अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
२७ अकबर बीरबल विनोद
२७ अकबर बीरबल विनोद
राध की माफी माँगी और उसको आदरपूर्वक अपने मकान
पर ले गया। उसने अपना सारा धन शेरअली के हवाले
कर दिया। शेरअली बहुत बड़ा व्यापारी था उसका सारा
कारोबार ईमान पर चलता था। उसने विचार किया-“व्यापार
से मेरे धन के अतिरिक्त जो कुछ नसीबा ने अधिक उपार्जन
किया है वह उसके परिश्रम का है। उसने अपना असली धन
लेकर शेष बचा धन नसीबा के हवाले किया और खुशी खुशी
अपने ईरान शहर को लौट गया।
मोती की खेती।
एक दिन की घटना है कि बादशाह और बेगम दोनों
भोजनोपरान्त बाग में झूला झूलते हुए सानन्द गपशप
लड़ा रहे थे अचानक बेगम की उर्ध्ववायु खुली, जिससे
बादशाह बहुत चिढ़ गया और बेगम को तुरत महल से
बाहर निकल जाने की आज्ञा दी। बेगम शहर से बाहर
एक बाग में कैदी की सूरत में नजरबन्द कर दी गई। बाद-
शाह को वही धुन सवार थी। दूसरे दिन जब सबेरे
दरबार लगा तो बादशाह ने सभासदों से पूछा-"क्या कभी
तुमलोगों को भी अधोवायु निकलती है ? अधोवायु निकलने
के कारण बेगम का दण्डित होना सबपर विदित था इस
कारण एक स्वर से सभों ने इन्कार कर दिया, और उस दिन
का दुर्वार समाप्त हुआ।
जिस दिन की यह बात थी उस दिन बीरबल किसी
अकबर बीरबल बिनोद २८
सरकारी काम से बाहर गया था। इसलिये जब कई दिन
पश्चात वह लौटा तो बादशाह ने वही प्रश्न बीरबल
से भी किया। भला बीरबल कब चूकने वाला था, वह
झट बोला-"पृथ्वीनाथ ! जिस तरह से अन्य लोगों
को अधोवायु होती है उसी तरह मुझे भी होती है।"
बीरबल के इस उत्तर से बादशाह बहुत नाराज हुआ और
उससे बोला-"वाह खूब अच्छे रहे ! इस सभा में ऐसा एक
भी आदमी नहीं है जिसे अधोवायु सरती हो, फिर तुम्हें
कैसे सरने लगी ? जब यही बात है तो तुम दरबार से बाहर
चले जावो और जब तक मैं तुम्हें आने की आज्ञा न दूँ
कदापि न आना।
बीरबल हाजिर जवाब था उसे उत्तर प्रत्युत्तर करने
में हिचकिचाहट नहीं होती थी। परन्तु मौका देखकर काम
करना बुद्धिमानो का काम है। बादशाह को अपने ऊपर बहुत
नाराज देख वहाँ से वह तत्काल बाहर चला गया। बेगम को
नजरबन्द हुए जब बहुत दिन हो गए तो एक दिन वह
अपने नजरबन्दी के कष्टों से ऊब कर बीरबल को बुलवाया
और उससे आजिजी कर बोली-"बीरबल ! आपकी मदद के
बिना मेरा उद्धार नहीं हो सकता कोई तरकीब निकाल कर
मुझे इस निविड़ कैद से मुक्त करो। मेरा जीवन असंभव हो
रहा है। बीरबल ने कहा-"दूसरे की वकालत वही कर सकता
है जो निर्दोष हो मैं तो खुद ही तुम्हारे दोष में शामिल हूँ
तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ ?
बेगम बीरबल को भलीभाँति जानतीथी अतएव उसकी बात
२६ Akbar Birbal Binod अकबर बीरबल बिनोद
बीच में ही काट कर बोली-"बीरबल ! तुमको मैं भलीभाँति
जानती हूँ, मेरा दृढ़ विश्वास है कि चाहे बादशाह तुम से
भले ही नाखुश हों, परन्तु उनको मना लेना तुम्हारे बायें
हाथ का खेल है ! बेगम की इस युक्तिसंगत बात को सुनकर
बीरबल खुश होकर उसके कार्यसाधन के निमित्त दश हजार
रुपये की माँग पेश की । उसे तत्क्षण दशहजार की थैली
समर्पण की गई ।
बीरबल घर पहुँचकर एक सुनार को बुलवाया वह अपने
काम का बड़ा पक्का था । वीरबल उसको रुपये की एक
थैली देकर बोला-"सेठजी मुझे मोती मंडित सुवर्ण का
एक जव की बाली दर्कार है, इसलिये आप उत्तम २ मोतियों
को बाजार से संग्रह कर उन्हें सोने में इस प्रकार जड़ो
कि देखने में हूबहू जव की बाली ही जान पड़े ।” सुनार
कुछ कालोपरान्त एक उत्कृष्ट बाली बना लाया । बीरबल
उसे देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे कुछ द्रव्य
इनाम में देकर बिदा किया। आप उस बाली को लेकर
बादशाह के महल की तरफ चला । दर्बार में पहुँचते।पहुँचते
आधा दिन ढल गया ।
पहरेदारों से अपने आने का सन्देशा बादशाह के पास यह
भेजा कि-“पृथ्वीनाथ ! मैं एक बड़े आवश्यक कार्यवश आपसे
मिलने आया हूँ यदि आज्ञा हो तो अन्दर आऊँ ।” बादशाह
ने आज्ञा देकर बीरबल को दर्बार में बुलवा लिया । बीरवल
बादशाह के पास पहुँचकर नियम अनुसार सलाम कर
बगल में बैठ गया और मोती उसके हाथ में देकर बोला-
