अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद ९४
अकबर बीरबल विनोद ९४
लड़खड़ाते हुए बोला-“आपको रोने वाले से क्या गरज पड़ी
है, मैं ही रो रहा था ?” बीरबल उसे अँधेरे में देखकर भली-
भाँति पहचान न सका। वह एक बूढ़ा पुरुष जान पड़ता था।
उसके शरीर के चमड़े भूल गये थे। कमर झुककर धनुष्या-
कार हो रही थी।
बीरबल ने आग्रह पूर्वक उससे ऐसी रात्रि में रोने का
कारण पूछा। तब बुड्ढा बोला-“भला आपसे रोने का कारण बत-
लाने से मुझे क्या लाभ होगा, नाहक एक अपरिचित आदमी के
सामने दुखड़ा रोकर अपनी अमर्यादा क्यों कराऊँ?” बीरबल
ने उसकी सहायता करने का बचन दिया, तब वह बुड्ढा बोला-
“अच्छा यदि आप सुनना ही चाहते हैं तो सुनें। इस समय
मेरी अवस्था सत्तर के लगभग पहुँच चुकी है, ईश्वर ने
एक लाल दिया था सो भी चल बसा। घर में मेरी रखवाली
वा भरण पोषण करने वाला कोई भी नहीं है, विचारा लड़का
कमा कर लाता था उससे हम पिता पुत्रों का भरण-पोषण
भलीभाँति हो जाया करता था। मेरे से काम नहीं हो सकता,
बड़ी जोर लगाकर भी तीन चार पैसेसे अधिक की मजदूरी
नहीं करपाता। महीने में ऐसा एक भी सौभाग्य का दिन नहीं
होता, जिस दिन मैं भर पेट भोजन कर चैन की नींद सोऊँ।
लड़के की सोच अलग मारे डालती है।' आज तीन दिनों से
बराबर फाँका कर रहा हूँ। उदर की ज्वाला अबर्दास्त होने
से रो रहा था।”
बीरबल ने सोचा-यह अँधेरी रात है, चारो तरफ सन्नाटा
ही सन्नाटा नजर आ रहा है। ऐसी हालत में तत्काल इस