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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

२४६ अकबर बीरबल विनोद

२४६ अकबर बीरबल विनोद

उससे बची हुई लकड़ियों का मूल्य दर्याफ्त किया; फिर पैसा
देने के मिस से उसको अपने घर लिवा ले गया। लकड़ो का
मूल्य देकर बीरबल ने लकड़हारे से पूछा—"क्यों जी लकड़हारे!
तुम हमें कोई सभ्य पुरुष जान पड़ते हो। समय के फेर से इस
समय लकड़ियां बेचकर अपनी गुजर करते हो। मेरा तुमसे एक
जरूरी काम है। यदि तुम उसके करने पर उद्यत होजावो तो
मैं तत्काल तुम्हें पचीस रुपये दूँ। काम हो जाने पर तुम्हारी
गुजर माफिक काफी रुपये दूँगा।"
लकड़हारे ने मनमें सोचा—"यदि नहीं करूँगा तो यह दीवान
है जबरन बेगार में करावेगा। बेहतर है, कि इसकी राजी करूँ
तिसपर रुपये भी काफी देनेको कहता है। मनमें ऐसा ठहरा
कर वह बीरबल से बोला—"मैं आपकी छोटीसे छोटी आज्ञाएँ
पालन करने के लिये तत्पर हूँ, आपकी सभी आज्ञाएँ मुझे स्वी-
कार होंगी।" बीरबल ने कहा—"अच्छा मैं तुम्हें कुछ कपड़े देता
हूँ; इन्हें धारण कर हनुमान जी के मन्दिर के पिछवाड़े वाली
कोठरी में जा बैठो, हाथ में माला लेकर बराबर जपते रहो।
किसी की तरफ आँख उठाकर भी न देखना। तुमसे मिलने के
लिये बहुत से अमीर उमराव आवेंगे। मुमकिन है स्वयं
बादशाह भी आवें, परन्तु उनसे भी कदापि न बोलना। रुपयों
के ढेर दें तब भी उधर नहीं देखना। देखो सावधान,
मैं यहीं पर किसी जगह छिपकर तुम्हारी सारी बातें
देखता रहूँगा, यदि मेरे कहने से जरा भी खिलाफ चलोगे तो
तुम्हारी गरदन मार दी जावेगी।" बूढ़े लकड़हारे ने दृढ़ता
पूर्वक उसकी आज्ञाओं का पालन करना स्वीकार किया।

तब बीरबल ने उसके सारे बदन में खाक मलकर कोपीन वस्त्र
पहनाया और हाथ में एक रुद्राक्ष की माला देकर मस्तक पर
कृत्रिम जटा बाँध दी। फिर उसे हनुमानजी के मन्दिर में एक
मृगचर्म पर बैठाकर आप बादशाह के पास पहुँचा। बादशाह
का दरबार उमरावों से ठसाठस भरा हुआ था। बीरबल ने हाथ
जोड़कर कहा—"पृथ्वीनाथ ! मेरे गुरुजी आये हुये हैं, आपके
विषय में बातें करने पर उन्होंने आपसे मिलना स्वीकार
किय है। परन्तु मुझे साथ जाने की मुमानियत करते हैं। यदि
इतने पर भी आपके साथ जाऊँगा तो वे मुझसे बहुत नाराज
होंगे। मुमकिन है कि चिढ़कर मुझे शाप भी दे दें। बादशाह ने
पूछा—"इस समय वे कहाँ ठहरे हुये हैं?" बीरबल ने उत्तर
दिया—"हनुमानजी के मन्दिर के बाहर की कोठरी में।"
बादशाह अपने दरबारियों को साथ लेकर बीरबल के गुरु से
मिलने गये। वहाँ पहुँचकर बड़े अदब से प्रणाम कर बाकायदे
उन के सामने बैठ गये और फिर पूछा—"भगवन् ! कृपाकर
आप अपना नाम तथा ठिकाना इस दास से बतलावें, मैं
इस कृपा के लिये आपका चिर कृतज्ञ बना रहूँगा।" स्वामी जी
तो पक्के गुरु के चेले थे। उन्होंने उनकी बातों का कुछ भी
उत्तर न देकर बराबर अपना माला घुमाते ही रहे। बादशाह
फिर बोले-"स्वामी जी ! मैं समस्त भारतवर्ष का अधिपति हूँ
मैं आपकी सारी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता हूँ। यदि आपको
किसी बात की चाहना हो तो मुझसे कहें। परन्तु स्वामी
जी फिर भी कुछ न बोले बल्कि आँख उठाकर उनकी तरफ
देखा भी नहीं। तब बादशाह ने एक लाख का तोड़ा उनके सामने