आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें२२ आल्हखण्ड । २६०
चढ़िकै हाथी आल्हा चलिभे मनमाँ सुमिरि शारदामाय ७३
कीरतिसागरपर पहुंचत भा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥
चढ़े पालकी परिमालिकजी सोऊ अटे वहाँपर जाय ७४
पौढ़ा पलँगापर बघऊदन पागल बना बनाफरराय ॥
देखि सनाका परिमालिक भे मनमाँ बार बार पछिताय ७५
ऊदन ऊदनकै गोहरायो आल्हा बैठि पलँगपर जाय ॥
जब नहिं बोले बघऊदन हैं आल्हा बोले बचन रिसाय ७६
तुम्हीं पठायो है ऊदन को साँची सुनो चँदेलेराय ॥
जो कछु जीका यहिके होईहै मोहवा तुरत द्याव फूँकवाय ७७
बोलि न आवा परिमालिक ते हाँ अरु हूँव बन्दभा भाय ॥
ऊदन ऊदन कै गोहरायो बारम्बार चँदेलेराय ७८
तबहूं ऊदन कछु बोले ना आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥
उठिकै चुप्पे चढ़ि हाथीमाँ दशहरिपुरै पहुंचे आय ७६
हाल बतायो सब सुनवाँ को सुनतै गई सनाकाखाय ॥
सोचन लागी अपने मनमाँ साँची बात गई जिय आय ८०
आँखि लागिगै तहँ फुत्तवाकै ब्याकुल भये लघुरवामाय ॥
पूरी गवाही मन यह दीन्ह्यो साँची ठीक लीन ठहराय ८१
यहै सोचिकै सुनवाँ बोली लीजै ऊदन यहाँ बुलाय ॥
करब दवाई हम ऊदन कै नीको होय बनाफरराय ८२
यह मन भायगई आल्हा के तुरतै पलकी दीन पठाय ॥
सौंपिकै देवा को ऊदन का औ चलिभयो चँदेलेराय ८३
खबरि फैलिगै यह मोहवेमाँ ब्याकुल उदयसिंह सरदार ॥
जितनी रानी परिमालिक की रोईं छाँड़ि सबै डिंडकार ८४
जितनी रय्यत रह मोहवे की कीरतिसागर चली बिहाल ॥