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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

५३ अकबर बीरबल विनोद

५३ अकबर बीरबल विनोद
मूल्य एकमुस्त अदा कर देगा।”
बीरबल ने जवाब दिया-“नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, हमारे
लिये सभी समान हैं और हमें सबका ध्यान है। तुम
एक एक कुप्पे अपने साथ ले जावो बाकी मैं दूसरों के
हवाले करूँगा। बीरबल उन दोनों को दोनों गुप्त निशान
वाले कुप्पे देकर बिदा किया। घी कुछ बिगड़ा हुआ था
व्योपारियों ने सोचा कि बिना तपाये इसका ऐब दूर न
होगा। इसलिये पहले व्यापारी ने कुप्पे कोतपाना शुरू किया।
जब घी पिघल गया तो उसे एक बड़े कराह में छोड़कर
खराया। जब उसके मर्जी के मुवाफिक घी एकदम तय्यार हो
गया और उससे सुगन्धि आने लगी तो उसने फिर घी को
उसी कुप्पे में भरना प्रारम्भ किया। जब घी पेनी में पहुँचा
तो किसी चीजके खड़कने की आवाज सुनाई पड़ी। उसे बाहर
निकाल कर देखा तो वह अकबरी मुहर थी। व्योपारी मन
में सोचने लगा-“यह मुहर बीरबल की है भूल से इस
में आ पड़ी है। उसकी वस्तु उसीको देना मुनासिब है।”
व्योपारी मुहर को लेकर बीरबल के पास पहुँचा और उसकी
मुहर उसे देकर अपने घर लौट आया। बीरबल मुहर पाकर
सोचने लगा-“यह व्योपारी सच्चा है।” दूसरे व्योपारी
के कुप्पे से भी उसी प्रकार मुहर निकली, परन्तु उस लालची
को सोना देखकर लोभ समा गया उसे अपने जेठे पुत्र को
देकर बोला-“इसको यत्न से अपने पास रक्खो, जरूरत
पड़ने पर मुझे लौटा देना।
इधर जो दो कुप्पे बिना असरफी के थे दूसरे दो व्योपारियों