अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद १४४
अकबर बीरबल विनोद १४४
बीरबल-“गरीबपरवर ! जिस प्रकार एक कोस की दूरी से
अग्नि की उष्णता देखकर ब्राह्मण जल में रात्रि समय जीवित
रह सकता है, उसी प्रकार, मेरी खिचड़ी भी थोड़ी देर में
परिपक्क हो जायगी।”
बादशाह-बीरबल की इस दृष्टान्त भरी खिचड़ी से प्रसन्न
हो गया और बोला-“बीरबल! अब मैं भलीभाँति समझ गया,
तुम्हारा कहना सत्य है अतएव दरबार में चलो। बरहमन
को शर्त के अनुसार इनाम दिया जायगा। बीरबल तो केवल,
उतने ही के लिये नया नाटक तय्यार किये हुए था। जब उसकी
मंशा बर आई तो उठकर बादशाह के साथ दर्बार को गया।
बादशाह ने सिपाही भेजकर उस बरहमन को बुलावाया और
उसको अपनी घोषणा के अनुसार द्रव्य और वस्त्राभूषण देकर
बिदा किया। वह बीरबल को कोटि कोटि धन्यवाद देता
हुआ अपनेघर चला गया।
मुल्ला की पगड़ी
अकबर बादशाह के दरबारियों में कितने मुल्ले भी शरीक
थे। उन्हों में एक मुल्ला का नाम दुआजा था। यह बीरबल से
प्रगट तो हँसी किया करता था, परन्तु भीतर २ उसे झिपा
कर अपनी प्रधानता चाहता था। एक दिन जब दरबार भरा
हुआ था बादशाह ने सबके सामने बीरबल की पगड़ी देखकर
उसकी बड़ी तारीफ की। दुआजा बीरबल की इस प्रशंसा को
सुनकर भीतर ही भीतर जल उठा, परन्तु अपना भीतरी भाव
छिपाकर बादशाह से बोला-“यह कौन सी बडी बात है, मैं