अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद ३६
अकबर बीरबल विनोद ३६
से किया जाय और महल एक ही रात में बनकर तय्यार
हो। महल रातो-रात बनकर तय्यार हो गया। कारीगरों ने
भली-भाँति दस्तकारी दिखलाई। लकड़ी पर इस सफाई से
रोगन किया कि कोई भी देखकर नहीं कह सकता था कि
वह लकड़ी का बना है। स्थान-स्थान पर शीशों को ऐसी
खूबी से जड़ दिया कि उसकी चमक कोसों तक फैलती थी।
तब बीरबल खूब साफ सुथरे वस्त्रों से सुसज्जित होकर
उस नये महल में आबाद हुआ। सबेरा होते ही वह बड़े ठाट
बाट से सजकर नगर में पहुँचा। एक वर्ष का विश्राम पाकर
बीरबल खूब तगड़ा हो गया था। अच्छी सेवा होने से उसके
शरीर के अंग प्रत्यंग खिल गये थे। नगर में जाते समय उसे
देखकर किसी को बीरबल होने का भ्रम न हुआ। इस प्रकार
देखता भालता राजदरबार में जा पहुँचा। एक लब्ध प्रतिष्ठ
आगन्तुक को देखकर सभासदगण एकटक उसी की तरफ
देखने लगे, सभा का काम बन्द होगया; परन्तु किसी ने
उसको छेड़ा नहीं। अन्त में कुछ देर बाद बादशाह ने पूछा-
"आप कौन हैं! कहाँ से आये हैं, और यहाँ आने का क्या
प्रयोजन है?" बादशाहके ऐसे अपरिचितों से प्रश्नों को सुन
कर बीरबल बोला-"गरीबपरवर! मैं आपका पुराना दीवान
बीरबल हूँ।" बादशाह भौंचक सा हो गया और रुखाई से
बोला-"अर्य! बीरबल; तू तो मर गयाथा न, फिर सजीव कैसे
लौटा। बीरबल ने उत्तर दिया-"हुजूर! मैं मर तो गया था
परन्तु जब स्वर्ग लोक को गया तो इन्द्र मुझपर प्रसन्न होकर
मुझे अपना मंत्री बना लिया, तबसे मेरा दिन बड़ा
३७ अकबर बीरबल बिनोद
सुखपूर्वक बीतता है, मेरी सेवा के लिये अप्सरायें नियुक्त
हुई हैं। सर्वदा खाने को उत्तमोत्तम पदार्थ और पान करने
के लिये अमृत प्रस्तुत रहता है।"
बीरबल की ऐसी बातें सुन बादशाह ने पूछा—"तो ऐसे
आनन्द उपभोग को छोड़कर तुम्हारा यहाँ आना कैसे हुआ ?"
बीरबल ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया—"पृथ्वीनाथ ! आप
हमारे पुराने अन्न दाता हैं, यह स्मरण कर इन्द्र से मुहलत
लेकर आपसे मिलने आया हूँ, आपके किये हुए उपकार मेरे
हृदय-पट पर अंकित हैं इसीलिये आपके निमित्त स्वर्गलोक से
एक उत्तम महल और एक परी साथ लाया हूँ। उपरोक्त दोनों
चीजें यहाँ से थोड़ी दूर एक पहाड़ी पर छोड़ आया हूँ, यदि
आप यहाँ तक चलने का कष्ट करें तो मैं उन्हें आप को
दिखला दूँ।
बीरबल की बातें बादशाह को सच्ची जान पड़ीं। उसने
मनमें अनुमान किया—"जब बीरबल मर गया था तो बिना
प्रयोजनके हुये लौटकर कैसे आया, और आया भी तो परी और
महल इसके हाथ कैसे लगा। निःसन्देह बीरबल सत्य कहता
है ! उन चीजों की परीक्षा के लिये नये दीवान और कुछ अन्य
प्रतिष्ठित लोगों को उसके साथ भेजा। बीरबल सबके साथ२
चलकर उस पहाड़ीके समीप जापहुँचा और उन लोगोंको दूर
से अँगुली का इशारा करके बोला—"देखो वह सातवें खंड पर
बैठी हुई परी हम लोगों की तरफ ध्यानपूर्वक देख रही है।
अधिक आदमियों को एक साथ अपने ही तरफ आते देखकर
उसे ताज्जुब हो रहा है, उसका चन्द्रमुख कैसा चमक रहा है?