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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

आज कौन ऐसा हिन्दू या मुसलमान है जो मजहबी आजादी इतनी
रखता है कि जितना उसका हक है? क्या गुलाम कौम का कोई मजहब
नहीं होता? तुम अपने मजहब का सुधार क्या कर सकते हो? तुम खुदा
की इबादत पुरसुकून तरीके पर करो। तुम ईश्वर का ध्यान खामोशी से
करो और दोनों मिलकर इस सफेद भूत को मंत्र से जंत्र से उतार भगाओ।
इसी की यह सारी कार्यवाही है। जब यह भूत उतर जाएगा, हमारी आँखें
खुल जायेंगी। आओ हमारी भी सुनो, पहले हिन्दुस्तान को आजाद करो,
फिर कुछ और सोचना, खुदा ने जिसके लिए जो रास्ता मुंतखिब कर दिया
है, वह उसी पर रहेगा। तुम किसी को भी नहीं हटा सकते। <u>आपस में</u>
<u>मिल-जुलकर रहो और मुत्तहिन्द हो जाओ नहीं तो सारे हिन्दुस्तान की</u>
<u>बद बख्ती का वार तुम्हारी गर्दन पर है और गुलामी का बाइस तुम हो।</u>
कम्युनिस्ट ग्रुप के अशफाक की गुजारिश है कि तुम इस गैरमुल्की
की तसव्वुर करते हो, देसी चीजों से नफरत, विदेशी पोशाक और
तर्जेमआशरत के दिलदादा हो, इससे काम नहीं चलेगा। अपने असली रंग
में आ जाओ। देश के लिए जिओ, देश के लिए मरो। मैं तुमसे काफी तौर
पर मुत्तफिक हूँ और कहूँगा कि मेरा दिल गरीब किसानों के लिए और
दुखिया मजदूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं अपने अय्यामे फरारी में
भी अक्सर इनकी हालत देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इनके साथ
दिन गुजारने का मौका मिला है। मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा कि मेरा बस
हो तो मैं दुनिया की हर मुमकिन चीज इनके लिए वक्फ कर दूँ। हमारे
शहरों की रौनक इनके दम से है। हमारे कारखाने उनकी वजह से आबाद
और काम कर रहे हैं। हमारे पंपों से इनके हाथ का पानी निकालते हैं,
गर्ज कि दुनिया का हर एक काम इनकी वजह से हुआ करता है। गरीब
किसान बरसात के मूसलाधार पानी और जेठ-बैसाख की तपती दोपहर में
भी खेतों पर जमा होते हैं और जंगल में मँडलाते हुए हमारी खुराक का
सामान पैदा करते हैं।

199

यह बिल्कुल सच है कि वह जो पैदा करते है जो वह बनाते हैं उनमें
उनका हिस्सा नहीं होता, हमेशा दुखी और मफलूकुल हाल रहते हैं। मैं
इत्तिफाक करता हूँ कि इन तमाम बातों के जिम्मेदार हमारे गोरे आका
और उनके एजेन्ट हैं। मगर इनका इलाज क्या है कि उनको उस हालत
पर ले आएँ कि वह महसूस करने लगें कि वह क्या हैं। इसका वाहिद
जरिया यह है कि तुम उन जैसी वज़ा किरा इख्तियार करो और
जेंटलमैनी छोड़कर देहात का चक्कर लगाओ। कारखानों में डेरे डालो
और उसकी हालत स्टडी करो और उनमें एहसास पैदा करो। तुम कैथरीन
ग्रांड मदर ऑफ रशिया की सवानेह उम्री पढ़ो और वहां के नौजवानों की
कुर्बानियाँ देखो। तुम कालर टाई और उम्दा सूट पहनकर लीडर जरूर
बन सकते हो, मगर किसानों और मजदूरों के लिए फाइदेमन्द साबित नही
हो सकते। दीगर पॉलिटिकल जमाअतों से मुत्तहिद होकर काम करो और
अपनी माद्दापरस्ती से किनारा करो कि यह फिजूल है जो तुम्हे दूसरी
जमाअतों से अलग किये हुए हैं।
मेरे दिल में तुम्हारी इज्जत है और मैं मरते हुए भी तुम्हारे सयासी
मकसद से बिल्कुल मुत्तफिक हूँ। मैं हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी का
ख्वाहिशमंद था जिसमें गरीब खुश और आराम से रहते। खुदा मेरे बाद
वह दिन जल्द आए जबकि छत्तरमंजिल लखनऊ में अब्दुल्ला मिस्त्री लोको
वर्कशाप और धनिया चमार, किसान भी मिस्टर खलीकउज्जमा और
जगत नारायण मुल्ला व राजा साहब महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे
हुए नजर पड़े। मेरे कामरेडो मेरे रिवोल्यूशनरी भाइयों -तुमसे मैं क्या कहूँ
और तुमको क्या लिखूँ, बस अब तुम्हारे लिए क्या कुछ कम मुसर्रत की
बात होगी, जब सुनोगे कि तुम्हारा एक भाई हँसता हुआ फाँसी पर चला
गया और मरते-मरते खुश था। मैं खूब जानता हूँ कि जो स्प्रिट तुम्हारा
तबका रखता है - चूँकि मुझको भी फख्र है और अब बहुत ज्यादा फख्र है
कि एक सच्चा रिवोल्यूशनरी होकर मर रहा हूँ।
200

