आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
१२ आल्हखण्ड । २५०
पहिरि करधनी ली कम्मर में पायँन पायजेब झनकार ११५
कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजै नीचे मेंहदी करै बहार ॥
बिछुआपहिरे सब अँगुरिन में अनवटअँगुठनकाश्रृंगार ११६
वेष जनाना ऊदन धरिकै तुरतै पालकी लीन मँग़ाय ॥
बैठि पालकी में नरनाहर मनमें सुमिरिशारदामाय ११७
हिरिया मालिनि को सँग लै कै फुलवा महल गयेनगन्याय ॥
उतरि पालकी सों नरनाहर शारदचरणकमलफिरिध्याय ११८
आगे हिरिया पाछे ऊदन फुलवा पास पहुँचे जाय ॥
फुलवा देख्यो जब ऊदन को मनमाँ बड़ी खुशी है जाय ११९
रूप देखिकै त्यहि मालिनिको मनमाँ गई सनाकाखाय ॥
कै पैताना खाली दीन्ह्यो आदरकीनफेरिअधिकाय १२०
बैठि उसीसे जब ऊदनगे फुलवा बोली बचन रिसाय ॥
कैसी मालिनि यह लाई है मालिनिहालदेयबतलाय १२१
मालिनि बोली तब फुलवाते बेटी साँची देयँ बताय ॥
बेटी प्यारी परिमालिक की नौकरितासुपासकीआय १२२
राजनीति का यह जानति है राखति सबऊ सखी का भाय ॥
बैठि उसीसे यह जावै जो तौ वह क्षमा करै हर्षाय १२३
सुनिकै बातें ये मालिनि की फुलवा क्षमा कीन सुखपाय ॥
हँसिकै बोली फिरि मालिनिते साँची साँची देउ बताय १२४
कौन बहादुर परिमालिक घर कारो राजपुत्र यहिकाल ॥
बातें सुनिकै ये फुलवाकी बोला देशराजका लाल १२५
आल्हा ब्याहे हैं नैनागढ़ पथरीगढ़ै वीर मलखान ॥
पिरथी घरमाँ ब्रह्मा ब्याहे ठाकुर दिल्लीके चौहान १२६
कारो इकलो बघऊदनहै ज्यहिकै बाँड़ि बहै तलवार ॥
उदयसिंहका विवाह । २५१ १३
बड़ा लड़ैया जगमाँ जाहिर ठाकुर बेंदुलका असवार १२७
इतना सुनिकै फुलवा बोली मालिनि साँच देउ बतलाय ॥
हाथ पैर पुरुषन के ऐसे करै करै परै दिखाय १२८
इतना सुनिकै मालिनि बोली साँचे बचन करो परमान ॥
भैंसि चराई बालापनमाँ माता पिता दरिद्रीजान १२६
परी व्यवस्था लरिकाई में ताको करी कहाँलगगान ॥
जैसी गुजरी हमरे ऊपर ऐसी परै न काहू आन १३०
फुलवा बोली फिरि हिरिया ते मालिनि जाउ घरै यहिबार ॥
काल्हि सबेरे यहि लैजायो साँची मानो कही हमार १३१
इतना सुनिकै हिरिया चलिमै अपने घरै पहुँचि आय ॥
फुलवा बाँदी को बुलवायो तासों चौपरलीन मँगाय १३२
खेलन लागी मालिनि सँगमाँ आधी राति गई नगच्याय ॥
लैकै पंखा बाँदी हाँकै ऊइन केर वस्त्र उड़िजाय १३३
कब्जा झलकै तलवारी का सो फुलवा के परा निगाह ॥
फुलवा बोली तब मालिनिते झलकै बगल तुम्हारे काह १३४
तुम नहिं बेटीहौ मालिनिकी औ छल किह्यो यहाँपर आय ॥
सुनि मकरन्दा तुमका पाई तुरतै खोदि लेइ गड़वाय १३५
अब पहिंचाना हम तुमको है बेटा देशराज के लाल ॥
जियत न जैहौ तुम महलनते औपारिग्योकालके गाल १३६
नाम तुम्हारो उदयसिंह है तुम्हीं बेंदुल के असवार ॥
इतना सुनिकै मालिनि बोली कीन्ह्योनीकी आजचिन्हार १३७
कहँ पै देख्यो तुम ऊदन को साँचे हाल देउ बतलाय ॥
इतना सुनिकै सब बाँदिनको फुलवा तुरतै दीन हटाय १३८
ओ फिरि बोली बबऊदन ते मानो कही बनाफरराय ॥
१४ आल्हखण्ड । २५२
रानी कुशला के महलन में योगीरूपधरा तुम जाय १३९
घर घर लूटा तुम माड़ो माँ हमसों शपथकीन फिरिआय ॥
भेद बतावा घर अपने का तब तुमलीन बापका दायँ १४०
ब्याह हमारो जब तुम कीन्हा मलखे हना मोहिं ततकाल ॥
मिलन आपनो तुम्हें बतावा नाहर देशराज के लाल १४१
साँचो चाहत जो जाको है ताको स्वई मिलै सबकाल ॥
यह सुनि राखा हम विप्रन सों सो सब साँचाभयो हवाल १४२
पै गति तुम्हरी ह्वाँ नहीं है हमसों ब्याह करो सरदार ॥
बड़ा लड़ैया मकरन्दा है ज्यहिते हारिगई तलवार १४३
सुनिकै बातें ये फुलवा की बोला उदयसिंह सरदार ॥
काह हकीकति मकरन्दा कै साँची मानो कही हमार १४४
