अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
चिड़िया घुसी और अपना भाग लेकर 'फुर्र' उड़ गई । फिर
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पर ढक्कन रखकर उसे भलीभाँति बन्द कर दिया, यहाँ तक
कि उसमें हवा आने जाने तक की जगह भी नहीं छूटी थी ।
विधना का विधान कठिन होता है, दैवात उस कोठली में
एक छोटा सा छिद्र छूट गया था जिसके द्वारा एक छोटी
चिड़िया उस कोठली में घुस गई और एक दाना अपनी चोंच
में लेकर बाहर निकल आई और 'फुर्र' उड़ गई। फिर दूसरी
चिड़िया घुसी और अपना भाग लेकर 'फुर्र' उड़ गई । फिर
तीसरी चिड़िया आई और भीतर गई, अपना दाना लेकर
'फुर्र' उड़गई । फिर एक चिड़िया आई, भीतर घुसी अपना
दाना लेकर 'फुर्र' उड़ गई, फिर और एक चिड़िया आई और
भीतर घुसकर अपना दाना लेकर 'फुर्र' उड़ गई । इसी तरह
लगातार कहते कहते बीरबल को सैकड़ों बार हो गया जब
बादशाह और और कहता कहता थक गया तो भुँझला कर
बीरबल से बोला- "यह तो मैं सुन चुका, अब आगे क्या हुआ
सो कहो । बीरबल ने गम्भीरता से उत्तर दिया- "पृथ्वी-
नाथ ! दाने के लोभ से वहाँ पर चिड़ियों का जमघट लग
गया यहाँ तक कि वहाँ करोड़ों चिड़ियाँ इकट्ठी हो गईं और
अपना अपना दाना बारी बारी से लेकर जाने आने लगीं ।
अभी सौ पचास की ही बारी आई है, जब सब चिड़ियों का
पेटभर जायगा तो कहानी आगे चलेगी। क्या अभी खतम हुआ
जाता है । इसमें वर्षों का समय लगेगा । बादशाह बोला- "मैं
ऐसी कहानी से भर पाया अब इसे यहीं बन्द करो।"
बीरबल को अवकाश मिल गया वह मनही मन गाजता हुआ
वहाँ से प्रस्थान किया ।
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बादशाह का तोता ।
एक फकीर बड़ा तोते बाज था। वह तोता बाजार से
खरीद कर लाता और उसे भली प्रकार शिक्षित कर अमीर
उमरावों को देकर द्रव्य उपार्जन करता। एक दिन वह
अपने नियम के अनुसार एक बहुत अच्छे तोते को खूब सिखा
पढ़ा कर बादशाह को दिया। बादशाह तोते की खूबसूरती
और इल्मियत से निहायत खुश हुआ और वह उसे एक
सुविज्ञ सेवक को सुपुर्द कर उससे बोला—"देखो इस तोते
की आब हवा और दाना पानी पर बड़ी सावधानी रखना,
इसकी प्रकृति में कुछ अन्तर न पड़ने पावे। इसको जरा भी
तकलीफ होते ही फौरन मुझे खबर देना। यदि कोई मेरे
पास इसके मरने की खबर लायेगा तो तुरत उसकी गर्दन
मार दी जायगी।"
दैवात् तोता मर गया। बिचारा सेवक बहुत डरा, उसे
अपने जीवनरक्षा की कोई सूरत नहीं दिखलाई पड़ती थी।
दोनों प्रकारसे मृत्यु का सामना था। "कहने पर गर्दन मारी
जावेगी और यदि मरने का समाचार न देकर गुप्त रक्खूँ तो
किसी दिन भेद खुलने पर और भी दुर्गति होगी।" लाचार
अपना कुछ वश न चलते देख बीरबल के पास गया और
उससे सारा समाचार कहकर बहुत गिड़गिड़ाया और कष्ट
से छुटकारा पाने की तरकीब पूछी। बीरबल बोला—"डरो