मेरा पयाम तुमको पहुँचाना फर्ज था, मैं खुश हूँ-मसरूर हूँ, मैं उस
सिपाही की तरह हूँ जो फायरिंग लाइन पर हंसता चला जा रहा हो और
खंदको में बैठा हुआ गा रहा हो। तुम्हें दो शेर हसर मोहानी साहब का लिख
रहा हूँ -
जान को महवे गम बना दिल को वफा निहाद कर,
बंद ये इश्क है तो यू कता रहे मुराद की।
ऐ कि निजाते हिन्द की दिल से है तुझको आरजू,
हिम्मते सर बुलन्द से यास का इंसदाद कर।
हजार दुख क्यों न आएँ-बहरे जख्खार दरमियान में मौंजे
मारें-आतिशी पहाड़ क्यों न हायल हो जाएँ मगर ये आजादी के शेरों
अपने-अपने गरम खून को मातृभूमि पर छिड़कते हुए और जानों को
मातृवेदी पर कुर्बान करते हुए आगे बढ़े चले जाओ। क्या तुम खुश न
होगे जब तुमको मालूम होगा कि हम हँसते हुए मर गए। मेरा वजन
जरूर कम हो गया है और वह मेरे कम खाने की वजह से हो गया है।
किसी डर या दहशत की वजह से नहीं हुआ है-और मैं कन्हाई लाल दत्त
की तरह वजन न बढ़ा सका मगर खुश हूँ और बहुत खुश हूँ। क्या मेरे
लिए इससे बढ़कर कोई इज्जत हो सकती है कि सबसे पहला और अब्बल
मुसलमान हूँ जो आजादिए वतन की खातिर फाँसी पा रहा हूँ - <u>मेरे</u>
<u>भाइयो! मेरा सलाम लो और इस नामुकम्मल काम को, जो हम से रह</u>
<u>गया है तुम पूरा करना।</u> तुम्हारे लिए यू०पी० में मैदाने-अमल तैयार कर
दिया है, तुम्हारा काम जाने। इससे ज्यादा उम्दा मौका तुम्हारे हजार
प्रोपेगंडे से न होता। स्कूल और कालेजों के तुलवा हमारी तरफ दौड़ रहे
हैं, अब बहुत अर्से तक दिक्कत न होगी -
201

उठो-उठो सो रहे हो नाहक/पयामे बाँगे जरस तो सुन लो,
बढ़ो कि कोई बुला रहा है, निशाने मंजिल दिखा-दिखाकर।
ज्यादा क्या लिखूँ, सलाम लो-और कमर हिम्मत बाँध लो और
मैदाने-सियासी लीडरों मेरा सलाम कबूल करो और तुम हम लोगों को उस
नजर से न देखना जिस नजर से दुश्मनाने वतन और खाइनीने कौम
देखते थे। न हम डाकू थे न कातिल -
कहाँ गया कोहेनूर हीरा/किधर गई हाय मेरी दौलत,
वह सबका सब लूटकर कि उलटा/हमीं को डाकू बता रहे हैं।
हमीं को दिन-दहाड़े लूटा, फिर हमीं डाकू हैं। हमारे भाइयों और
बहनों और बच्चों को जलियानवाला बाग में भून डाला और अब हमीं को
कालस बलूट फैसले में लिखा जाता है। अगर हम ऐसे हैं तो वह कैसे हैं
और किस खिताब से पुकारे जाने के काबिल हैं, उन्होंने हिन्दुस्तान का
सुहाग लूट लिया, जिन्होंने लाखों बहादुरों को अपनी गरज के लिए
मेसोपोटामिया और रूस के मैदान में सुलवा दिया, खुँख्वार जानवर,
जालिम दरिंदे वह हैं कि हम? हम बेवश थे, कमजोर थे, सब कुछ सुन
लिया और ऐ वतनी भाइयों यह सब तुमने सुनवाया। आओ फिर मुत्तहिद
हो जाओ, फिर मैदाने अमल में कूद पड़ो और मुकम्मल आजादी का
ऐलान कर दो। अच्छा अब मैं रुखसत होता हूँ और हमेशा के लिए
खैरबाद कहता हूँ। खुदा तुम्हारे साथ हो और फिजाये हिंद पर आजादी
का झंडा जल्द लहराए। मेरे पास न वह ताकत है कि हिमालय की चोटी
पर पहुँचकर एक ऐसी आवाज निकालूँ जो हर शख्स को बेदार कर दे और
न वह असबाव है कि जिससे फिर तुम्हारे दिल मुश्ताइल कर दूँ कि तुम
उसी जोश से आगे बढ़कर खड़े हो जाओ जैसे सन् 20 या 21 में थे। मैं
चंद सुतूर के बाद रुख़सत होता हूँ : -
202

To every man upon this earth,
Death cometh soon or late,
But (then) how can a man die better,
Than facing fearful odds,
For the ashes of his fathers and,
Temples of his God.
बाद को मैं इन भाइयों से रुखसत शुक्रिया के साथ होता हूँ जिन्होंने
हमारी मदद जाहिर तौर पर की या पोशीदा और यकीन दिलाऊँगा कि
अशफाक आखिरी दम तक सच्चा रहा और खुशी-खुशी मर गया और
ख्यानते-वतनी का उस पर कोई नहीं लगाया जा सकता। वतनी भाइयों
से गुजारिश है कि मेरे बाद मेरे भाइयों को वक्त जरूरत न भूलें और
उनकी मदद करें और उनका खयाल करें।
वतन पर मर मिटने वाला
अशफाक वारसी 'हसरत'
अज, फैजाबाद जेल
मेरी तहरीर मेरे वतनी भाइयों तक पहुँच जाए। ख्वाह विद्यार्थी जी
अखबार के जरिए से या अग्रेजी, हिन्दी, उर्दू में छापकर कांग्रेस के अय्याम
में तकसीम करा दें, मशकूर हूँगा। मेरा सलाम कबूल करें और मेरे भाइयों
को न वह कभी भूलें और न मेरे वतनी भाई फरामोश करें। अलविदा !
अशफाक उल्ला वारसी 'हसरत'
फैजाबाद
जेल
19 दिसम्बर
1927¹


