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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 265

२४ आल्हखण्ड । २६२
यह नहिं भाई मन ऊदन के सुनतै वदन गयो कुम्हिलाय ६७
जब रुख दीख्यो यह ऊदन का सुनवाँ चली महलते धाय ॥
जायकै पहुँची आल्हा ढिगमाँ औ सब हाल कहा समुझाय ६८
सुनिकै बोले आल्हा ठाकुर तिरिया काह गई बौराय ॥
बेढब राजा है नरवर का तहँ शिर कौन कटावै जाय ६६
इतना सुनिकै सुनवाँ बोली क्षत्री पूत बनाफरराय ॥
तुमका बातें ये छाजैं ना कन्ता वार वार बलिजायँ १००
इतना सुनिकै आल्हा बोले तिरिया बिना बुद्धिकी आय ॥
नाहक हिंसा हम करिहैं ना मरिहैं जीवजन्तु अधिकाय १०१
इतना सुनिकै सुनवाँ बोली दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥
यह नहिं हिंसा है क्षत्री कै कीन्हेनि युद्ध कृष्ण यदुराय १०२
सोलह सहस आठ कन्यन को लड़िकै लीन कृष्ण महराज ॥
तिनकी बहिनी के पति अर्जुन कीन्हेनि युद्ध द्रौपदी काज १०३
धर्म धुरंधर भीषम हैगे लड़िगे काशिराज घर जाय ॥
अम्बा अम्बे अम्बालिका को लाये जीति नृपन समुदाय १०४
पै कछु हिंसा तिन मानी ना जानैं धर्म कर्म अधिकाय ॥
पढ़िकै भूल्यो तुम महराजा की यहि अवसर गयो डेराय १०५
लड़नो मरनो समरभूमि में यहही क्षत्री को बयपार ॥
लहँगा लुगरा हमरो पहिरो अपनी देउ ढाल तलवार १०६
मैं चढ़िजाऊँ नरवरगढ़ को व्याहूं जाय लहुरुवा भाय ॥
किरिया कीन्ही बघऊदन ने भौंरी करब यहाँ पर आय १०७
झूठी किरिया जो ह्वैजैहै तौ मरि जाय जहर को खाय ॥
ऐसो वैसो बघऊदन ना गंगा झूठ उलीचै जाय १०८
उदय दिवाकर हों पश्चिम में चन्दा चहौ रसातल जाय ॥