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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

१६४ अकबर बीरबल विनोद

१६४ अकबर बीरबल विनोद
भेजा। लड़की को घर आते ही बीरबल ने अपना रुख ऐसा
बनाया कि वह कन्या बीरबल के सामने गाय की तरह काँपने
लगी। इधर बीरबल ने अपने बनावटी भाई को भी उससे
चिड़चिड़ा बनकर रहने की सीख पहले से ही दे रक्खी थी।
इन दोनों के चिड़चिड़ेपन को देखकर बिचारी कन्या का जूता
जड़नेका भाव काफूर होगया और डरके कारण अपने माँ के
दिये जूते को एक कोनेमें गुप्त रीति से छिपा कर रख दिया।
बीरबल ने लड़की के बाप यानी अपने ससुर को कुछ
दिन वहीं ठहरने का आग्रह किया जिस कारण वह कुछ
दिनों के लिये वहीं रुक गया। बीरबलने देखा कि अब यहाँ तो
सफलता मिल गई, दूसरी तरफ भी हाथ साफ करना
चाहिये। एक दिन अपने भाई के श्वसुर विटोकड़ा विष्णु से
वार्तालाप करता हुआ प्रेम से गदगद होकर उनके पीठ पर
हाथ फेरने लगा। पीठ में गढ़े तो पड़े ही थे, उसने
द्रवित होकर पूछा-हैं ! आपकी पीठ में ये गढ़े कैसे हैं?"
लड़की का पिता दुखित होकर अपना सारा समाचार कह
सुनाया। बीरबलने कहा-"भाई दुख मनाने से दुख न छूटेगा,
बल्कि वृवृत्ति के लिये कुछ उपाय करना चाहिये। यदि
आप करें तो मैं एक रास्ता बतलाऊँ, उससे आप का दुःख
अवश्य छूट जायगा।"
उसने बीरबलकी बात मान ली। तब बीरबलने कहा-
"आपको मेरे यहाँ लगातार चार महीने रहना पड़ेगा और
नित्य सूर्य के सामने मुख कर के इतने दण्डवत करने होंगे
कि जिससे आपका शरीर पसीने से तर न हो जाय। वह नित्य