भल पहिचान्यो तुम मोका है अब सब पूर भये मम काम ॥
ब्याह तुम्हारो अब कीन्हे बिन / लौटिन जायँ आपनेधाम १४५
इतना सुनिकै फुलवा बोली मानो कही बनाफरराय ॥
काठक घोड़ा बाण अजीता जादू सेल शनीचर भाय १४६
व्यापी जियरा अति मेरो है ताते धीर धरा ना जाय ॥
करो बियारी तुम महलन में सोवो सेज बनाफरराय १४७
ऊदन बोले तब फुलवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ॥
क्वारी कन्या की शय्यापर कबहुँ न धरैं बनाफर पायँ १४८
धीरज राखो अपने मनमाँ सोवो तुरत सेज में जाय ॥
भयो भरोसा तब फुलवा के सोई विकट नींदको पाय १४९
तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय ॥
उये निशाकर आसमान में विरहिनिपीरभईअधिकाय १५०
माथ नवावों पितु अपने को ह्वाँ ते करों तरँग को अन्त ॥
उदयसिंहका विवाह । २५३ १५
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५१
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना-
रायणजीकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध
कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनफुलवामिलाप
वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥
-⁘-
सवैया ॥
कौन कि आश सुपासमिलै नितहोत मनैमन याहि बिचारा ।
आशकि पाश सुपास कहाँ यह सोचत मोचत दुःख अपारा ॥
भीतररी यहि लोकहिकि शिर शास्त्र औ वेद पुराण निहारा ।
बाम भये रघुनाथ सों साँच करै ललिते फिरि कौन उबारा १
सुमिरन ॥
मैं पद बन्दौं रिपुसूदन के लवणासुरै पराजय कीन ॥
मानों शत्रुन के जीतै को साँचो जन्म शत्रुहन लीन १
काटिकै मधुबन पुरी बसायो मथुरापुरी परा त्यहि नाम ॥
अश्वमेध में सब जग जीत्यो कीन्ह्यो शम्भु साथ संग्राम २
छोटे भाई लपणलाल के साँचे भये भरत के दास ॥
इन यश बरणा अश्वमेध में पूरण भई हमारी आश ३
मातु सुमित्रा के बालक ये जग में भये सुयश की राश ॥
जो कोउ सुमिरै रिपुसूदन का साँचो करै प्रेम बिश्वास ४
प्यारो होवै रघुनन्दन का साँचो स्वै रामको दास ॥
छूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब ऊदन ब्याह करौं परकाश ५
अथ कथाप्रसंग ॥
उये दिवाकर जब पूरब में बालकरूप बिम्ब अतिलाल ॥
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१६ आल्हखण्ड । २५४
बेटी फुलवा के महलन में जागा देशराजका लाल १
देवा बोला ह्याँ हिरियाते मालिनि मानो कही हमार ॥
देर लगावो अब घरमाँ ना लावो उदयसिंह सरदार २
लै कै पलकी मालिनि चलि भै फुलवा पास पहुँची जाय ॥
फुलवा बोली तब हिरियाते अब यहि जावो तुरत लिवाय ३
इतना सुनिकै ऊदन चलिभे पहुँचे तुरत द्वार में आय ॥
बैठ पालकी में बघऊदन मनमें सुमिरि शारदांमाय ४
आयकै पहुँचे जब मालिनिघर देवा बोला वचन सुनाय ॥
साथ जनाना का करिबे नाँ जैबे जहाँ चँदेलाराय ५
बन्यो जनाना तुम नरवर में कैहौं हाल जाय दरबार ॥
बाना छोड़े रजपूती का ऊदन जीवैका धिक्कार ६
इतना सुनतै कायल व्हैगा नाहर उदयसिंह सरदार ॥
पेट मारने के कारण सों ऊदन लीन्ही हाथ कटार ७
हाथ पकरिकै देवाठाकुर बोला सुनो बनाफरराय ॥
चरचा करिबे ना मोहबेमाँ ऊदन साँच देवँ बतलाय ८
भई लालसा हमरे मनमाँ फुलवा देखनको अधिकाय ॥
करु अभिलाषा पूरण हमरी आल्हाकेर ल्हुरवा भाय ६
ऊदन बोले तब देवाने तुमको कैसे लवँ दिखाय ॥
जैसे बताओ देवा ठाकुर तैसे साँचो करैं उपाय १०
इतना सुनिकै देवा बोले योगी बनो बनाफरराय ॥
अलख जगैवें पुर घर घर में याही सीधोसाद उपाय ११
गइ मनभाई बघऊदन के दूनों लीन्ह्यो भस्म रमाय ॥
काँधे माला औ मृगछाला आला योगिरूप बनाय १२
गुदड़ी लीन्ही दोऊ ठाकुर तामें छिपी ढाल तलवार ॥
उदयसिंहका बियाह। २५५ १७
