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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

उदयसिंहका विवाह । २६३ २५
सोंकि समुन्दर चहु महि लेवै बिल्ली लड़ै सिंहसों आय १०६
ये अनहोनी चहु हैव जावै झूठ न कहै लहुरवा भाय ॥
इतना सुनिकै आल्हा बोले अब तू चुपसाधिरहिजाय ११०
टरिजा टरिजा री सम्मुख ते काहे बार बार बकाय ।
ब्याहन जैबे हम नरवर में तहदिल होयँ बनाफरराय १११
इतना सुनिकै सुनवाँ चलि भै आल्हा रूपना लीन बुलाय ॥
लिखिकै चिट्ठी मलखानेको सिरसा तुरतदीन पठवाय ११२
खबरि पायकै मलखे ठाकुर दशहरिपुरै पहुँचे आय ।
हाथ जोरिकै द्वउ आल्हा के बोले चरण शीश नवाय ११३
काह आज्ञा है दादा कै जो सेवक का लीन बुलाय ॥
सुनिकै बातें मलखाने की आल्हाहाल कहासमुझाय ११४
घोड़ खरीदन गे काबुल को नरवर नैन खरीदनि जाय ॥
बनि बौगहा ऊदन बैठे चलिये ब्याहकरन अबभाय ११५
बड़ी खुशहाली भै मलखे के बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥
न्यवत पठावो सब राजन को दादा भली बनी यह आय ११६
इतना सुनिकै आल्ही ठाकुर तुरतै धावन लीन बुलाय ॥
पाती लिखिकै सबराजन को तुरतै न्यवतं दीनपठवाय ११७
यक हरिकारा गा भुन्नागढ़ यक नैनागढ़ दीन पठाय ॥
यक हरिकारा गा बौरीगढ़ दिल्ली एक पहुँचा जाय ११८
उरई कनौउज सिरसा मोहबे सबने न्यवत दीन पठवाय ॥
खबरि पायकै सब राजागण दशहरिपुरै पहूंचे आय ११९
कीनि खातिरी सबके आल्हा डंका तुरत दीन बजवाय ॥
बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्दगा छाय १२०
ब्यावलिबोली फिरि आल्हा ते मानो कही बनाफरराय ॥