आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदयसिंहका विवाह । २५६ २१
कीन दवाई हम ऊदन की सब धन आये तहाँ गँवाय ६१
यह मन भाई उदयसिंह के तुरतै कूच दीन करवाय ॥
कीरतिसागर के डाँड़े पर पहुंचे फेरि बनाफर आय ६२
उतरि बेंदुला ते भुइँ आये तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥
परिगा पलँगा तहँ ऊदन का लेटे तहाँ बनाफरराय ६३
उबटन लाग्यो भल हल्दी का पीली देह परै दिखराय ॥
भोजन कमती कैदिन खायो तासोंबदनगयो कुम्हिलाय ६४
करिकै सूरति बीमरिहा कै बोला उदयसिंह सरदार ॥
बात बनावो परिमालिक ते तौ रहिजावै धर्म हमार ६५
गंगा कीन्ही हम फुलवा सँग तुम्हरो ब्याह करब ह्याँ आय ॥
टरै प्रतिज्ञा जो क्षत्री कै तौफिरि जहरखाय मरि जाय ६६
मित्र साँकरो फिरि ऐसो अब परिहै बार बार नहिं आय ॥
इतना सुनिकै देवा चलिभा पहुंचा जहाँ चँदेलोराय ६७
सूरति दीख्यो जब देवा की भा मन खुशी रजापरिमाल ॥
हाथ जोरिकै देवा बोल्यो औ ऊदनके कह्यो हवाल ६८
लगीं चुरैलैं नरवरगढ़ में ऊदन हैगे हाल बिहाल ॥
रूपिया पैसा सब खर्चा भे रहिगा कछू नहीं नरपाल ६६
कीरतिसागर तम्बू भीतर ब्याकुल परा लहुरवाभाय ॥
इतना सुनिकै परिमालिक जी तुरतै गये सनाकाखाय ७०
लिखिकै पाती आल्हाजी को तुरतै धावन लीन बुलाय ॥
दैके पाती फिरि धावन को बाकी हाल कह्यो समुझाय ७१
लैंकै पाती धावन चलिभा दशहरिपुरै पहूँचा जाय ॥
दीन्ह्यो पाती जब आल्हा को बाँचा आंकु आंकु निरताय ७२
पढ़िकै पाती आल्हा ठाकुर तुरतै हाथी लीन मँगाय ॥