगारी जीवित रह जाती है।
1- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, विपिन चन्द्र - पृष्ठ XIII
2. द इंडियन पोलिटिकल सिस्टम, नार्मन डी० यामर, पृष्ठ-83
3. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, पृष्ठ-27
3
विदित है कि भारतवर्ष एक दिन में अंग्रेजों के अधीन नहीं हुआ था।
लगभग सौ साल का षड्यन्त्र, विश्वासघाती चाल, कूटनीति भरी दृष्टि के
बाद अंग्रेजों का परचम लहराया है। 1857 के पहले भी विद्रोह हुआ था।
निजाम की फौज की तृतीय घुड़सवार सेना ने 1855 के 21 सितम्बर को
विद्रोह का झण्डा बुलन्द किया। फौज के अध्यक्ष ब्रिगेडियर मैकेन्जी के
शरीर पर दस घाव आये और वे किसी तरह जान लेकर भागे। विद्रोहियों
का घर लूट लिया गया। इस विद्रोह के नेता भी मुसलमान थे।¹ स्पष्ट है
कि 1857 के पूर्व कई विद्रोह हुए जो इतिहास में रेखांकित हैं। 1857 के
बाद महत्वपूर्ण विद्रोहों में किसान विद्रोह का जिक्र आता है। किसान
आन्दोलन की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी। हाउस ऑफ लार्ड्स की
पाँचवी रिपोर्ट (1821) कहती है कि बंगाल में इस्तमरारी बन्दोबस्त की
वजह से जितनी गरीबी फैली है, और भूमि अधिकारों में जितना बड़ा
परिवर्तन हुआ है, उतना उसी समय में महज कानून के जोर से और
किसी देश में या किसी युग में शायद नहीं हुआ होगा।² देश की अधिक
आबादी किसानों की है सो यह आग कई रूपों में फैली। कई क्रांतियों ने
अपने को पुनः टटोला। वैसे भी किसान आन्दोलन देश के कई भागों में
फैला था। मसलन-संथाल विद्रोह (1855-56), नील की खेती करने वाले
किसानों की हड़ताल (1860), मराठा किसान विद्रोह (1875-76) मोपला
बगावत (1836-96) बंगाली किसानों की बगावत (1872) आदि ने भी
क्रांतिकारी आन्दोलन की मानसिकता पर असर डाला।
- भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-3
(नोट-इस विद्रोह का विवरण श्री निवारण चक्रवर्ती के बंगला लेख से
संकलित किया गया है) - आजादी के दस्तावेज, ख्वाजा हसन निजामी, पृष्ठ-14
4
क्रान्तिकारियों को जाने-अनजाने इनसे ऊर्जा मिलती रही। बीसवीं
सदी तक आते-आते किसानों का प्रतिरोध साम्राज्यवाद-विरोधी
प्रतिरोध में समाहित हो गया। किसान साम्राज्यवाद-विरोधी आन्दोलन में
शरीक हो गये। अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में किसानों ने
अहम भूमिका निभाई।¹
गीता में कहे गये वचन कि 'अन्याय के साथ समझौता नहीं,
अपितु उसका निवारण करो' के अनुसार भारतीय जनता अपने हक हेतु
संघर्ष कर निवारण करने का संकल्प ले चुकी थी। 1885 से 1905 के बीच
ऐसी घटनाएँ घटीं जिससे युवाओं का अंग्रेजों की न्याय प्रियता से विश्वास
उठने लगा था। 1885 में काँग्रेस का जन्म हुआ। उस समय हमें कोई
क्रांतिकारी शक्ति देखने को नहीं मिलती, जो कांग्रेस के पीछे रही हो या
साथ निभाती रही हो। क्रांतिकारी विचार का कोई व्यक्ति कांग्रेस में नहीं
था। मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है कि 'कांग्रेस का जनता से उस समय
कोई सम्बन्ध नही था, इसलिए उसकी कोई पूछ भी नहीं थी। कांग्रेस के
आरम्भ के बीस वर्ष तक उस पर उदारवाद का प्रभाव रहा।² कांग्रेस
समय-समय पर इग्लैंड में अपने शिष्ट मंडल भेजती रही। जिसका फल
यह हुआ कि ब्रिटेन में भारतीय मांगों के प्रति सहानुभूति रखने वाला एक
वर्ग बन गया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के अनुसार 'अंग्रेजों की न्याय, दया
तथा बुद्धि की भावना में हमारा दृढ़ विश्वास है। संसार की महानतम
प्रतिनिधि सभा, संसदों की जननी, ब्रिटिश कॉमन्स सभा के प्रति हमारे
हृदय में श्रद्धा है। अंग्रेजों ने सर्वत्र प्रतिनिध्यात्मक आदर्श पर ही शासन
की रचना की है।' कांग्रेस के बारहवें अधिवेशन में रहीमतुल्ला सयानी ने
कहा-‘अंग्रेजो से बढ़कर सच्चरित्र तथा सच्ची जाति इस सूर्य के प्रकाश के
नीचे नहीं बसती।'³
- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, विपिन चन्द्र, पृष्ठ-28
- भारत में राष्ट्रीयता का विकास, डॉ० एस०एल० नागोरी, पृष्ठ-85
- एनीबेसेन्ट : हाउ इण्डिया रॉट फोर फ्रीडम, पृष्ठ-232 से उद्धृत
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