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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद १०३

अकबर बीरबल विनोद १०३
बारंबार दोष निकालते देखकर बीरबल ने देवता को पहचान
लिया था। उसी समय से लोगों की आँखें खुल गईं
और ऐसी जनश्रुति चल पड़ी-“खुदा को अक्ल से
पहचान करो।”
शीशे में छाया चित्र
दिल्ली शहर में एक सनातनी धनवान रहा करता था,
उसके कुकृत्यों से अक्सर लोगों को बड़ी तकलीफ होती
थी, परन्तु वह धनाढ्य किसी की एक न सुनता। वह हमेशा
गुप्त रूप से मनमानी किया करता था, परन्तु ऊपर से बाद-
शाह के भयसे भलामानस बना रहता। एक दिन उसे एक
नई शरारत सूझी। एक चित्रकार को बुलवाकर उसे अपना
चित्र बनाने की आज्ञा दी। उस से पहले ही ऐसी शर्त तय
करा ली कि अगर चित्र बनाने में बाल भर भी अन्तर पड़ेगा तो
पुरस्कार नहीं दिया जाय। दोनों की आपस में लिखा पढ़ी
हो गई। वह घर जाकर बड़ी सावधानी से चित्र बनाने
लगा। चित्र बनकर तयार होगया तो उसे लेकर धनवानके
पास पहुँचा। जब उसके आने का समाचार नौकरोंने दिया तो
वह अपनी सूरत बदल कर उसके सामने आया। उसे देख
बिचारा चितेरा दंग हो गया उसके मुख से कोई स्पष्ट उत्तर
नहीं निकलत था, लाचार दूसरा चित्र फिर से बना लाने की
प्रतिज्ञा कर घर लौट गया।
नये स्वरूप का जब दूसरा चित्र बनाकर ले गया तो फिर