आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० आल्हाखण्ड । २५८
फुलवा बोली तब माताते योगी साँच रहा बतलाय ४६
परिगै छाया जब बाँदी कै तबहीं गिरा मूरछाखाय ॥
ऊदन बोले तब रानी ते ह्याँते जान चहैं हम माय ५०
इतना सुनिकै चम्पा बोली योगी मानो कही हमार ॥
भोजन दूसर हम परसावैं योगी जँयलेउ ज्यवनार ५१
देवा बोला तब रानी ते साँचे बचन करो परमान ॥
फिरिकै बैठें हम चौकाना पूरण नियम हमारो जान ५२
ऐसे योगी आगे हैं हैं भोगिहैं भोगस्वादवश आय ॥
तैसे योगी हम नाहीं हैं अपनो डारैं नियम नशाय ५३
योगी हैकै भोगी होवै शोचन योग सोय अधिकाय ॥
इतना कहिकै दोऊ योगी माँगिकै बिदा चले हर्षाय ५४
आयकै पहुँचे मालिनि घरमाँ योगिनबाना धरे उतार ॥
पाग बैंजनी शिरपर बाँधी नाहर उदयसिंह सरदार ५५
ऊदन बोले फिरि देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥
कई महीना ह्याँपर गुजरे ना अब रहिगा द्रव्यठिकान ५६
घोड़ खरीदन कासों जावैं यहही शोच होय अधिकाय ॥
पै कछु औषधि ह्याँ सूझैना कैसी करी यहांपर भाय ५७
का लै जावैं अब मोहबे को काबुल काह खरीदैं जाय ॥
इतना सुनिकै देवा बोले धीरज धरो लहुरवाभाय ५८
गत नहिंशोधैं कहुँ पण्डितजन मत यह ठीक हृदय ठहराय ॥
कूच करावो अब नरवरते चलिये नगरमोहोबे भाय ५६
यह हम कहिबे परिमालिकते नरवर टिक्यन चँदेलेराय ॥
भूज तुरैलै इनके लागीं ऊदन तहां गये बौराय ६०
कछु नहिं आशा तहँ बचनेकी निश्चय गई प्राणपै आय ॥