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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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२४ आल्हखण्ड । २६४
रीती भाँती मल्हना करि हैं पाल्यो बारे दूध पिलाय १२१
कौन हितैषी है मल्हना सम ह्याँते कूच देउ करवाय ॥
सुनिकै बातें ये माता की आल्हा कूचदीन करवाय १२२
कीरतिसागर मदनताल पर डेरा गड़े नृपन के आय ॥
आल्हा ऊदन मलखे सुलखे मल्हना महल पहुँचेजाय १२३
द्यावलि बिरमा सुनवाँ आदिक येऊ गईं तहाँ पर आय ॥
बड़ी खुशहाली भै मल्हना के हमरे बूत कही ना जाय १२४
चूड़ामणि पण्डित को तुरतै आल्हा लीन तहां बुलवाय ॥
तेल कि साइति सो बतलायो सुवरणकलशलीनमँगाय १२५
घृतको दीपक धरि कलशापर चौकी तहाँ दीन डरवाय ॥
ऊदन बैठे फिरि चौकी पर मनमें सुमिरि शारदामाय १२६
एक कुमारी तेल चढ़ावै गावन लगीं तहाँ सब गीत ॥
आई विरिया फिरि नहखुर की पगियाधरी शीशपरपीत १२७
कङ्कण बांधा गा हाथेमाँ शिरपर मौरदीन धरवाय ॥
ब्याहके कपड़ा फिरि पहिरायो पलकीतुरतलीनमँगाय १२८
सुमिरि भवानी महिरवाली पलकी बैठ बनाफरराय ॥
बेटी बैठी चन्द्रावलि तहँ राईलोन उतारति जाय १२९
चली पालकी बघऊदन की कुँवना पास पहुँची आय ॥
इन्द्रसेन चन्द्रावलि दुलहा सोकुँवनापरगयोलिवाय १३०
रानी मल्हना त्यहि समयामें दीन्ह्यो कुँवाँ पैर लटकाय ॥
पहिली भाँवरिके घूमत खन ऊदन लीन्ह्यो पैर उठाय १३१
प्राणनेग मैं तुमको दीन्हे माता कादु पैर डरपाय ॥
याविधि कहिकै सातों भाँवरि घूमे तहां बनाफरराय १३२
बैठे पलकी फिरि बघऊदन आल्हा नेगदीन चुकवाय ॥