  1. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 148-156
    203

अशफाक चले गये और अलविदा से पहले देश के नाम अपना
संदेश छोड़ गये। संदेश के माध्यम से हम उनके वैचारिक धरातल को
ठीक से समझ सकते हैं, उनके कृतित्व व्यक्तित्व के विषय में तमाम
सच्चाइयों का पता भी चलता है।
फाँसी पर जाने के पूर्व अशफाक ने कहा भी था - "भारत माता के
रंगमंच पर अपना पार्ट अब हम अदा कर चुके। हमने गलत-सही जो कुछ
किया वह स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना से किया। हमारे इस काम की कोई
प्रशंसा करेगा तो कोई निंदा। किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा
हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ी है। क्रांतिकारी बड़े वीर योद्धा और बड़े
अच्छे वेदान्ती होते हैं। वे सदैव अपने देश की भलाई सोचा करते हैं। वे
कहते है कि हम देश को भयग्रस्त करते हैं, किन्तु बात ऐसी नहीं हैं।
इतनी लम्बी मियाद तक हमारा मुकदमा चला, मगर हमने किसी एक
गवाह तक को भयग्रस्त करने की चेष्टा नहीं की, न किसी मुखबिर को
गोली मारी। हम चाहते तो किसी गवाह, किसी खुफिया पुलिस के
अधिकारी या किसी अन्य ऐसे आदमी को मार सकते थे, किन्तु यह
हमारा उद्देश्य नही था। हम तो कन्हाईलाल दत्त, खुदी राम बोस, गोपी
मोहन साहा आदि की स्मृति में फाँसी पर चढ़ जाना चाहते थे।
जजों ने हमें निर्दय, बर्बर, मानव कलंक आदि विशेषणों से याद
किया है। किन्तु हम पूछते हैं कि क्या इन जजों ने जलियावाला बाग में
गोली चलाते देखा या सुना, क्या उसने निरस्त्र भारतीयों-स्त्री पुरुष, बाल
वृद्ध सब पर गोलियाँ नहीं चलायी थी। कितने जजों ने उसे इन विशेषणों
से विभूषित किया। फिर क्या यह मजाक हमारे ही साथ उड़ाने को है।
भारतीय भाइयों, आप कोई हों, चाहे जिस धर्म या सम्प्रदाय के अनुयायी
हों, परन्तु आप देशहित में एक जुट होकर योग दीजिए। आप लोग व्यर्थ
में लड़-झगड़ रहे हैं। सब धर्म एक है, रास्ते चाहे भिन्न-भिन्न हो परन्तु
लक्ष्य सबका एक ही है।
204

फिर यह झगड़ा बखेड़ा क्यों? हम मरने वाले काकोरी के अभियुक्तों
के लिए आप लोग एक हो जाइए और सब मिलकर नौकर शाही का
मुकाबला कीजिए। यह सोचकर कि 7 करोड़ मुसलमान भारतवासियों में मैं
सबसे पहला मुसलमान हूँ जो भारत माता की स्वतंत्रता के लिए फाँसी पर
चढ़ रहा हूँ, मैं मन ही मन अभिमान का अनुभव कर रहा हूँ किन्तु मैं
यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ किं मैं हत्यारा नहीं था, जैसा कि मुझे
साबित किया गया है।
अब मैं विदा होता हूँ। ईश्वर आप सबका भला करे। इस अवसर
पर एनुद्दीन, मजिस्ट्रेट श्रीखैरात अली, पब्लिक प्रोसीक्यूटर, सी०आई०डी०
के अधिकारी खासकर खान बहादुर तसद्दुक हुसैन साहब तथा अन्य
गवाहों को धन्यवाद देना अनुचित न होगा। क्योंकि इन्ही की कृपा से
यह मान मर्यादा प्राप्त हुई। मेरे परिवार में आज तक देश सेवा के लिए
कोई त्याग न हुआ था, अब यह कलंक छूट जायेगा। अन्त में अपने
साथी अभियुक्तों तथा मुखबिरों और इकबाली मुलजिमों से भी वन्दे करता
हूँ। सबको आखिरी सलाम। भारतवर्ष सुखी हो मेरे भाई आनंद लाभ करें।''¹
निश्चित ही अशफ़ाक को समझना अपने देश की संस्कृति की झलक
पाना है। अशफाक उल्ला खाँ ने स्वतंत्रता को मेहनतकश जनता के
जीवन की स्वतंत्रता से जोड़ा था। क्योंकि उनके लिए देश केवल धरती,
जंगल पहाड़, नदी नाले से नहीं है। जनता के बिना देश या राष्ट्र का
कोई मतलब नही होता। उन्हें पता था देश की बहुसंख्यक जनता गाँव में
रहती है। अधिकतर लोग गरीबी की चक्की में पिस रहे हैं, कम दिहाड़ी
पर कारखानों में काम कर रहे हैं, लाखों सड़क पर हैं। इसलिए देश को
आजाद करना है तो इन्हें आगे लाना होगा। किसानों, मजदूरों को
संगठित करना होगा।


