आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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१६ आल्हखण्ड । २५४
बेटी फुलवा के महलन में जागा देशराजका लाल १
देवा बोला ह्याँ हिरियाते मालिनि मानो कही हमार ॥
देर लगावो अब घरमाँ ना लावो उदयसिंह सरदार २
लै कै पलकी मालिनि चलि भै फुलवा पास पहुँची जाय ॥
फुलवा बोली तब हिरियाते अब यहि जावो तुरत लिवाय ३
इतना सुनिकै ऊदन चलिभे पहुँचे तुरत द्वार में आय ॥
बैठ पालकी में बघऊदन मनमें सुमिरि शारदांमाय ४
आयकै पहुँचे जब मालिनिघर देवा बोला वचन सुनाय ॥
साथ जनाना का करिबे नाँ जैबे जहाँ चँदेलाराय ५
बन्यो जनाना तुम नरवर में कैहौं हाल जाय दरबार ॥
बाना छोड़े रजपूती का ऊदन जीवैका धिक्कार ६
इतना सुनतै कायल व्हैगा नाहर उदयसिंह सरदार ॥
पेट मारने के कारण सों ऊदन लीन्ही हाथ कटार ७
हाथ पकरिकै देवाठाकुर बोला सुनो बनाफरराय ॥
चरचा करिबे ना मोहबेमाँ ऊदन साँच देवँ बतलाय ८
भई लालसा हमरे मनमाँ फुलवा देखनको अधिकाय ॥
करु अभिलाषा पूरण हमरी आल्हाकेर ल्हुरवा भाय ६
ऊदन बोले तब देवाने तुमको कैसे लवँ दिखाय ॥
जैसे बताओ देवा ठाकुर तैसे साँचो करैं उपाय १०
इतना सुनिकै देवा बोले योगी बनो बनाफरराय ॥
अलख जगैवें पुर घर घर में याही सीधोसाद उपाय ११
गइ मनभाई बघऊदन के दूनों लीन्ह्यो भस्म रमाय ॥
काँधे माला औ मृगछाला आला योगिरूप बनाय १२
गुदड़ी लीन्ही दोऊ ठाकुर तामें छिपी ढाल तलवार ॥