आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ आल्हखण्ड । २५२
रानी कुशला के महलन में योगीरूपधरा तुम जाय १३९
घर घर लूटा तुम माड़ो माँ हमसों शपथकीन फिरिआय ॥
भेद बतावा घर अपने का तब तुमलीन बापका दायँ १४०
ब्याह हमारो जब तुम कीन्हा मलखे हना मोहिं ततकाल ॥
मिलन आपनो तुम्हें बतावा नाहर देशराज के लाल १४१
साँचो चाहत जो जाको है ताको स्वई मिलै सबकाल ॥
यह सुनि राखा हम विप्रन सों सो सब साँचाभयो हवाल १४२
पै गति तुम्हरी ह्वाँ नहीं है हमसों ब्याह करो सरदार ॥
बड़ा लड़ैया मकरन्दा है ज्यहिते हारिगई तलवार १४३
सुनिकै बातें ये फुलवा की बोला उदयसिंह सरदार ॥
काह हकीकति मकरन्दा कै साँची मानो कही हमार १४४
भल पहिचान्यो तुम मोका है अब सब पूर भये मम काम ॥
ब्याह तुम्हारो अब कीन्हे बिन / लौटिन जायँ आपनेधाम १४५
इतना सुनिकै फुलवा बोली मानो कही बनाफरराय ॥
काठक घोड़ा बाण अजीता जादू सेल शनीचर भाय १४६
व्यापी जियरा अति मेरो है ताते धीर धरा ना जाय ॥
करो बियारी तुम महलन में सोवो सेज बनाफरराय १४७
ऊदन बोले तब फुलवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ॥
क्वारी कन्या की शय्यापर कबहुँ न धरैं बनाफर पायँ १४८
धीरज राखो अपने मनमाँ सोवो तुरत सेज में जाय ॥
भयो भरोसा तब फुलवा के सोई विकट नींदको पाय १४९
तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय ॥
उये निशाकर आसमान में विरहिनिपीरभईअधिकाय १५०
माथ नवावों पितु अपने को ह्वाँ ते करों तरँग को अन्त ॥