  1. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -156-157
    205

अशफाक ने कहा है कि -'मेरा दिल गरीब किसानों और दुखियों
मजदूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं तो अपने अय्यामें फरारी में भी
अक्सर इनकी हालत देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इनके साथ दिन
गुजारने का मौका मिला है। निश्चित ही अशफाक उल्ला खाँ उस दौर के
क्रांतिकारियों में एक मजबूत चरित्र के रूप में नजर आते हैं। जहाँ एक
तरफ संवेदनशील और प्रगतिशील कवि, शायर के रूप में हमे नजर आते
है वही वे एक कुशल पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में दृढ़ता से खड़े दिखते
हैं और अन्त तक उनके विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया। प्रमुख
क्रांतिकारी नेता अमर शहीद सरदार भगत सिंह ने लिखा है कि -‘‘आप
(अशफाक) श्री राम प्रसाद के दायें हाथ थे, मुसलमान होने के बावजूद
आपको कट्टर आर्य समाजी धर्म से हर दर्जे तक का प्रेम था। दोनों प्रेमी
एक बड़े काम के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर अमर हो गये।‘’
शहीदे आज़म अशफाक उल्ला खाँ ने देश की आजादी के लिए
अपने प्राणों की आहुति दी। उनका यह उत्सर्ग आने वाली पीढ़ियाँ सदैव
स्मरण करेंगी तथा उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व से हमेशा प्रेरणा पाती
रहेंगी।
अशफाक के शब्द आज भी स्मृति में है और गूँजते हैं -
‘‘कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह है,
रख दे कोई जरा - सी खाके वतन कफन में।‘’
----------------- ''' -----------------
206

अध्याय-एक

अध्याय-एक
प्रस्तावना
मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है कि वह दासत्व स्वीकार नहीं करना
चाहता। इसी अस्वीकार के कारण स्वतंत्र होने हेतु अनेक आन्दोलन हुए।
मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अनेक उपाय अपनाता है। वह संघर्ष करता
है। वह लड़ता है, जीवन कुर्बान करता है लेकिन गुलामी के धागे में
बँधना स्वीकार नहीं करता है। इतिहास गवाह है कि व्यक्ति को कभी
गुलामी कबूल नहीं हुई और यह बंधन यदि विदेशी हो तो मुक्त होने की
छटपटाहट बढ़ जाती है। भाषा, संस्कृति का मेल हो तो कुछ देर के लिए
दासत्व बर्दाश्त किया जा सकता है। यही कारण था कि देशी दास भाव ने
कभी बड़ा आन्दोलन खड़ा नहीं किया लेकिन जब वही भाव विदेशी हो
गया तो बेचैनी बढ़ गयी। प्राचीन काल पर दृष्टि डालें तो गुलामी की
मानसिकता और स्पष्ट हो जायेगी। मिश्र में दासों को (युद्धबंदी) मुर्दा
कहते थे और मार डालते थे। ये युद्धबंदी अपने श्रम के कारण लाभकारी
सिद्ध हुए, तब इन्हें मारना बन्द हो गया और 'जिन्दा मुर्दा' की संज्ञा में
होते हुए दास बनाये गये। रोम में दासों को इटली भेजा जाता था।
यूनान में एटिटका के किसान कर्ज के कारण दास बने।¹
भारत की यह विशेषता रही है कि दास प्रथा के बावजूद भारत की
मानवतावादी एवं उदारवादी दृष्टि रही है। इतिहास में उत्पीड़न से मुक्ति के
लिए वीरतापूर्वक संघर्षों का वर्णन मिलता है। जबकि विदेशी ताकतें भारत
के उदारवादी गुणों का लाभ उठाती रही हैं। तमाम कारणों के बावजूद
भारत में क्रांति का अभियान अपने सुपरिणाम तक चला। जिसका नेतृत्व
महान चिन्तकों, अदम्य साहस से भरे देशभक्तों ने किया। परिणाम यह
हुआ कि क्रान्ति सफल हो गयी,
1- प्राचीन विश्व इतिहास का परिचय, प्रगति प्रकाशन, पृष्ठ-45, 143
1

विजयी क्रांति ने नया प्रभात देखा था और हम 1947 में स्वतंत्र राष्ट्र के
इतिहास का शुभारम्भ देख सके।
भारत के इस महान आन्दोलन का शुभारम्भ स्वतंत्रता संग्राम (1857)
के क्रांतिकारी पृष्ठभूमि से हुआ। इस संघर्ष का प्रारम्भ सिपाही मंगल
पाण्डे के विद्रोह से हुआ जिसे कुछ इतिहासकारों ने 'सिपाही विद्रोह' की
संज्ञा दी। लेकिन अनेक ऐतिहासिक खोजों/अनुसंधानों से यह भी सिद्ध
हो जाता है कि यह देश की गुलामी के विरुद्ध एक सुनियोजित जनक्रांति
थी। इसे ब्रिटिश सत्ता द्वारा कुचलने का पूरा प्रयास किया गया। अंग्रेजी
सत्ता ने किसी को तोप से, किसी को तलवार से और अनेक
क्रांतिकारियों को फाँसी के तख्ते पर लटका कर इस इनकलाब को दबाने
की पूरी कोशिश की। फाँसी का फन्दा हो या बर्बर शासकों द्वारा कठोर
कारावास का असहनीय कष्ट, राष्ट्रप्रेमी वीरों की राष्ट्र उपासना और
गगनचुम्बी साहस को कोई भी सत्ता वैचारिक धरातल पर दबा न सकी
थी। स्वतंत्र भारत के निर्माण में अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुतियां
मुस्कुराते हुए दी। यह दिगर बात है कि कुछ ऐसे भी नाम है जिनका
उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में नही हुआ।¹ लेकिन ऐसे भी महत्वपूर्ण
नाम हैं जिनका उल्लेख इतिहास की पुस्तकों की गरिमा बढ़ाता है। आज
की पीढ़ी उन नामों से ऊर्जा पाती है और गौरवान्वित होती है। यही
कारण है कि भारतीय राष्ट्र के जीवन में समाजवाद से लड़ने वाली जुझारू
शक्तियाँ आज भी हमारे पुरुषत्व, हमारे जीवन और हमारे राष्ट्र-प्रेम को
रह-रह कर चुनौती दे रही हैं।


