अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
१०४. अकबर बीरबल विनोद
१०४. अकबर बीरबल विनोद
उस रईस ने अपना आकार बदल कर उसमें अन्तर दिखलाया।
इसी प्रकार चित्रकार ने क्रमशः पाँच चित्र बनाकर तय्यार
किया, परन्तु उसकी धूर्तता के कारण कोई चित्र भी उसके
चेहरे से न मिल सका । अन्तमें चित्रकार को उसकी ठगी पर
सन्देह हो गया और वह उससे अपना पुरस्कार मांगा । रईस
उसे फटकारता हुआ बोला-"तू इतना भी समझदारी नहीं
रखता, जब मेरे अनुकूल चित्र ही नहीं बना सकता तो फिर
पुरस्कार किस बात का लेगा। नाहक इसी विरते पर अपने
को चित्रकार बतलाकर लोगों को ठगता है । सीधे यहाँ से
चला जा नहीं तो मैं तेरी धूर्तता का भलीभाँति बदला चुका-
ऊँगा । गरजे इसी प्रकार दोनों के दर्मियान देर तक तू
तू मैं मैं हुई, फल कुछ न निकला । लाचार होकर बिचारा
चित्रकार बीरबल की शरण में गया ।
अपना सारा समाचार कहकर बीरबल को पाँचों
चित्रों को दिखलाया । सब बातों को देख सुनकर बीरबल
ताड़ गया कि उस रईस ने इस बिचारे को ठगा है । उसको
स्वरूप बदलने की विद्या हासिल है, जिस कारण इसे सहल
में ही ठग लेता है।" वह बोला-"यदि तुम मेरे कहे अनुसार
चलोगे तो तुम्हें अवश्य लाभ होगा । चित्रकार सहमत हो
गया। बीरबल ने कहा- "बाजार से एक अच्छा शीशा खरीद
लावो फिर दो तीन दिनों के पश्चात उसे लेकर उस रईस के
पास जाना । साक्षी के लिये गुप्त रूप से मेरे दो कर्मचारी
तुम्हारे साथ रहेंगे । उससे जाकर कहना कि इस बार मैं
आपका उत्कृष्ट चित्र खींच लाया हूँ, जब देखने को माँगे