डमरू लीन्ह्यो देवा ठाकुर बंशी उदयसिंह सरदार १३
धुरपद, सोरठ, जैजैवन्ती, गावैं पूरराग कल्यान ॥
टप्पा ठुमरी भजन रेखता तोरैं गजल पर्ज पर तान १४
को गति बरौ तिन योगिनकै एकते एक रूप गुणवान ॥
ड्योढ़ी दाबे दोउ नरपति कै योगी चले तुरत बलवान १५
देखि तमाशा तिन योगिनका मारग भीर भई अधिकाय ॥
ता ता थेई ता ता थेई थेई थेई दीन मचाय १६
बाजै डमरू भल देवा का ऊदन बंशी रहा बजाय ॥
मोर कि नाचन ऊदन नाचै मारग भूलि गये सबभाय १७
मोहीं तिरिया भल नरवर की चढ़िचढ़ि लखैं अटरिन आय ॥
एक एक सों बोलन लागीं जैसे नारिन केर स्वभाव १८
धन्य बखानों इन मातन को जिनकी कोखिलिन अवतार ॥
देखो आली इन योगिन को कैसो रूप दीन करतार १६
ये दोउ बालक क्यहू राजा के बारे लीन योग को धार ॥
सब गुण आगर दोउ नागर हैं योगी कामरूप अवतार २०
क्यहू पियासे लरिका घर में भोजन करैं क्यहू भरतार ॥
पै ते भूलीं दोउ योगिन में तन मन केरो नहीं सँभार २१
गावत नाचत दोऊ योगी पहुँचे नरपति के दरबार ॥
बाजा डमरू तहँ देवा का नाचा बेंदुल का असवार २२
कमर झुकावै भाव बतावै गावै देशराज का लाल ॥
देखि तमाशा यहु योगिन का भा मनवड़ा खुशीनरपाल २३
नरपति बोला तब योगिन ने साँचे हाल देउ बतलाय ॥
कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ चाहौ काह लेनको भाय २४
हम तो आये बंगाले ते जावैं हिंगलाज महराज ५
१८ . आल्हखण्ड । २५६
द्रव्य न चाहैं कछु महराजा केवल उदरभरनसों काज २५
सुनिकै बातें ये देवा की बोला नरवरका सरदार ॥
धुरपद गावो यहि समया में भोजन अबै होय तय्यार २६
बातें सुनिकै महराजा की बोला देशराज का लाल ॥
ब्याही नारी के हाथे का भोजन करें नहीं नरपाल २७
इतना सुनिकै राजा बोले योगी मानो कही हमार ॥
है जो कन्या उपरोहित कै भोजन सोई करी तैयार २८
देवा बोला तब राजा ते यह नहिं ठीक भूमिभरतार ॥
जरिजा अँगुरी जो बाम्हनिकै हमरो योगहोय सब छार २६
शास्त्र पुराणन को जानैं हम मानैं लिखा ठीक महराज ॥
मारै शापै गारी देवै तबहूँ बिप्र पूजने काज ३०
होय जो कन्या तुम्हरे घर की भोजन करै स्वई तैयार ॥
तौ तौ योगी भोजन करि हैं नाहीं मांगैं और दुवार ३१
इतना सुनिकै फिरि बोलत भा राजा नरवर का सरदार ॥
बेटी हमरी जो फुलवा है सोई भोजन करी तयार ३२
इतना सुनिकै योगी बोले यहही ठीक रहा महराज ॥
धर्म न जैहै कछु योगिन का रहि है दऊ दिशाकीलाज ३३
पुत्र आपने मकरन्दा को तबहीं बोलि लीन नरपाल ॥
फुलवा बहिनी जो तुम्हरी है तासों कहौजाय यह हाल ३४
इतना सुनिकै मकरँद चलिभा औ फुलवा ते कहा सुनाय ॥
बातें सुनि है मकरन्दा की माता पास पहुँची आय ३५
आयसु लैके महतारी की भोजन करन लागि तैयार ॥
नाचैं गावैं दोऊ योगी मोहित भयो राजदरबार ३६
भयो बुलावा फिरि महलन में योगी करें चलैं ज्यँउनार ॥
उदयसिंहका विवाह। २५७ १६ ˙
इतना सुनिकै योगी चलिभे पीढ़न बैठिगये सरदार ३७
भोजन परसन फुलवा लागी देवा चितय दीन कईबार ॥
बैठे पाटापर बघऊदन मनमाँलाग्यो करनविचार ३८
किह्यो रसोई कारी कन्या भोजन केर नहीं अधिकार ॥
बनि बौराहा जो हम जावैं तौ रहिजावै धर्म हमार ३६
देवा बोला फिरि ऊदन ते यहही फुलवा है सरदार ॥
इनही कारण नाक छिदायो धारयो बेष जनाना यार ४०
किह्यो बहाना ह्याँ ऊदन ने औ गिरि गयो पछाराखाय ॥
रानी चंपा दौरति आई योगिन पास पहुँची आय ४१
कौर डारिकै देवा योगी तहँपर बार बार पछिताय ॥
देखिकै सूरति लघुयोगी कै चंपा बोली बचन सुनाय ४२
पाप आयगा यहिके मनमाँ तांते गिरा पछाराखाय ॥
योगी नाहीं यहु भोगी है यहिका डारों पेट फराय ४३
मकरँद लरिका का बुलवावों यहिका योग सिद्ध हैजाय ॥
इतना सुनिकै देवा बोला रानी काह गई बौराय ४४
