अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंमर मिटा आप पै कौन! आपने यह भी सुना,
आपकी जान से दूर! आप से शिकवा है मुझे।
खैर यह तुम्हारा फैल है कि हमारी कुर्बानियों को कबूल न करो
और यह हमारा फर्ज है कि बार-बार ठुकराओ मगर हम तुम्हारा ही दम
भरे जायेंगे। बिरादराने वतन, मैं उसी पाक व मुकद्दस वतन ही की
कसम खाकर कहूँगा कि हम नंगे नामूसे वतन पर कुर्बान हो गए। क्या
यह शर्म की बात नहीं कि हम अपनी आँखों से देखते कि नित नए
मुज़ालिम हो रहे है और गरीब हिन्दुस्तानी हर हिस्साये मुल्क और
खित्तयेदुनिया में जलील और रुसवा हो रहे हैं और कहीं न ठिकाना है
न सहारा। किस्सा मुख्तसर ये कि हमारा वतन भी हमारा नहीं। हम पर
टैक्स की भरमार, हमारी माली हालत का रोज बरोज गिरते जाना, 33
करोड़ बहादुर हिन्दुस्तानी हिन्दू और मुसलमान भेड़-बकरियों की मानिंद
बनाए गए। हमारे गोरे आका हमें ठोकरे मार दें तो बाज-पुर्स न हो।
जनरल डायर जलियावाला बाग को नमूनये हशर बना दे। हमारी माताओं
की बेइज्जती करें। हमारे बूढ़ों और बच्चों पर बम के गोले, गन-मशीनों
की गोलियाँ बरसाएं और हर नया दिन हमारे लिए नई मुसीबते लेकर
आए। फिर भी हम बादये गफलत रहें और ऐशो-इशरत में अय्यायें- जवानी
गुजार देते। यह खयाल करके -
जनूने हुब्बे वतन का मजा / शबाब में हैं,
लहू में फिर यह रवानी रहे / रहे न रहे।
जो भी किया, भला किया, आज हम नाकाम रहे, डाकू हैं।
कामायाब होते मुहिब्बते वतन के पाक लकब से पुकारे जाते। और जो भी
आज हम पर झूठी गवाहियाँ दे गए, हमारे नाम के जयकारे लगाते -
बहे बहरे फना में जल्द / यारब लाश बिस्मिल की,
196