नहीं, मैं तुमको अभयदान देता हूँ।" इधर नौकर को
बिदा कर वह तुरत बादशाह के पास जा पहुँचा और
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बड़ी घबड़ाहट के साथ बोला- "गरीब परवर ! अपना
तो-ता, अपना तो-ता ।" उसकी घबराहट देखकर बादशाह
बोल उठा- "क्या वह मर गया ?" बीरबल बात सँभालते हुए
उत्तर दिया- "नहीं पृथ्वीनाथ ! वह बड़ा बिरागी हो गया है,
आज सुबह से ही अपना मुख ऊपर किये हुए है और कोई
अंग नहीं हिलाता, उसकी चोंच और आँखें भी बन्द हैं।"
बीरबल की ऊपर कही बातें सुनकर बादशाह ने कहा- "तब
क्यों नहीं कहते कि वह मर गया।"
बीरबलने उत्तर दिया- "आप चाहे जो कुछ भी कहें परन्तु
मेरी समझ में तो यही आता है कि वह मौन होकर तपस्या
कर रहा है। आप चलकर स्वयं देख लेवें तो बहुत अच्छा हो ।"
बादशाह ने बीरबल की बात मान ली और दोनों तोते के
पास पहुँचे, तोते की दशा देखकर बादशाह ने बीरबल से
पूछा- "बीरबल ! कहने को तो तुम बड़े चतुर बनते हो फिर
भी तोते के मरने की तुम्हे खबर न मिली। यदि यही बात
मुझसे पहले ही बतला दिये होते, तो मुझको यहाँ तक आने
की क्या जरूरत थी ?"
बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथ्वीनाथ ! मैं लाचार था,
क्योंकि यदि पहले ही बतला दिये होता तो जान से हाथ
धोना पड़ता ।
उसकी इस चालाकी से बादशाह बहुत खुश हुआ और
उसको अपनी पहली आज्ञा का स्मरण हो आया । उसने
बीरबल की बड़ी प्रशंसा की और एक बड़ी रकम पुरस्कार में
देकर उसे बिदा किया। बीरबल उसी क्षण उस रकम को
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तोते के रक्षक को दे दिया। इस प्रकार विचारे सेवक की
प्राणरक्षा हुई और उसे धन भी मिला।
बैल का दूध ।
एक दिन की बात है कि अकबर और बीरबल दोनों
एक उपवन में बैठे हुये आनन्द मना रहे थे इतने में शाम होगई ।
जब बीरबल घर जाने को उद्यत हुआ तो बादशाह ने उसे
रोककर कहा-"बीरबल ! आज कई दिनोंसे मैं एक बात सोच
रहा था, परन्तु तुमसे कहना भूल जाता था। एक हकीम दवा
बनाता है उसमें बैल के दूध की अनिवार्य आवश्यकता है।
यदि तुम कहीं से उसे ला दो तो अति उत्तम हो । "पत्ता
खड़का बन्दा भड़का।" बीरबल बादशाह की मन्शा समझ
गया और मनमें कहा कि बादशाह इस बहाने मुझे मूर्ख
बनाना चाहते हैं।
बीरबल बोला-"इसमें घबड़ाने की कौनसी बात है, मैं एक
सप्ताह में बैल का दूध ला दूँगा।" बादशाह ने कहा-"दो-चार
दिन और अधिक लग जायें तो कोई चिन्ता की बात नहीं है,
परन्तु दूध का आना बहुत लाजिमी है।" "बहुत अच्छा"
-कहता हुआ बीरबल वहाँ से बिदा हुआ।
वह-घर पहुँच एकान्त स्थान में बैठकर बैल के दूध वाले
प्रश्न पर विचार करने लगा। चिन्ताग्रस्त बीरबल को कई
घण्टे का समय मिनटों के समान बीत गया। जब भोजन
करने का समय हुआ तो नियमानुसार उसकी लड़की बुलाने