अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
५१ अकबर बीरबल विनोद
५१ अकबर बीरबल विनोद
जल के पुण्य प्रभाव से उनको अभीष्ट सिद्धि मिली । अगले
जन्म में सुशर्मा हिमायूँ बादशाह के घर जन्म लेकर अकबर
के नाम से विख्यात हुआ और सुदामा नाई का जन्म उसी
नगर के एक कुलीन ब्राह्मण के घर हुआ । इसके पिता के
पुकारने का नाम स्वप्ननाथ था । ब्राह्मणपुत्र स्वप्ननाथ
बड़ा ही बुद्धिमान और प्रतिभाशाली हुआ, जिस कारण
थोड़े समय में इसने अच्छी विद्या हासिल करली । विद्या
और बुद्धि के प्रभाव से बादशाह ने इसको दीवान पदपर
नियुक्त किया और उसका नाम बदल कर बीरबल रक्खा ।
घी का व्यवसाय ।
दिल्ली नगर व्योपारों का केन्द्र था, इस लिये वहाँ
बहुतेरे व्योपारी बसते थे। घी के दो व्योपारियों में कुछ
अनबन हो गई। इसलिये उनमें का एक व्योपारी बादशाह के
पास पहुँचकर बोला-“पृथिवीनाथ ! अमुक व्योपारी मुझसे
एक हजार रुपया कर्ज लेकर अब देने से हीला हवाली
करता है । उसकी नीयत रुपये देने की नहीं है।” बाद-
शाह न्याय के लिये उसका अर्जीदावा बीरबल के पास
भेज दिया। बीरबल उसे पढ़कर दूसरे व्योपारी को तलब
किया। जब वह आया तो पहले व्योपारी का अभिशाप
पढ़कर सुनाया। तब वह व्योपारी बोला-“हुजूर को
मालूम हो कि हम दोनों एकी चीज के व्योपारी हैं इससे
व्योपारिक प्रतिद्वन्दिता के कारण वह मुझसे बुरा मानता है
अकबर बीरबल बिनोद ५२
और मेरे व्योपार में धक्का पहुँचाने की नीयत से आपके पास
झूठा अर्जीदावा लेकर आया है, इसकी जाँच कराने पर
आपको स्वयं झूठ सचका पता चल जायगा, इस संबन्ध में,
मैं और कुछ कहना नहीं चाहता।
बीरबल ने उसकी बात मानकर उसको घर जाने की
मुहलत दी। फिर पहले व्यापारी को बुलाकर बोला—
“इस मामले में आपको अभी खामोश रहना पड़ेगा, समय
पाकर मैं इसका उचित न्याय करूँगा। अभी आप इस ढङ्गसे
रहें मानों कुछ हुआ ही नहीं है। वह बीरबल की बात
मानने को लाचार था, चुप चाप अपने घर चला गया।
व्योपारियों के झगड़े का न्याय करना बीरबल को याद
रहता, सोचते २ एक दिन उसे एक नई युक्ति सूझी।
बजार से चार घी से भरे कुप्पे मँगवाये गये जिनमें कुछ अपना
अलग २ निशान बनाकर दो खास कुप्पों में एक-एक मोहरें
डाल दीं। फिर दोनों व्योपारियों को बुलवाकर बोला-“देखो
यह चार घी के कुप्पे मेरे पास बहुत दिनों से पड़े हुए हैं
अब इनके नष्ट होने का भय है, तुम दोनों इसमें से एक एक
कुप्पा अपने साथ लेजाओ; बाकी दो कुप्पे मैं दूसरे व्यापा-
रियों के हाथ बेंच दूँगा। कुप्पों को बाज़ार में उचित दाम
पर बेंचकर जो मिले उसमें से अपना नफा निकाल शेष
मूल्य मेरे हवाले करना।” बादी तो कुछ इतराज न किया,
परन्तु दूसरा व्योपारी (यानी प्रतिवादी) बोला-“दीवानजी !
इतने थोड़े घी के लिये चार व्योपारियों का क्या काम है,
आप एक ही को चारो सुपुर्द कर दें। वह बेंचकर सबका