अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
१८४ अकबर बीरबल विनोद
१८४ अकबर बीरबल विनोद
दन के लिये अग्रसर होइये।" गंग बोले- "क्या खूब ! जान
पड़ता है कि आप लोग मेरा ही प्राण लेने को उद्यत हुए हैं।"
खानखाना अबतक चुप्पी साधे हुये था परन्तु गंग को कच-
ड़ियाते देखकर बोला- "गंगजी इसमें आपके लिये कोई भय
करने की बात नहीं है। यदि बादशाह क्रोधित भी रहेंगे तो
आपकी तरफ देखते ही पानी २ हो जायँगे । यह कोई साधारण
काम नहीं है इससे आपको एक बड़ा एहशान मिलेगा।"
गंग बोला- "क्या आप लोग उन बेगमों को कुछ कम
समझते हैं जो बादशाह को अपने प्रेम फाँस में जकड़ कर
आज दस महीनों से गुम किये हुए हैं यदि वे मुझसे रुष्ट
होकर बादशाह को उल्टा सीधा समझा देंगी तो बादशाह
मेरी जान लेने पर उतारू हो जायँगे । मेरे बालबच्चे
बिलबिला कर बे मौत मरेंगे । बादशाह को महल से बाहर
निकाल लाना शेर का सामना करना है"
बीरबल बोला- "गंगजी ! मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ
कि यदि अबकी बार बादशाह उन बेगमों के हाथ से छूटे कि
समझ लेना कि फिर वे उनके हाथ न लगेंगे । इस बार ही
उनसबों ने उन्हें कैसे फँसा लिया, मुझे तो इसी पर बड़ा
आश्चर्य हा रहा है।" अब राजा टोडरमल की बारी आई वे
बोले- "कविवर ! आपको हतोत्साह होना शोभा नहीं देता;
यह काम कवियों का ही है कि दूसरों को उत्साह देते हुए
लड़ाई में स्वयं अपना प्राण भी विसर्जन कर देना। इसके
अनेकों प्रमाण पुस्तकों में भरे पड़े हैं। लड़ाई में प्राण देकर
हमारे प्राचीन कवियों ने केवल थोडे से आदमियों की जीवन