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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

उदयसिंहका विवाह। २५७ १६ ˙
इतना सुनिकै योगी चलिभे पीढ़न बैठिगये सरदार ३७
भोजन परसन फुलवा लागी देवा चितय दीन कईबार ॥
बैठे पाटापर बघऊदन मनमाँलाग्यो करनविचार ३८
किह्यो रसोई कारी कन्या भोजन केर नहीं अधिकार ॥
बनि बौराहा जो हम जावैं तौ रहिजावै धर्म हमार ३६
देवा बोला फिरि ऊदन ते यहही फुलवा है सरदार ॥
इनही कारण नाक छिदायो धारयो बेष जनाना यार ४०
किह्यो बहाना ह्याँ ऊदन ने औ गिरि गयो पछाराखाय ॥
रानी चंपा दौरति आई योगिन पास पहुँची आय ४१
कौर डारिकै देवा योगी तहँपर बार बार पछिताय ॥
देखिकै सूरति लघुयोगी कै चंपा बोली बचन सुनाय ४२
पाप आयगा यहिके मनमाँ तांते गिरा पछाराखाय ॥
योगी नाहीं यहु भोगी है यहिका डारों पेट फराय ४३
मकरँद लरिका का बुलवावों यहिका योग सिद्ध हैजाय ॥
इतना सुनिकै देवा बोला रानी काह गई बौराय ४४
भूत चुरैलै यहि महलन में की क्यहु नजरि लगाई आय ॥
जो कछु होई यहिके जीका तौ फिरि योग देयँदिखराय ४५
ऐसे वैसे हम योगी ना ना हम माँगैं खेत खरिहान ॥
हमतो योगी संतोषी हैं जाने काह नारि बैलान ४६
सुनिकै बातें ये देवा की रानी गई सनाकाखाय ॥
जल के छीटा फुलवा मारे जागा तुरत बनाफरराय ४७
बड़ी खुशाली देवा कीन्ह्यो लीन्ह्यो तुरत ताहि लपटाय ॥
ऊदन बोले तब रानी ते तुमका साँचदेयँ बतलाय ४८
परिगै छाया क्यहु ब्याही कै ताते गई मूरछा आय ॥
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