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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

उदयसिंहका विवाह । २६७ २६
इतना सुनिकै द्वारपाल कह बारी घोड़े के असवार १५७
नेग बतावो तुम द्वारे का राजै सबऊ सुनावैं जाय ॥
इतना सुनिकै रूपन बोला तुमसों साँचदेयँ बतलाय १५८
चार घरीभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥
नेग - हमारो यह साँचा है याँच आय तुम्हारे द्वार १५६
सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल ततकाल ॥
पीकै दारू द्वारे आये टेढ़ी बात कहै मतवाल १६०
टरिजा टरिजा अब द्वारे ते ओ मतवाले जाति गँवार ॥
असगति नाहीं क्यहुराजा की द्वारे करै आय तलवार १६१
काल गाल माँ तू बैठा है मानै साँच बात यहिवार ॥
हवा खायकै ठंढे ह्वैकै बोलै घोड़े के असवार १६२
इतना सुनिकै रूपन बोला गरुई हाँक दीन ललकार ॥
हाथ सिपाही पर डारै ना जबलग मिलै ढूँढ़िसरदार १६३
हमका जानैं दिल्ली वाले जिनके द्वारकीन तलवार ॥
भुन्नागढ़ औ नैनागढ़ में द्वारे बही रक्तकी धार १६४
चारि रुपल्ली का नौकर तू टिलटिलटिलटिल रहा मचाय ॥
इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि सुनाई जाय १६५
जितनी गाथा रूपन बोले गासो यथातथ्य सब गाय ॥
सुनिकै बातें द्वारपाल की नरपति तुरतै उठा रिसाय १६६
हुकुम लगायो मकरन्दा ते बारी पकरि दिखावै आय ॥
विजयसिंह विजहट को राजा मकरँदसाथचला रिसियाय१६७
द्वारे दीख्यो जब रूपन को गरुई हाँक दीन ललकार ॥
खबरदार हो खबरदार हो बारी घोड़े के असवार १६८
काल गाल माँ तू बैठा है अबहीं जान चहत यमद्वार ॥