1- काकोरी स्मृतिदिवस शहीद प्रस्तावना लेखक - (हेमवतीनंदन
बहुगुणा) - डा० भगवानदास माहौर
2

1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक बहुत महत्वपूर्ण घटना थी
और इसमें संदेह नही है कि भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की गिनती
आधुनिक समाज के सबसे बड़े आन्दोलनों में की जाती है।¹ इस
आन्दोलन को कोई भी नाम मिले लेकिन यह सत्य प्रतीत होता है कि
यह एक व्यापक जन आन्दोलन था, इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
कहा जा सकता है। क्रांति के इस संग्राम को पाकिस्तानी इतिहासकारों ने
आजादी की जंग कहा है।² 1857 तक अंग्रेज भारत में शक्तिशाली तो हो
ही चुके थे। देशी राजे और जनता दोनों ही आतंकित थे। लेकिन यह
सत्य है कि शासन सदैव आतंक से नही चलाया जा सकता था। हाँ यह
हो सकता है कि कोई बुद्धिमान विदेशी शासक अपनी नीति कुशलता से
किसी देश में अपना शासनकाल बढ़ा सकता है लेकिन आतंक के बल पर
उसे स्थायित्व प्रदान नहीं कर सकता। 1857 का विद्रोह भले सफल नहीं
हुआ लेकिन उसके अनेक अनुभव प्राप्त हुए। अनुभव का धरातल चाहे
अंग्रेज हो चाहे भारतीय। अंग्रेजों ने अनुभव किया कि हिंसात्मक कार्यों में
वे भारतीयों से बढ़कर हैं। भारतीयों ने अनुभव किया कि उनमें आपस में
फूट थी, कुछ अंग्रेजों के पक्ष में, कुछ विद्रोह में सहायता दे रहे थे। साथ
ही उन्होंने यह भी अनुभव किया कि जो संगठन उन्होंने बनाया था वह
देश के दूर-दूर के भागों को अपने में समेटने में समर्थ नही था।³ तमाम
आरोहों अवरोहों के बावजूद क्रान्ति जब एक बार मन में बैठ जाती है तो
परिणाम तक जाये बिना थम नहीं सकती। क्रांति की यात्रा धीमी पड़
सकती है, घटनाएं थम सकती हैं लेकिन भीतर की आग सुलगती रहती
है। राख के ढेर में कहीं न कहीं एक चिंगारी जीवित रह जाती है।


1- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, विपिन चन्द्र - पृष्ठ XIII
2. द इंडियन पोलिटिकल सिस्टम, नार्मन डी० यामर, पृष्ठ-83
3. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, पृष्ठ-27
3

विदित है कि भारतवर्ष एक दिन में अंग्रेजों के अधीन नहीं हुआ था।
लगभग सौ साल का षड्यन्त्र, विश्वासघाती चाल, कूटनीति भरी दृष्टि के
बाद अंग्रेजों का परचम लहराया है। 1857 के पहले भी विद्रोह हुआ था।
निजाम की फौज की तृतीय घुड़सवार सेना ने 1855 के 21 सितम्बर को
विद्रोह का झण्डा बुलन्द किया। फौज के अध्यक्ष ब्रिगेडियर मैकेन्जी के
शरीर पर दस घाव आये और वे किसी तरह जान लेकर भागे। विद्रोहियों
का घर लूट लिया गया। इस विद्रोह के नेता भी मुसलमान थे।¹ स्पष्ट है
कि 1857 के पूर्व कई विद्रोह हुए जो इतिहास में रेखांकित हैं। 1857 के
बाद महत्वपूर्ण विद्रोहों में किसान विद्रोह का जिक्र आता है। किसान
आन्दोलन की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी। हाउस ऑफ लार्ड्स की
पाँचवी रिपोर्ट (1821) कहती है कि बंगाल में इस्तमरारी बन्दोबस्त की
वजह से जितनी गरीबी फैली है, और भूमि अधिकारों में जितना बड़ा
परिवर्तन हुआ है, उतना उसी समय में महज कानून के जोर से और
किसी देश में या किसी युग में शायद नहीं हुआ होगा।² देश की अधिक
आबादी किसानों की है सो यह आग कई रूपों में फैली। कई क्रांतियों ने
अपने को पुनः टटोला। वैसे भी किसान आन्दोलन देश के कई भागों में
फैला था। मसलन-संथाल विद्रोह (1855-56), नील की खेती करने वाले
किसानों की हड़ताल (1860), मराठा किसान विद्रोह (1875-76) मोपला
बगावत (1836-96) बंगाली किसानों की बगावत (1872) आदि ने भी
क्रांतिकारी आन्दोलन की मानसिकता पर असर डाला।

  1. भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-3
    (नोट-इस विद्रोह का विवरण श्री निवारण चक्रवर्ती के बंगला लेख से
    संकलित किया गया है)
  2. आजादी के दस्तावेज, ख्वाजा हसन निजामी, पृष्ठ-14
    4

