अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
१८३ | अकबर बीरबल विनोद
[Page Header]
१८३ | अकबर बीरबल विनोद
का दिन रात कैसे कटे क्या हम पशु के समान बँधी पड़ी
रहें ?” तब एक दूसरी बेगम बोली-“प्रभु ! आपकी न्याय
प्रियता सब पर विदित है, आप अपने छोटे से छोटे कर्म-
चारियों की प्रार्थनाएँ सुनते हैं तो क्या कारण है कि हम
लोगों की न सुनेंगे, चाहे जो हो आज तो हम आपको यहाँ
से हिलने न देंगी, आगे हमारा प्रारब्ध जाने । सेखी
करना भूल है, पर हम लोगों की बिना आज्ञा लिये आप
कैसे जायेंगे । तीसरी बेगम मुसकराती और नेत्रों का बाण
चलाती हुई बोली-“आप लोग भी क्या हैं ? हमारे स्वामी
अपनी दयालुता के लिये विश्व विख्यात हैं, ये अब हमारी
प्रार्थनाओं को मानकर आज से हम लोगों का साथ छोड़ कर
कहीं न जायेंगे; यदि तुम लोगों को मेरी बातों का विश्वास
न हो तो मैं शर्त लगाने के लिये तय्यार हूँ । जिसका जी
चाहे मुझसे आकर हाथ मारे । चौथी बेगम हाव भाव दिख-
लाकर बोली-“ बहनो ! स्वामीजी तो नाहीं करते ही नहीं हैं
आप लोग इतना आग्रह क्यों करती हैं, मौन्यं स्वीकृति लक्ष-
णम् ।” उत्तर न देना ही स्वीकार कर लेना है ।
बादशाह इन स्त्रियों के नेत्र कटाक्ष और हाव भाव में
बँध गये, किसे क्या उत्तर देना चाहिये इसका उन्हें कुछ
भी ज्ञान न रहा और विवश होकर बोले-“बेगमों ! आप लोगों
के प्रेम से मैं गद्गद हो गया हूँ और आपको यकीन दिलाता
हूँ कि अब तुम्हारे पास ही रहूँगा ।” बादशाह के मुख से
इतना निकलना था कि बेगमें प्रसन्नता से उछलने लगीं
और उनके बहुतेरे नये नये नखरे और हावभाव होने लगे । नित्य