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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद २३२

अकबर बीरबल विनोद २३२
की उदारता देखकर उसे बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। दोनों
सानन्द घोड़ा बढ़ाते हुये नगर से बाहर निकले।
तुम बड़े गदहे हो
एक दिन बीरबल और बादशाह दोनों एक साथ बैठे हुये
आपस में कुछ वार्तालाप कर रहे थे। इसी बीच बीरबल को
वायु सरी। बादशाह ने कहा-"बीरबल तुम बड़े गदहे हो।"
बीरबलने उत्तर दिया-पृथिवीनाथ ! पहले तो मैं ऐसा नहीं था
परन्तु गधों की संगत में पड़कर गधा हो गया हूँ। बीरबल
के ऐसे उत्तर से बादशाह की बोलती बन्द हो गई।
कौन कौन क्या क्या नहीं कर सकता
एक दिन का यह समाचार है कि अकबर बादशाह
दरबार में बैठे हुए सरकारी कामों को दत्तचित्त होकर
देख रहे थे। जब वे उन कामों से निवृत्त हुए तो उन्हें
गपाष्टक करनेकी सूझी और कुछ मुसाहिबों को साथ में लेकर
आकाश पाताल की बातें करने लगे। कोई किसी विषय को
लेकर विवेचन, करता, तो कोई किसी विषय को। इसी
बीच बादशाह को पुराने कवियों का कहा हुआ एक दोहा
याद आया-
दोहा-"क्या नहिं अबला करि सकै, क्या नहिं सिन्धु समाय।
क्या नहिं पावक जर सकै, क्यो काल न.हिं खाय ॥"