अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
१५३ अकबर बीरबल विनोद
१५३ अकबर बीरबल विनोद
वह उस जूतेको शालके टुकड़ेमें भलीभाँति ढककर नगरके
बाहर एक एकान्त जगह में छिपा कर रख आया दूसरे दिन
उसको एक कब्र के अन्दर रख ऊपर से तीन पत्थरों को ऐसी
विधि से रख दिया की वह एक खासी कब्र बनकर तय्यार
हो गई। बाद को एक मुसलमान को नौकर रखकर उसका
मुजावर बनाया। उसको हिदायत की कि जब कोई इसके
निस्वत तुमसे पूछे तो कहना कि यह मकबरा यकीन शाह पीर
की है और बराबर लोगों में इसकी सिद्धताई की चर्चा भी
करते रहना।”
मुजावर ने बीरबल की आज्ञानुसार उस मकबरे का
यकीनशाह पीर के नाम से नया नया ढोग रचकर प्रचार
करने लगा। धीरे धीरे यह बात सारे नगर में फैल गई।
तमाम स्त्री पुरुष उस पर मानता मानने और चढ़ाने के लिये
आने लगे। ईश्वर की कृपा से 'जंगल में मंगल' हो गया।
यह बात फैलते २ एक दिन बादशाह के कान तक
पहुँची। जैसा दुनिया का कायदा है, दरबारी लोग सूई की
जगह फार से काम लिया। यानी बादशाह से यकीनशाह
पीर की बड़ी सिद्धताई बखान की। कुछ लोगों ने तो बाद-
शाह से यहाँ तक बतलाया कि-“आपके बाल्यावस्था में
आपके पिता हिमायूँ ने भी इस पीर साहब की मानता की
थी, और पीर साहब की कृपा से उन्हें बड़े २ कार्यों में सफ-
लता भी प्राप्त हुई थी।
बादशाह लोगों के भड़काने में आ गया। उसने मन
में संकल्प किया कि किसी दिन मैं भी चलकर पीर साहब