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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

६३ अकबर'बीरबल विनोद

६३ अकबर'बीरबल विनोद
समय में उसके पास पाँच लाख रुपये एकत्रित नहीं हुये थे,
फिर भी इधर उधर से संग्रह कर सूद के सहित रुपये
लेकर उसके पास गया। मारवाड़ी तो एक सेर मांस का
भूखा था, इधर शर्तनामे की तिथि भी बीत चुकी थी इसलिये
रुपया लेने से साफ इनकार कर दिया और शर्तनामे के
अनुसार उससे एक सेर मांस माँगा। दीनदयाल बाहर
जाकर अस्वस्थ होगया था अब मांस देने की चिन्ता से और
भी बीमार हो गया। बीमारी के बहाने से टाल मटोल में
दो तीन दिन का समय और निकल गया।
जब महाजन ने देखा कि इस प्रकार काम बनना कठिन
है तो वह शर्तनामे को पेशकर अदालत से एक सेर मांस पाने
के लिये दादख्वाह हुआ। दीनदयाल तलब किया गया। वह
लाचार होकर बीमारी की हालत में पालकी में बैठकर
न्यायालय में उपस्थित हुआ।
मुकदमा पेश हुआ, काजी ने दीनदयाल से पूछा-“क्या
इस शर्तनामे के मुताबिक तुमने इस मारवाड़ी से एक हफ्ते
की मुद्दत पर पाँच लाख रुपये उधार लिये हैं ? शर्तनामे में
लिखा है“ कि यदि निर्धारित समय के अन्तर्गत रुपये न
चुका सकोगे तो मारवाड़ी के इच्छानुसार तुम्हें अपने शरीर
के किसी भाग का एक सेर मांस देना पड़ेगा। वह इतना विख्यात
व्योपारी होकर झूठ नहीं कहना चाहता था। इसलिये बोला-
“काजी साहब ! शर्तनामे की बात सही है, उस समय मुझसे
और मारवाड़ी से ऐसी ही शर्तें तयँ पाई थीं, परन्तु इस
समय मैं मय सूद के इसका रुपया अदा करने को प्रस्तुत हूँ।