क्रान्तिकारियों को जाने-अनजाने इनसे ऊर्जा मिलती रही। बीसवीं
सदी तक आते-आते किसानों का प्रतिरोध साम्राज्यवाद-विरोधी
प्रतिरोध में समाहित हो गया। किसान साम्राज्यवाद-विरोधी आन्दोलन में
शरीक हो गये। अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में किसानों ने
अहम भूमिका निभाई।¹
गीता में कहे गये वचन कि 'अन्याय के साथ समझौता नहीं,
अपितु उसका निवारण करो' के अनुसार भारतीय जनता अपने हक हेतु
संघर्ष कर निवारण करने का संकल्प ले चुकी थी। 1885 से 1905 के बीच
ऐसी घटनाएँ घटीं जिससे युवाओं का अंग्रेजों की न्याय प्रियता से विश्वास
उठने लगा था। 1885 में काँग्रेस का जन्म हुआ। उस समय हमें कोई
क्रांतिकारी शक्ति देखने को नहीं मिलती, जो कांग्रेस के पीछे रही हो या
साथ निभाती रही हो। क्रांतिकारी विचार का कोई व्यक्ति कांग्रेस में नहीं
था। मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है कि 'कांग्रेस का जनता से उस समय
कोई सम्बन्ध नही था, इसलिए उसकी कोई पूछ भी नहीं थी। कांग्रेस के
आरम्भ के बीस वर्ष तक उस पर उदारवाद का प्रभाव रहा।² कांग्रेस
समय-समय पर इग्लैंड में अपने शिष्ट मंडल भेजती रही। जिसका फल
यह हुआ कि ब्रिटेन में भारतीय मांगों के प्रति सहानुभूति रखने वाला एक
वर्ग बन गया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के अनुसार 'अंग्रेजों की न्याय, दया
तथा बुद्धि की भावना में हमारा दृढ़ विश्वास है। संसार की महानतम
प्रतिनिधि सभा, संसदों की जननी, ब्रिटिश कॉमन्स सभा के प्रति हमारे
हृदय में श्रद्धा है। अंग्रेजों ने सर्वत्र प्रतिनिध्यात्मक आदर्श पर ही शासन
की रचना की है।' कांग्रेस के बारहवें अधिवेशन में रहीमतुल्ला सयानी ने
कहा-‘अंग्रेजो से बढ़कर सच्चरित्र तथा सच्ची जाति इस सूर्य के प्रकाश के
नीचे नहीं बसती।'³

  1. भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, विपिन चन्द्र, पृष्ठ-28
  2. भारत में राष्ट्रीयता का विकास, डॉ० एस०एल० नागोरी, पृष्ठ-85
  3. एनीबेसेन्ट : हाउ इण्डिया रॉट फोर फ्रीडम, पृष्ठ-232 से उद्धृत
    5

दादा भाई नौरोजी ने कहा कि - 'यद्यपि जॉन बुल तनिक बुद्धि के
हैं, परन्तु यदि उसे एक बार कोई बात सुझा दी जाये कि वह अच्छी और
उचित है तो आप उसे कार्यरूप में परिणित किये जाने के प्रति विश्वस्त हो
सकते हैं। ‘‘दादा भाई नौरोजी का अंग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास
था। वे यह भी कहते थे कि हम पुरुषों की तरह बोलें और घोषणा कर दें
कि हम पूर्णतः राजभक्त हैं। अंग्रेजों की न्यायप्रियता पर किसी बड़े नेता
को शायद ही संदेह हो। गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था - 'अंग्रेज जाति
की न्यायप्रियता तथा उदारता में हमारी अबाध निष्ठा है।' चाहे फिरोजशाह
मेहता हों या सर टी० माधवराव, प्रायः सभी ने अंग्रेजों की न्यायप्रियता
के गुण गाये। डॉ० सीता रमैया का यह कथन उल्लेखनीय है कि -
'उदारवादी नेता इस बात पर विश्वास करते थे कि अंग्रेज स्वभाव से ही
न्यायप्रिय होते हैं। अतः यदि उन्हें भारतीय दृष्टिकोण का सही ज्ञान करा
दिया गया तो वे भारतीय दृष्टिकोण को स्वीकार कर लेंगे।¹ लेकिन प्रश्न
था कि भारतीय मानसिकता का ठीक प्रकार से परिचय कौन देगा। खास
बात यह भी थी कि क्रान्तिकारी अंग्रेजों का गुण नहीं गाते थे। चाहे
न्यायप्रियता हो या शासन-सत्ता, कोई भी विषय/प्रकरण हो, अंग्रेज सुपाच्य
नहीं थे। क्रांतिकारियों को दासत्व का बोध होता था।
1857 के बाद यह लगता था कि आजादी की जंग समाप्त हो गयी
है लेकिन ऐसा नहीं था। क्रांति के बीज हृदय में अंकुरित होते रहे, फूटते
रहे, बढ़ते -पकते रहे। यही कारण है कि मनुष्य की जीने की इच्छा
जिजीविषा संघर्षों हेतु प्रेरित करती है और इतिहास का निर्माण करती है।
महात्मा गाँधी के भारतीय राजनीति में आने के पहले स्वतंत्रता के नाम
पर जो कुछ भी घटा वह क्रांतिकारियों की भूमिका ही थी।