भूत चुरैलै यहि महलन में की क्यहु नजरि लगाई आय ॥
जो कछु होई यहिके जीका तौ फिरि योग देयँदिखराय ४५
ऐसे वैसे हम योगी ना ना हम माँगैं खेत खरिहान ॥
हमतो योगी संतोषी हैं जाने काह नारि बैलान ४६
सुनिकै बातें ये देवा की रानी गई सनाकाखाय ॥
जल के छीटा फुलवा मारे जागा तुरत बनाफरराय ४७
बड़ी खुशाली देवा कीन्ह्यो लीन्ह्यो तुरत ताहि लपटाय ॥
ऊदन बोले तब रानी ते तुमका साँचदेयँ बतलाय ४८
परिगै छाया क्यहु ब्याही कै ताते गई मूरछा आय ॥
१७
२० आल्हाखण्ड । २५८
फुलवा बोली तब माताते योगी साँच रहा बतलाय ४६
परिगै छाया जब बाँदी कै तबहीं गिरा मूरछाखाय ॥
ऊदन बोले तब रानी ते ह्याँते जान चहैं हम माय ५०
इतना सुनिकै चम्पा बोली योगी मानो कही हमार ॥
भोजन दूसर हम परसावैं योगी जँयलेउ ज्यवनार ५१
देवा बोला तब रानी ते साँचे बचन करो परमान ॥
फिरिकै बैठें हम चौकाना पूरण नियम हमारो जान ५२
ऐसे योगी आगे हैं हैं भोगिहैं भोगस्वादवश आय ॥
तैसे योगी हम नाहीं हैं अपनो डारैं नियम नशाय ५३
योगी हैकै भोगी होवै शोचन योग सोय अधिकाय ॥
इतना कहिकै दोऊ योगी माँगिकै बिदा चले हर्षाय ५४
आयकै पहुँचे मालिनि घरमाँ योगिनबाना धरे उतार ॥
पाग बैंजनी शिरपर बाँधी नाहर उदयसिंह सरदार ५५
ऊदन बोले फिरि देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥
कई महीना ह्याँपर गुजरे ना अब रहिगा द्रव्यठिकान ५६
घोड़ खरीदन कासों जावैं यहही शोच होय अधिकाय ॥
पै कछु औषधि ह्याँ सूझैना कैसी करी यहांपर भाय ५७
का लै जावैं अब मोहबे को काबुल काह खरीदैं जाय ॥
इतना सुनिकै देवा बोले धीरज धरो लहुरवाभाय ५८
गत नहिंशोधैं कहुँ पण्डितजन मत यह ठीक हृदय ठहराय ॥
कूच करावो अब नरवरते चलिये नगरमोहोबे भाय ५६
यह हम कहिबे परिमालिकते नरवर टिक्यन चँदेलेराय ॥
भूज तुरैलै इनके लागीं ऊदन तहां गये बौराय ६०
कछु नहिं आशा तहँ बचनेकी निश्चय गई प्राणपै आय ॥
उदयसिंहका विवाह । २५६ २१
कीन दवाई हम ऊदन की सब धन आये तहाँ गँवाय ६१
यह मन भाई उदयसिंह के तुरतै कूच दीन करवाय ॥
कीरतिसागर के डाँड़े पर पहुंचे फेरि बनाफर आय ६२
उतरि बेंदुला ते भुइँ आये तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥
परिगा पलँगा तहँ ऊदन का लेटे तहाँ बनाफरराय ६३
उबटन लाग्यो भल हल्दी का पीली देह परै दिखराय ॥
भोजन कमती कैदिन खायो तासोंबदनगयो कुम्हिलाय ६४
करिकै सूरति बीमरिहा कै बोला उदयसिंह सरदार ॥
बात बनावो परिमालिक ते तौ रहिजावै धर्म हमार ६५
गंगा कीन्ही हम फुलवा सँग तुम्हरो ब्याह करब ह्याँ आय ॥
टरै प्रतिज्ञा जो क्षत्री कै तौफिरि जहरखाय मरि जाय ६६
मित्र साँकरो फिरि ऐसो अब परिहै बार बार नहिं आय ॥
इतना सुनिकै देवा चलिभा पहुंचा जहाँ चँदेलोराय ६७
सूरति दीख्यो जब देवा की भा मन खुशी रजापरिमाल ॥
हाथ जोरिकै देवा बोल्यो औ ऊदनके कह्यो हवाल ६८
लगीं चुरैलैं नरवरगढ़ में ऊदन हैगे हाल बिहाल ॥
रूपिया पैसा सब खर्चा भे रहिगा कछू नहीं नरपाल ६६
कीरतिसागर तम्बू भीतर ब्याकुल परा लहुरवाभाय ॥
इतना सुनिकै परिमालिक जी तुरतै गये सनाकाखाय ७०
लिखिकै पाती आल्हाजी को तुरतै धावन लीन बुलाय ॥
दैके पाती फिरि धावन को बाकी हाल कह्यो समुझाय ७१
लैंकै पाती धावन चलिभा दशहरिपुरै पहूँचा जाय ॥
दीन्ह्यो पाती जब आल्हा को बाँचा आंकु आंकु निरताय ७२
पढ़िकै पाती आल्हा ठाकुर तुरतै हाथी लीन मँगाय ॥
२२ आल्हखण्ड । २६०
चढ़िकै हाथी आल्हा चलिभे मनमाँ सुमिरि शारदामाय ७३
कीरतिसागरपर पहुंचत भा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥
चढ़े पालकी परिमालिकजी सोऊ अटे वहाँपर जाय ७४