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"गरीबपरवर ! यह मोती का बीज एक बाहरी व्यापारी
लेकर आया,था जिससे मैंने बड़ी कठिनता से प्राप्त किया
है। इसमें एक खास खसूसियत यह है कि यदि कोई
पाक साफ आदमी इसको अच्छी जमीन में बोयेगा तो इसी
के समान और बहुत सी मोतियाँ पैदा होंगी । मैंने देखा
कि यह काम सिवा आपके दूसरा कोई न कर सकेगा अतएव
आपकी सेवा में लेकर उपस्थित हुआ हूँ। कृपया इसको
किसी अच्छी जमीन पर बो दीजिये, आपको आगे चलकर
इससे बड़ा लाभ होगा। बादशाह उसकी बात मानकर
तुरत आज्ञा दिया-"बीरबल ! इसके योग्य जमीन ढूँढ़कर
सूचना दो। परवाने में यह भी लिखा था कि जिस जमीन
को बीरबल इस कार्य्य के लिये पसन्द करेगा वह चाहे बड़ी
आलीशान मकानों से ही क्यों न सुशोभित की गई हो,
तुरत साफ करा दी जायगी ।
बीरबल की खूब बन आई उसने अपने पुराने बैरियों
के मकानात को आर्डर देकर तोड़वा दिया। कितने लोगों
ने तो बीरबल के आतंक से बचने के लिये बड़ी बड़ी
रकमों की घूसें दीं। पहले वह नाक भौं सिकोड़ कर
लोगों को टरकाता, परन्तु जब न मानते और बहुत मिन्नत
करते तो किसी से कम और किसी से बेस लेकर उनका
मकान छोड़ देता । जब बीरबल का खासी रकम मिल
गई तो बड़े बड़े महलों को गिरवाना बन्द कर दिया बाद
को गरीबों की झोपड़ियों का चौगुनी कीमत देकर कुछ
झोपड़ियाँ गिरवा कर एक खासी चौरस जमीन बना ली
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ओर उसे खूब जोतवाकर उसमें उत्तम प्रकार की खाद
डलवा दी। पंक्ति से आवपाशी कराकर उसको भली-भाँति
सिंचवा कर खेत को दुरुस्त करवा लिया। जब बीज बोने
के काबिल खेत तैयार हुआ तब बीरबल ने एक दूत द्वारा
बादशाह के पास खबर भेजी-“पृथ्वीनाथ ! आपका खेत तैयार
हो गया है अब आप सभा सदों के सहित पधार कर खेत
का मुलाहिजा फर्मावें।
बीरबल उस मोती के बीज को लेकर सभा के सम्मुख
आया और उसे बादशाह को दिखा कर बोला-“हुजूर ! इस
बीज को बोने वाला खूब पाक साफ मनुष्य होना चाहिये,
जिससे दुर्गन्धि आती होगी उसके बोने से बीज से हरगिज
मोती नहीं उगेगी। इसलिये जिसके शरीर से कभी वायु
न सरती हो वही इसको बोये। आपके दर्बार में तो ऐसों
की कमी भी नहीं है। किसी एक को आज्ञा दीजिये कि जो
इस काम को प्रसन्नता पूर्वक करे।
बादशाह ने एक एक कर अपने सभी उपस्थित सभासदों
से पूछा परन्तु कोई बीज बोनेके लिये हामी न हुआ। लगभग
हजारों की संख्या में लोग उपस्थित थे पर सभों ने नहीं
कर दिया। कारण कि यदि कोई यह कहकर कि मुझे हवा
नहीं सरती, मोती बोने का साहस करता और कहीं बाद में
मोती न उगती तो उसकी गर्दन मारी जाती।
तब बादशाह ने बीरबल को बीज बोने के लिये कहा।
बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ ! यह तो मैं आपसे पहले ही कह
चुका हूँ कि मुझको वायु सरती है, आपके सामने बहुतेरे
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लोगों ने इस बात की साक्षी दी है कि उनको वायु नहीं
सरती तो बड़े अफसोस की बात है कि बीज बोने के लिये
कोई तैयार क्यों नहीं होता। श्रीमान को भी वायु नहीं
सरती अतएव अब इस काम को स्वयं आपही करें तो
कितना उत्तम हो। बादशाह बीरबल के प्रस्ताव को यह कहते
हुए अस्वीकार कर दिया कि मुझे भी तो वायु सरती है। इस
संसार में ऐसा एक भी मनुष्य न निकलेगा जिसे वायु न
सरती हो। तब बीरबल ने मौका देखकर कहा-“पृथ्वीनाथ !
जब यही बात है तो बेगम और मैंने ऐसा कौन सा अपराध
किया था जिसके लिये हम दंडित किये गये। बीरबल की इस
युक्ति से बादशाह का गुस्सा शान्त हो गया और बेगम को
महल में बुलवाने की आज्ञा दी। बीरबल भी दीवान पद पर
नियुक्त किया गया।
नया कौतुक ।
अकबर बादशाह को ठट्ठेबाजी का बड़ा शौक था और
दैवयोग से बीरबल भी बड़ा ठट्ठेबाज था। एक दिन बादशाह
और बीरबल में ठट्ठेबाजी हो रही थी बादशाह ने कहा-“बीर-
बल बहुत दिन हुआ कोई नया कौतुक तुमने मुझे नहीं
दिखलाया अतएव अब कोई ऐसा नवीन कौतुक दिखलाओ
जैसा फिर कभी देखने में न आवे ।” बीरबल हँसते हुये
बादशाह की आज्ञा शिरोधार्य की और बोला-“हुजूर इसमें
कोई कठिनता की बात नहीं है परन्तु उसकी तैयारी करने में