  1. भारत में राष्ट्रीयता का विकास, डा० एस एल नागोरी, पृष्ठ 86
    6

तब ऐसा नहीं था कि यह हिंसा है और यह अहिंसा। विद्वानों का मानना
भी है कि हिंसा-अहिंसा का प्रश्न खड़ा करके किसी देश की आजादी हेतु
लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है।
जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि अंग्रेजों की न्यायप्रियता
क्रांतिकारियों को पच नहीं रही थी। उदारवादी नेता भी क्रांतिकारियों के
लिए मानसिक रूप से सहयोग देने की कौन कहें उन्हें वे देखना तक न
चाहते थे। युवा वर्ग 'राजनीतिक भिक्षावृत्ति' का विरोध करने लगा था।
अपनी वस्तु लेने में भिक्षा जैसी बात युवा वर्ग की समझ में नहीं आती
थी। उन्हें यह ज्ञात था कि देश हित में किसी भी परिणाम तक जाने के
लिए कठिन संघर्ष आवश्यक है। जब संघर्ष होगा तो क्रांति होगी और इस
हेतु हिंसा-अहिंसा का रोड़ा ठीक नहीं था। युवाओं की धारणा थी कि
अंग्रेज स्वेच्छा से स्वशासन नहीं देंगे। स्वेच्छा के बिना किसी वस्तु को
प्राप्त करने हेतु लड़ाई तो आवश्यक थी। वैसे भी क्रांतिकारी युवा
हिंसात्मक साधनों में विश्वास रखते थे और उनका विश्वास अटल था। वे
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते थे। वे आत्म निर्भर होना चाहते थे।
युवाओं को स्वतंत्र कार्यों में विश्वास था। बालगंगाधर तिलक ने कहा भी
है कि 'हमारा उद्देश्य आत्म निर्भरता है, भिक्षावृत्ति नहीं।'
क्रांतिकारी आन्दोलन में संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) का प्रमुख स्थान
रहा है। 1857 के युद्धों में यही प्रान्त मुख्य केन्द्र था। रौलट की रिपोर्ट में
लिखा है कि 'संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध और बंगाल के बीच बिहार
व उड़ीसा प्रान्त है। यह प्रान्त भौगोलिक दृष्टि से भारतवर्ष का हृदय है।
इस प्रान्त में बनारस और इलाहाबाद है जो हिन्दुओं की दृष्टि में पवित्र है,
आगरा है जो किसी जमाने में मुगल साम्राज्य का केन्द्र था और लखनऊ
है जो मुस्लिम राज्य की राजधानी थी।
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1857 के युद्धों में यही प्रान्त मुख्यतः केन्द्र था।¹ उ०प्र० में क्रांतिकारी
आन्दोलन बंगाल से फैला और इस प्रान्त का क्रांतिकारी आन्दोलन
तत्कालीन सत्ता से खासा प्रभावित भी रहा। इसी समय भारत में दूसरी
तरफ क्रांतिकारी आन्दोलन का भी जन्म हुआ। उग्रवादी प्रतिरोध में
विश्वास रखते थे। ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार आदि उनके मुख्य साधन
थे, जबकि क्रांतिकारी हिंसात्मक साधनों में विश्वास रखते थे एवं बम व
बन्दूक आदि उनके मुख्य साधन थे। इन दोनों विचारधाराओं के विषय में
निहालसिंह ने लिखा है कि 'इन दोनों में धार्मिक भावना समायी हुई
थी, किन्तु दोनों का मार्ग अलग था। उनमें आत्म बलिदान की भावना
एवं स्वतंत्रता की भावना थी। प्रबल देश प्रेम था एवं विदेशी राज्य के प्रति
घृणा थी।² क्रांतिकारियों में उत्साह भरने का काम समाचार पत्रों ने खूब
किया। नवम्बर 1907 में स्वराज्य नाम से इलाहाबाद से पत्र निकला। यहीं
से सर्वप्रथम इस शांतिपूर्ण प्रान्त में क्रान्तिकारी प्रचार हुआ। इस अखबार
का स्वर प्रारम्भ से ही सरकार के विरुद्ध था। यही नही यह अखबार दिन
प्रतिदिन गरम होता गया। इस पत्र के एक के बाद एक इसके आठ
सम्पादक हुए जिसमें कई को आपत्ति जनक लेखों के कारण लम्बी सजाएं
हुई। इस पत्र ने बड़े जोर-शोर से राजद्रोह फैलाया। यह पत्र क्रान्तिकारियों
के लिए ऊर्जा भर रहा था। इलाहाबाद से ही 1909 में 'कर्मयोगी'
निकला। स्पष्ट है कि लेखनी ने ओज भरना शुरू कर दिया था।
क्रान्तिकारी गतिविधियों पर दृष्टि दें तो बनारस षणयन्त्र से क्रान्तिकारी
गतिविधियाँ अपने चरम पर थीं। बड़े नेतृत्व कर्ताओं के बयान आग में
घी का काम कर रहे थे।


  1. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथगुप्त, पृष्ठ-84
  2. भारत में राष्ट्रीयता का विकास एस०एल० नागोरी, पृष्ठ-120

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क्रान्तिकारियों को तो जोश चाहिए था, ऊर्जा चाहे जहाँ से मिले।
एक-एक वाक्य असरदार साबित हो रहे थे। पूर्णरूप से युवा सहमत थे कि
उन्हें किसी भी प्रकार की भिक्षा नहीं चाहिए। तिलक ने 15 जून 1897 को
'केसरी' में लिखा कि - 'यदि हमारे घर में चोर घुस आये और हममें
उनको घर से बाहर निकालने की सामर्थ्य न हो तो हमें बिना झिझक
उन्हें घर के अन्दर बन्द करके जला देना चाहिए'। लाला लाजपत राय ने
कहा कि - 'अंग्रेज भिखारी से सबसे अधिक घृणा करते हैं तथा मैं
सोचता हूँ कि भिखारी घृणा के पात्र हैं भी। अतः हमारा कर्तव्य है कि
हम सिद्ध कर दे कि हम भिखारी नहीं है।'¹
1909 का एक्ट लागू होने के बाद अंग्रेजी शासन का विरोध करने
वाली एक मात्र पार्टी क्रांतिकारी पार्टी थी। यह क्रांतिकारी पार्टी जनता में
चर्चा का विषय बनी हुई थी। आम जनता क्रांतिकारियों का समाचार
सुनने की हमेशा इच्छुक रहती थी। क्रांतिकारियों को दी जाने वाली
सजाओं में जो कड़ी और कठोर अमानवीय हुआ करती थी, से जनता में
अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध रोष बढ़ जाता था। बहुत लोग बमबारी जैसी
घटनाओं के होने को सही ठहराते थे। ऐसा विश्वास होने लगा था कि
ऐसी ही घटनाओं से देश आजाद हो जायेगा। किसी भी अंग्रेज अफसर
की हत्या से सारे देश में चर्चा होती थी और जनता में हलचल मच जाती
थी। अधिकांश लोग समाचार पत्रों में डकैतियां, अफसरों पर हमले की
घटनाओं का समाचार बड़े चाव से सुनते-पढ़ते थे। संयुक्त प्रान्त में 1908
में बनारस में शचीन्द्रनाथ सन्याल द्वारा एक क्लब की स्थापना से
क्रान्तिकारी गतिविधियों की

