आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ . आल्हखण्ड । २५६
द्रव्य न चाहैं कछु महराजा केवल उदरभरनसों काज २५
सुनिकै बातें ये देवा की बोला नरवरका सरदार ॥
धुरपद गावो यहि समया में भोजन अबै होय तय्यार २६
बातें सुनिकै महराजा की बोला देशराज का लाल ॥
ब्याही नारी के हाथे का भोजन करें नहीं नरपाल २७
इतना सुनिकै राजा बोले योगी मानो कही हमार ॥
है जो कन्या उपरोहित कै भोजन सोई करी तैयार २८
देवा बोला तब राजा ते यह नहिं ठीक भूमिभरतार ॥
जरिजा अँगुरी जो बाम्हनिकै हमरो योगहोय सब छार २६
शास्त्र पुराणन को जानैं हम मानैं लिखा ठीक महराज ॥
मारै शापै गारी देवै तबहूँ बिप्र पूजने काज ३०
होय जो कन्या तुम्हरे घर की भोजन करै स्वई तैयार ॥
तौ तौ योगी भोजन करि हैं नाहीं मांगैं और दुवार ३१
इतना सुनिकै फिरि बोलत भा राजा नरवर का सरदार ॥
बेटी हमरी जो फुलवा है सोई भोजन करी तयार ३२
इतना सुनिकै योगी बोले यहही ठीक रहा महराज ॥
धर्म न जैहै कछु योगिन का रहि है दऊ दिशाकीलाज ३३
पुत्र आपने मकरन्दा को तबहीं बोलि लीन नरपाल ॥
फुलवा बहिनी जो तुम्हरी है तासों कहौजाय यह हाल ३४
इतना सुनिकै मकरँद चलिभा औ फुलवा ते कहा सुनाय ॥
बातें सुनि है मकरन्दा की माता पास पहुँची आय ३५
आयसु लैके महतारी की भोजन करन लागि तैयार ॥
नाचैं गावैं दोऊ योगी मोहित भयो राजदरबार ३६
भयो बुलावा फिरि महलन में योगी करें चलैं ज्यँउनार ॥