पौढ़ा पलँगापर बघऊदन पागल बना बनाफरराय ॥
देखि सनाका परिमालिक भे मनमाँ बार बार पछिताय ७५
ऊदन ऊदनकै गोहरायो आल्हा बैठि पलँगपर जाय ॥
जब नहिं बोले बघऊदन हैं आल्हा बोले बचन रिसाय ७६
तुम्हीं पठायो है ऊदन को साँची सुनो चँदेलेराय ॥
जो कछु जीका यहिके होईहै मोहवा तुरत द्याव फूँकवाय ७७
बोलि न आवा परिमालिक ते हाँ अरु हूँव बन्दभा भाय ॥
ऊदन ऊदन कै गोहरायो बारम्बार चँदेलेराय ७८
तबहूं ऊदन कछु बोले ना आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥
उठिकै चुप्पे चढ़ि हाथीमाँ दशहरिपुरै पहुंचे आय ७६
हाल बतायो सब सुनवाँ को सुनतै गई सनाकाखाय ॥
सोचन लागी अपने मनमाँ साँची बात गई जिय आय ८०
आँखि लागिगै तहँ फुत्तवाकै ब्याकुल भये लघुरवामाय ॥
पूरी गवाही मन यह दीन्ह्यो साँची ठीक लीन ठहराय ८१
यहै सोचिकै सुनवाँ बोली लीजै ऊदन यहाँ बुलाय ॥
करब दवाई हम ऊदन कै नीको होय बनाफरराय ८२
यह मन भायगई आल्हा के तुरतै पलकी दीन पठाय ॥
सौंपिकै देवा को ऊदन का औ चलिभयो चँदेलेराय ८३
खबरि फैलिगै यह मोहवेमाँ ब्याकुल उदयसिंह सरदार ॥
जितनी रानी परिमालिक की रोईं छाँड़ि सबै डिंडकार ८४
जितनी रय्यत रह मोहवे की कीरतिसागर चली बिहाल ॥
उदयसिंहका विवाह । २६१ २३
जायके देखें जब ऊदन को रोवैं तहाँ बृद्ध औ बाल ८५
गई पालकी जब आल्हा की चकरन जाय कहा सब हाल ॥
सुनवाँ भौजीने बुलवायो चलिये देशराज के लाल ८६
हमसोंफिरिफिरि यह समुझायो आवैं यहाँ लहुरवाभाय ॥
करब दवाई हम नीकी बिधि चंगे होयँ बनाफरराय ८७
सुनिकै बातें ये चकरन की ऊदन ठीक लीन ठहराय ॥
हाल बतावब जो भौजीते हैहैं काम सिद्धि तहँ जाय ८८
यहै सोचिकै मन अपने माँ पलकी चढ़ा लहुरवाभाय ॥
चारि कहरवा हुँकरत चलिगे दशहरिपुरै पहुंचे आय ८६
उतरि पालकी ते भुइँ आवा द्यावलि देखिगई घबड़ाय ॥
रानी सुनवाँ तहँ चलिआई औ करगहिकै गईलिवाय ६०
जायकै पहुंची निजमहलन में पलँगा उपर दीन बैठाय ॥
पूँछन लागी बघऊदन ते साँचे हालदेउ बतलाय ६१
आँखि लागिगै का फुलवा कै द्यावर विकलभयो अधिकाय ॥
सुनिकै बातें ये भौजीकी बोला तुरत बनाफरराय ६२
जैसे साँची तुम पुछती हौ तैसे साँच देयँ बतलाय ॥
किरिया कीन्ही हम फुलवा तै भौरी करब तुम्हारी आय ६३
काह बतावैं हम भौजी ते नाकछु सूझा और उपाय ॥
तब बौराहा बैनिकै आयन तुमते साँचदीन बतलाय ६४
इतना सुनिकै सुनवाँ बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥
काठक घोड़ा बाण अजीता उनघर सेल शनीचर आय ६५
कैसे किरिया तुम कै लीन्ही देवर भूल भई अधिकाय ॥
तेहिते चुप्पे घरमाँ बैठो मानो कही बनाफरराय ६६
वैसी फुलवा लाखन मिलि हैं आपन साँच लहुरवा भाय ॥
२४ आल्हखण्ड । २६२
यह नहिं भाई मन ऊदन के सुनतै वदन गयो कुम्हिलाय ६७
जब रुख दीख्यो यह ऊदन का सुनवाँ चली महलते धाय ॥
जायकै पहुँची आल्हा ढिगमाँ औ सब हाल कहा समुझाय ६८
सुनिकै बोले आल्हा ठाकुर तिरिया काह गई बौराय ॥
बेढब राजा है नरवर का तहँ शिर कौन कटावै जाय ६६
इतना सुनिकै सुनवाँ बोली क्षत्री पूत बनाफरराय ॥
तुमका बातें ये छाजैं ना कन्ता वार वार बलिजायँ १००
इतना सुनिकै आल्हा बोले तिरिया बिना बुद्धिकी आय ॥
नाहक हिंसा हम करिहैं ना मरिहैं जीवजन्तु अधिकाय १०१
इतना सुनिकै सुनवाँ बोली दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥
यह नहिं हिंसा है क्षत्री कै कीन्हेनि युद्ध कृष्ण यदुराय १०२
सोलह सहस आठ कन्यन को लड़िकै लीन कृष्ण महराज ॥
तिनकी बहिनी के पति अर्जुन कीन्हेनि युद्ध द्रौपदी काज १०३
धर्म धुरंधर भीषम हैगे लड़िगे काशिराज घर जाय ॥
अम्बा अम्बे अम्बालिका को लाये जीति नृपन समुदाय १०४