  1. भारत में राष्ट्रीयता का विकास, डॉ० एस०एल० नागोरी, पृष्ठ-177
    9

शुरुआत हुई।¹ इस क्लब का नाम अनुशीलन समिति रखा गया। यह
समिति 1914 तक निष्क्रिय रही। उसी वर्ष रास बिहारी बोस ने संयुक्त
प्रान्त की गतिविधियों का संचालन अपने हाथ में ले लिया। इसके बाद
तो संयुक्त प्रान्त का क्रांतिकारी स्वर ओज से भर गया। क्रांतिकारी स्वर
के उग्र होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण
'आर्थिक कारण' भी था। लार्ड बेकन ने कहा है कि - 'आर्थिक दरिद्रता
और आर्थिक असंतोष क्रांति को जन्म देता है।'
यह निश्चित है कि असंतोष चाहे जिस प्रकार का क्यों न हो वह
क्रांति को जन्म देता ही है। शाहजहाँपुर भी इससे अछूता नही रहा।
रजनी राय दत्त का मत है कि 1857 के विद्रोह से यह बात साफ हो गयी
कि सतह के नीचे जनता में असंतोष और बेचैनी की भयानक आग
सुलग रही है। इस असंतोष की आग के कारण अंग्रेज शासकों में ऐसी
घबराहट पैदा हुई जो इसके बाद की उनकी सारी कठिनाइयों में दिखायी
देती है।² यह बेचैनी और यह सुलगती आग शाहजहाँपुर में भी थी।
शाहजहाँपुर पर एक नजर दें तो अशफाक के व्यक्तित्व और उनकी
क्रांतिकारी भूमिका का संस्कार स्पष्ट हो जायेगा। रामायण और महाभारत
काल से होता हुआ शाहजहाँपुर वाजिद अली शाह के शासनकाल तक
अपनी पहचान और महत्वपूर्ण छवि पर कायम रहा। अंग्रेज अपने स्वभाव
और अपनी नीतियों के कारण अवध पर कुशासन का आरोप लगाकर
अपने अधिकार में कर लेने का कुचक्र रचने लगे थे। नवाब वाजिद अली
शाह ने आरोपों का खण्डन किया। वे किसी भी मूल्य पर अवध को
ब्रिटिश सत्ता के हाथों नही सौंपना चाहते थे। नवाब ने महारानी
विक्टोरिया को एक स्मृति पत्र दिया कि यदि कम्पनी के शासन के अधीन
कानपुर, फर्रुखाबाद और शाहजहाँपुर के नवाब के अधीन जिलों की

  1. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, रामगोपाल, पृष्ठ-207
  2. भारत वर्तमान और भावी, रजनीपाल दत्त, पृष्ठ-119
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तुलना की जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि नवाब के अधीन इलाके की
जनता ज्यादा सरसब्ज और खुशहाल है।¹ यह तो स्पष्ट तब भी था कि
अंग्रेजी शासन भारतीयों को सुखकर नहीं था। 1857 के प्रमाणिक लेखक
सर जगन लिखते हैं कि 'शाहजहाँपुर में ब्रिटिश अधिकारियों को शहर के
लोगों द्वारा विद्रोह करने का भय था।² सत्ता हमेशा क्रांति से भय खाती
है। अंग्रेज भी विद्रोह से डरे हुए थे और यह भय वास्तविकता में तब
बदल गया जब 31 मई 1857 को लगभग 20-22 विद्रोही तलवार लिए चर्च
में घुस गये। इन विद्रोहियों का जवाहर राय नामक व्यक्ति नेतृत्व कर रहा
था। विद्रोहियों में अन्य प्रमुख विद्रोही थे - गंगा दुबे, महादेव, राम
नारायण दुबे, बिन्द्रा सिंह, रामधीन सिंह, नारायण पाण्डे, ननकूं व शिव
चरण। यह बात और थी कि इन विद्रोहियों को गिरफ्तार किया गया, इन
पर मुकदमा चला, जेल भी गये और फिर मुक्त कर दिये गये।
शाहजहाँपुर की क्रांति में गोरखपुर के मौलवी सरफराज अली का भी
महत्वपूर्ण योगदान था।³ सरफराज अली में विशेष गुण थे। उनका नेतृत्व
कभी असफल नहीं रहता। शाहजहाँपुर अब क्रांतिकारियों का अड्डा बन
गया। अब क्या था युवा का खून उमाँच बाँधने लगा और फिर क्रांति का
दौर रुका नहीं। डॉ० ए०डफ ने लिखा है - 'यदि इस विद्रोह को
बहुसंख्यक जनता का समर्थन प्राप्त न होता और सहानुभूति न मिली
होती और केवल सैनिकों द्वारा किया गया बलवा मात्र ही होता तो प्रथम
दो चार बड़ी विजयों के उपरान्त यह बगावत शान्त हो जाती।


1.वाजिद अली शाह और अवध राज्य का पतन, परिपूर्णानंद वर्मा, पृष्ठ-35
2.हिस्ट्री ऑफ दि इण्डियन म्यूटनी खण्ड-3, सरजान विलियम्स, पृष्ठ-578
3.स्वतंत्रता आंदोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डॉ० एन०सी०मेहोत्रा, पृष्ठ-41

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