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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद २८०

अकबर बीरबल विनोद २८०
आनेवाला है, नाहक मूड़ मारने से क्या लाभ । समय आने
परविवेक से काम लेना होगा।"
इधर तानसेन ने अपने मनमें अनुमान किया-"यह कोई बहुत
कठिन काम होगा जो केवल बीरबल के किये नहीं हो सकता
था इसलिये बादशाहने मुझको भी उसके साथ भेजा है। लो
अच्छा ही हुआ भ्रमण का भ्रमण होगा और गायन सुनाकर
राजा को प्रसन्न कर पारितोषिक अलगसे लूँगा।" ऐसा अनु-
मान कर वह मनमें फूला नहीं समाता था। बादशाह ने इनको
सवारी के लिये तेज घोड़े दिये थे इसलिये थोड़े ही दिनों की
यात्रा के पश्चात् ये ब्रह्मदेश की राजधानी में जा पहुँचे ।
जिस समय ये ब्रह्मदेश के सरहद् पर पहुँचे सूर्यास्त
हो रहा था। कोई परिचय का भी नहीं था, लाचार होकर
वह रात्रि नगर के बाहर ही टिककर बितानी पड़ी। ब्रह्म-
देश जंगल और पहाड़ों से भरा पड़ा है। इनको वहाँ की आव
हवा का कुछ भी ज्ञान न था अतएव बीरबल की अनुमति
से उन दोनों ने बारी बारी दो दो घन्टे की सोने और
जागने की ओसरी बनाया। जब बीरबल सोता तो तानसेन
पहरे पर रहता और जब तानसेन सोता तो बीरबल
पहरे का काम करता। बीरबल अभी प्रथम पहर के पहरे
पर था कि इसी बीच वहाँ पर एक वृद्ध पुरुष आया और
इनका ढंग देखते हुए इन्हें परदेशी समझ कर बोला-“
आप लोग मुझे परदेशी से जान पड़ते हैं और यह स्थान
जंगली है; यहाँ पर सिंह का आक्रमण हुआ करता है। अतएव
रात्रि में तुम्हारा यहाँ निवास करना अच्छा न होगा। तुम