पै कछु हिंसा तिन मानी ना जानैं धर्म कर्म अधिकाय ॥
पढ़िकै भूल्यो तुम महराजा की यहि अवसर गयो डेराय १०५
लड़नो मरनो समरभूमि में यहही क्षत्री को बयपार ॥
लहँगा लुगरा हमरो पहिरो अपनी देउ ढाल तलवार १०६
मैं चढ़िजाऊँ नरवरगढ़ को व्याहूं जाय लहुरुवा भाय ॥
किरिया कीन्ही बघऊदन ने भौंरी करब यहाँ पर आय १०७
झूठी किरिया जो ह्वैजैहै तौ मरि जाय जहर को खाय ॥
ऐसो वैसो बघऊदन ना गंगा झूठ उलीचै जाय १०८
उदय दिवाकर हों पश्चिम में चन्दा चहौ रसातल जाय ॥
उदयसिंहका विवाह । २६३ २५
सोंकि समुन्दर चहु महि लेवै बिल्ली लड़ै सिंहसों आय १०६
ये अनहोनी चहु हैव जावै झूठ न कहै लहुरवा भाय ॥
इतना सुनिकै आल्हा बोले अब तू चुपसाधिरहिजाय ११०
टरिजा टरिजा री सम्मुख ते काहे बार बार बकाय ।
ब्याहन जैबे हम नरवर में तहदिल होयँ बनाफरराय १११
इतना सुनिकै सुनवाँ चलि भै आल्हा रूपना लीन बुलाय ॥
लिखिकै चिट्ठी मलखानेको सिरसा तुरतदीन पठवाय ११२
खबरि पायकै मलखे ठाकुर दशहरिपुरै पहुँचे आय ।
हाथ जोरिकै द्वउ आल्हा के बोले चरण शीश नवाय ११३
काह आज्ञा है दादा कै जो सेवक का लीन बुलाय ॥
सुनिकै बातें मलखाने की आल्हाहाल कहासमुझाय ११४
घोड़ खरीदन गे काबुल को नरवर नैन खरीदनि जाय ॥
बनि बौगहा ऊदन बैठे चलिये ब्याहकरन अबभाय ११५
बड़ी खुशहाली भै मलखे के बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥
न्यवत पठावो सब राजन को दादा भली बनी यह आय ११६
इतना सुनिकै आल्ही ठाकुर तुरतै धावन लीन बुलाय ॥
पाती लिखिकै सबराजन को तुरतै न्यवतं दीनपठवाय ११७
यक हरिकारा गा भुन्नागढ़ यक नैनागढ़ दीन पठाय ॥
यक हरिकारा गा बौरीगढ़ दिल्ली एक पहुँचा जाय ११८
उरई कनौउज सिरसा मोहबे सबने न्यवत दीन पठवाय ॥
खबरि पायकै सब राजागण दशहरिपुरै पहूंचे आय ११९
कीनि खातिरी सबके आल्हा डंका तुरत दीन बजवाय ॥
बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्दगा छाय १२०
ब्यावलिबोली फिरि आल्हा ते मानो कही बनाफरराय ॥
२४ आल्हखण्ड । २६४
रीती भाँती मल्हना करि हैं पाल्यो बारे दूध पिलाय १२१
कौन हितैषी है मल्हना सम ह्याँते कूच देउ करवाय ॥
सुनिकै बातें ये माता की आल्हा कूचदीन करवाय १२२
कीरतिसागर मदनताल पर डेरा गड़े नृपन के आय ॥
आल्हा ऊदन मलखे सुलखे मल्हना महल पहुँचेजाय १२३
द्यावलि बिरमा सुनवाँ आदिक येऊ गईं तहाँ पर आय ॥
बड़ी खुशहाली भै मल्हना के हमरे बूत कही ना जाय १२४
चूड़ामणि पण्डित को तुरतै आल्हा लीन तहां बुलवाय ॥
तेल कि साइति सो बतलायो सुवरणकलशलीनमँगाय १२५
घृतको दीपक धरि कलशापर चौकी तहाँ दीन डरवाय ॥
ऊदन बैठे फिरि चौकी पर मनमें सुमिरि शारदामाय १२६
एक कुमारी तेल चढ़ावै गावन लगीं तहाँ सब गीत ॥
आई विरिया फिरि नहखुर की पगियाधरी शीशपरपीत १२७
कङ्कण बांधा गा हाथेमाँ शिरपर मौरदीन धरवाय ॥
ब्याहके कपड़ा फिरि पहिरायो पलकीतुरतलीनमँगाय १२८
सुमिरि भवानी महिरवाली पलकी बैठ बनाफरराय ॥
बेटी बैठी चन्द्रावलि तहँ राईलोन उतारति जाय १२९
चली पालकी बघऊदन की कुँवना पास पहुँची आय ॥
इन्द्रसेन चन्द्रावलि दुलहा सोकुँवनापरगयोलिवाय १३०
रानी मल्हना त्यहि समयामें दीन्ह्यो कुँवाँ पैर लटकाय ॥
पहिली भाँवरिके घूमत खन ऊदन लीन्ह्यो पैर उठाय १३१
प्राणनेग मैं तुमको दीन्हे माता कादु पैर डरपाय ॥
याविधि कहिकै सातों भाँवरि घूमे तहां बनाफरराय १३२
बैठे पलकी फिरि बघऊदन आल्हा नेगदीन चुकवाय ॥
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उदयसिंहका विवाह । २६५ २७
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भये अयाचक सब याचकगण जयजयकार रहे तहँगाय १३३
कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥
बैठे हाथी आल्हा ठाकुर करिकै रामचन्द्रको ध्यान १३४
मलखे सुलखे देवा ब्रह्मा मन्नागूजर भयो तयार ॥
औरो राजा न्योते आये तिनहुन बाँधिलीन हथियार १३५
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िंगे बाँके घोड़न भे असवार ॥
कूच कराय दयो मोहबेते चलिभे सबै शूर सरदार १३६
खर खर खर खर कै रथ दौरे चह चह धुरी रहीं चिल्लाय ॥
चलिभैं फौज दल बादल सों शोभाकही बूत ना जाय १३७
झम्झम्झम्झम् झीलमबोलैं मर्मर होयँ गैंड़की ढाल ॥
मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल १३८
छाय अँधेरिया गै मारग में छिपिगे अन्धकार सों भान ॥
को गति बरौ शहजाद्यन कै एकते एक रूप गुणखान १३६
तेगा लीन्हे बर्दवान के कोता खानी लिहे कटार ॥
यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एक तलवार १४०
आठरोज का धावा करिकै नरवर पास गये नगच्याय ॥
पांचकोस जब नरवर रहिगा मलखे डेरा दीन डराय १४१
ऊंची टिकुरिन तम्बू गड़िगे नीचे लागीं खूब बजार ॥
हौदा उतरे तहँ हाथिन के क्षत्रिन छोरिधरा हथियार १४२
जहँना तम्बूहै आल्हा का तहँना लाग खूब दरबार ॥
चूड़ामणि पण्डित तहँ बैठे साइतिलागे करनविचार १४३
ऐपनवारी की साइति है पण्डित कहा सुनो मलखान ॥
मलखे बोले तब रुपना ते हमरे करो बचन परमान १४४
ऐपनवारी बारी लैके नरपति द्वार देउ पहुँचाय ॥
२८ आल्हखण्ड । २६६
इतना सुनिकै रूपन बोले दोऊहाथजोरिशिरनाय १४५
ऐपनवारी बारी लै कै दूसर जाय आज महराज ॥
नैना भुन्ना औ दिल्ली में कीन्हे हमीं अकेले काज १४६
मूड़ कटावन हम जैबे ना मानो कही वीर मलखान ॥
इतना सुनिकै मलखे बोले ⁃हारीबात कहौ तुम ज्वान १४७
गदका बाना पटा बनेठी अइहैं कौन दिवस ये काज ॥
पहिले मुर्चा तुम्हीं कैकै राख्यो देशदेशमें लाज १४८
उदन वियाहे का रहिहैं ना बतियाँ कहिबे का रहिजायँ ॥
यहु दिनमिलिहैं फिरिकबहूंना तातेसोचिसमझिवतलाय १४६
इतना सुनिकै रूपन बोला ठाकुर सिरसा के सरदार ॥
घोड़ बेंडुला हमको देवो ऊदन केरि देउ तलवार १५०
घोड़ बेंडुला को मँगवायो औ दैदीन ढाल तलवार ॥
ऐपनवारी बारी लै कै , बेंडुल ऊपर भयो असवार १५१
ऐंड़ा मसक्यो जब बेंडुलके तुरतै चला हवाकी चाल ॥
राजा नरपति के द्वारेपर रूपनपहुँचिगयोततकाल १५२
द्वारपालने तब ललकार्यो नाहर घोड़े के असवार ॥
कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ कहँ है देश रावरे क्यार १५३
इतना सुनिकै रूपन बोले तुम सुनि लेउ हमारो हाल ॥
देश हमारो नगर मोहोबा जहँपर बसैं रजा परिमाल १५४
छोटो भय्या जो आल्हा को बेटा देशराज को लाल ॥
कारी कन्या जो नरपति कै ब्याहनअयेरजापरिमाल १५५
ऐपनवारी हम लै आये रूपन बारी नाम हमार ॥
खबरि जनावो तुम राजा को बारी खड़ा तुम्हारे द्वार १५६
नेग आपने को झगरत है सो अब पड़े देयँ सरदार ॥
उदयसिंहका विवाह । २६७ २६
इतना सुनिकै द्वारपाल कह बारी घोड़े के असवार १५७
नेग बतावो तुम द्वारे का राजै सबऊ सुनावैं जाय ॥
इतना सुनिकै रूपन बोला तुमसों साँचदेयँ बतलाय १५८
चार घरीभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥
नेग - हमारो यह साँचा है याँच आय तुम्हारे द्वार १५६
सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल ततकाल ॥
पीकै दारू द्वारे आये टेढ़ी बात कहै मतवाल १६०
टरिजा टरिजा अब द्वारे ते ओ मतवाले जाति गँवार ॥
असगति नाहीं क्यहुराजा की द्वारे करै आय तलवार १६१
काल गाल माँ तू बैठा है मानै साँच बात यहिवार ॥
हवा खायकै ठंढे ह्वैकै बोलै घोड़े के असवार १६२
इतना सुनिकै रूपन बोला गरुई हाँक दीन ललकार ॥
हाथ सिपाही पर डारै ना जबलग मिलै ढूँढ़िसरदार १६३
हमका जानैं दिल्ली वाले जिनके द्वारकीन तलवार ॥
भुन्नागढ़ औ नैनागढ़ में द्वारे बही रक्तकी धार १६४
चारि रुपल्ली का नौकर तू टिलटिलटिलटिल रहा मचाय ॥
इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि सुनाई जाय १६५
जितनी गाथा रूपन बोले गासो यथातथ्य सब गाय ॥
सुनिकै बातें द्वारपाल की नरपति तुरतै उठा रिसाय १६६
हुकुम लगायो मकरन्दा ते बारी पकरि दिखावै आय ॥
विजयसिंह विजहट को राजा मकरँदसाथचला रिसियाय१६७
द्वारे दीख्यो जब रूपन को गरुई हाँक दीन ललकार ॥
खबरदार हो खबरदार हो बारी घोड़े के असवार १६८
काल गाल माँ तू बैठा है अबहीं जान चहत यमद्वार ॥
३० आल्हखण्ड । २६८
इतना सुनिकै विजयसिंहने अपनी खैंचिलई तलवार १६६
खैंचि सिरोही रूपन लीन्ह्यो द्वारे होन लगी तब मार ॥
अगल बगल में बेंदुल मारै रूपन खूब कीन तलवार १७०
घायल ह्वैगे विजयसिंह जब तब सब बढ़े लड़ैया ज्वान ॥
दांतन काटै टापन मारै बेंदुल खूब कीन मैदान १७१
कोगति वरनै तहँाँ त्येनकै दोऊ हाथ करै तलवार ॥
रंग बिरंगे क्षत्री ह्वैगे मानो होली खेलैं गँवार १७२
कितन्यों क्षत्री घायल ह्वैगे कितन्यों गिरिगे खाय पछार ॥
मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार १७३
बड़ी लड़ाई भै रूपन ते द्वारे बही रक्तकी धार ॥
देखि तमाशा त्यहि बारीका क्षत्री गये मनैमन हार १७४
ऐंड़ा मसक्यो फिरि बेंदुल कें फाटक पार पहुँचा जाय ॥
मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री चले पछारी धाय १७५
रूपन पहुँचा त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ॥
जितने क्षत्री नरवरगढ़के आये लौटि सबैकिसियाय १७६
जितनी गाथा रह द्वारे की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥
रूपन बारी की बातें सुनि भे मन खुशी बनाफररांय १७७
खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७८
माथ नवायौं पितु अपने को ह्यँाँ ते करों तरँगको अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं माँगों यही भवानीकन्त १७६
इतिश्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि
मिश्रवंशोद्भववुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतरूपनबिजम
वर्णनौनामद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥
उदयसिंहका विवाह। २६६ ३१
सवैया ॥
दीनदयाल कृपाल भुवाल तुम्हीं सब काल करो रखवारी ।
मारीच सुबाहु सुरासुरनाहु तुम्हीं पल एकहि में संहारी ॥
बालिवली खरदूषण रावण आप हन्यो सबको धनुधारी ।
काम औ क्रोध औ लोभ हटाय करो ललिते रघुनाथ सुखारी १
सुमिरन ॥
दोउ पद वन्दौं भरतलालके जिनसम धन्यजगतकोआन ॥
बड़े पियारे रघुनन्दन के इनयशबालमीकि करगान १
भायप निबह्यो जस भारत जग आरत भये रामसों जाय ॥
राज्य न लीन्ही रघुनन्दन जब आपौ कीन योग घर आय २
सब जग ध्यावै रघुनन्दन को रघुवर करैं भरतको याद ॥
रघुवर लछिमन भरत शत्रुहन चहु ज्यहि भजैं छांड़िकै बाद ३
जो ज्यहि भावै सो त्यहि ध्यावै आवै सबै आपने काज ॥
क्यहू न ध्यावै सो दुखपावै औ बड़ होवै तासु अकाज ४
हमरे सर्वोपरि एकै हैं स्वामी रामचन्द्र महराज ॥
तिन्हें बिसारैं तौ दुखपावैं यह मन सदा हमारे राज ५
छूटि सुमिरनी गै रघुवर कै सुनिये नरवर केर हवाल ॥
ब्याह बखानैं उदयसिंह का लड़िहैं बड़े बड़े नरपाल ६
अथ कथाप्रसंग ॥
नरपति राजा नरवरगढ़ का भारी लाग राजदरवार ॥
बैठे छत्री अलबेला तहँ एकते एक शूर सरदार १
नरपति बोला मकरन्दा ते तुम सुत मानो कही हमार ॥
बड़े लड़ैया मोहबेवाले बारी भली कीन तलवार २
काह तुम्हारे अब मनमाँ है हमसे साँच देउ बतलाय ।