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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

चौथा अध्याय ] ६५
(१) स्वाहाकृतः शुचिर्देवेषु यज्ञो यो अश्विनोश्चमसो देवपानः ।
तमु विश्वे अमृतासो जुषाणा गन्धर्वस्य प्रत्यास्ना रिहन्ति ॥
(अथर्व० ७।७३।३)
(२) समुद्रादूर्मिमुदियर्ति वेनो न भोजाः पृष्ठं हर्यतस्यदर्शि । ऋतस्य
सानावधि विष्टपि भ्राट् समानं यो निमभ्यनूषत व्राः ॥
(ऋ० १०।१२३।२)
(३) द्रप्सः समुद्रमभि यज्जिगाति पश्यन् गृध्रस्य चक्षसा विधर्मन् ।
भानुः शुक्रेण शोचिषा चकानस्तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि ॥
(ऋ० १०।१२३।८)
(४) सखे सखायमभ्या ववृत् स्वाशुं न चक्रं रथ्येव रंह्यास्मभ्यं
दस्म रंह्या । अग्ने मृळीकं वरुणे सचाविदो मरुत्सु विश्वभानुषु तोकाय-
तुजे शुशुचान शं कृध्यस्मभ्यं दस्म शं कृधि ॥ (ऋ० ४।१।३)
(५) ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता ।
ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे ॥
(ऋ० १।३६।१३)
(६) ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह ।
कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः ॥
(ऋ० १।३६।१४)
(७) तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते । अर्धे चिदस्य सुधितं
यदेतश आवर्तयन्ति दावने ॥ (ऋ० ८।६६।१७)
अब होता नीचे के मंत्र पढ़ कर खाना चाहता है :-
पावकशोचे तव हि क्षयं परिहोतर्यज्ञेषु वृक्तबर्हिषो नरः । अग्ने दुव
इच्छमानास आप्यमुपासते द्रविणं धेहि तेभ्यः ॥ (ऋ० ३।२।६)
खाते हुये कहता है :-
"जलती हुई अग्नि में डाली हुई मीठी हवि में से हम खावें ।
हे देव घर्म ! तू मीठी चीज वाला, अन्न वाला, गर्म-गर्म है ।
(तुझमें से हम खावें) । तुझे नमस्कार हो । तू मुझे मत सताना" ।
५

६६ [ प्रथम पञ्चिका
जब प्रवर्ग्य पात्र रख दिया जाता है तो होता नीचे के दो
मंत्रों को पढ़ता है :—
श्येनो न योनिं सदनं धियाकृतं हिरण्ययमासदं देव एपति ।
एरिरन्त बर्हिषि प्रियं गिराऽश्वो न देवाँ अप्येति यज्ञियः ॥
(ऋ० ९।७१।६)
आस्मिनन्त्सप्तवात्वारोहंतु पूर्व्वारुहः । नृषिहं दीर्घश्रुत्तमं इन्द्रस्य
घर्मो अतिथिः ॥ (आश्व० ४।७)
दिन के किसी भाग में प्रवर्ग्यपात्र को उठावे, तो यह मन्त्र
पढ़ा जाय :—
हविर्हविष्मो महि सद्म दैव्यं नभो वसानः परि यात्यध्वरम् । राजा
पवित्ररथो वाजमारुहः सहस्र भृष्टिर्जयसि श्रवो बृहत् ॥
(ऋ० ९।८३।५)
नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :—
सूयवसाद् भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम ।
अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥
(ऋ० १।१६४।४०)
यह जो घर्म है वह देवों का जोड़ा (स्त्री-पुरुष) है । यह जो
घर्म पात्र है वह शिश्न (उपस्थ) है । उसके दो शफ (अर्थात्
उठाने के दो लोहे के कड़े) अण्डकोश हैं । उपनयमनी (लकड़ी
का बना दूध पीने का चमचा) जंघा हैं । कपाल में जो दूध है वह
वीर्य है । यह वीर्य उत्पत्ति के निमित्त अग्नि में डाला जाता है
क्योंकि अग्नि इन देवों की योनि है । जो इस रहस्य को समझ
कर यज्ञ करता है, वह अग्नि देवयोनि की आहुतियों में से उत्पन्न
होता है क्योंकि अग्नि देव-योनि है । और ऋक् युक्त, यजुर्युक्त,
सामयुक्त, वेदयुक्त और ब्रह्ममय, अमर हो जाता है । (५)
२३—देव और असुर इन लोकों में लड़ने लगे । असुरों ने
इन लोकों को गढ़ बना लिया जैसे शक्तिशाली राजा किया करते

चौथा अध्याय ] ६७
हैं । इस (पृथ्वी) को लोहे का दुर्ग बनाया, अन्त-
रिक्ष को चाँदी का, द्यौ लोक को सोने का । इस प्रकार इन्होंने
इन लोकों को दुर्ग बनाया । देवों ने कहा "इन असुरों ने इन
लोकों को दुर्ग बना लिया, अब हमको चाहिये कि इनके
मुकाबिले में और लोक बना लें।" ऐसा कह कर उन्होंने
मुकाबिले में पृथ्वी से 'सदस्' अर्थात् बैठने का स्थान बनाया ।
अन्तरिक्ष से "अग्नीध्रम्" अर्थात् अग्नि रखने का स्थान (कुण्ड)
बनाया, और द्यौ से दो हविर्धान (हवि रखने के पात्र) बनाये ।
इस प्रकार उन्होंने इन लोकों के मुकाविले में लोक बनाये । देवों
ने कहा, " 'उपसद्' नामक आहुतियाँ दें ।" क्योंकि उपसद् के
द्वारा बड़े पुर को जीत लेते हैं ('उपसद्' का अर्थ है 'घेरा' या
'मुहासिरा' जो एक शत्रु किसी नगर को चारों ओर से घेर लेता
है) । उन्होंने ऐसा ही किया । जब पहली 'उपसद्' आहुति दी
तो उन असुरों को इस पृथ्वी से निकाल दिया । दूसरी आहुति
में अन्तरिक्ष से, तीसरी में द्यौलोक से । इस प्रकार उनको इन
लोकों से निकाल दिया । यह असुर इन लोकों से निकल कर
ऋतुओं में जा घुसे । उन देवताओं ने कहा, "आओ", 'उपसद्
नामी आहुतियों को दें ।' यह उपसद् तीन हैं । एक-एक को दो-
दो बार पढ़ते हैं । इस प्रकार छः हुये । छः ही ऋतुएँ होती हैं ।
इस प्रकार उनको उन ऋतुओं में से निकाल दिया । ऋतुओं से
निकल कर यह असुर मासों (महीनों) में चले गये । देवों ने
कहा, "उपसद् आहुतियां दें ।" इस प्रकार उन्होंने आहुतियां
दीं । छः उपसद् थे । एक एक की दो दो बार आहुति दी । बारह
हो गईं । बारह ही महीने होते हैं । इस प्रकार बारह महीनों से
असुरों को निकाल दिया । असुर महीनों से निकल कर पक्षों (अर्द्ध
मास) में चले गये । अब देवों ने कहा "उपसद् आहुतियां दें" ।
ऐसा ही किया । उपसद् बारह थे । एक एक की दो दो आहुतियां

६८ [ प्रथम पञ्चिका
दीं, चौबीस हो गईं। चौबीस ही पाख होते हैं। इस प्रकार
उन्होंने पाखों से असुरों को निकाल दिया। पाखों से निकल कर
असुर 'रात दिन' में चले गये। देवताओं ने कहा "उपसद्
आहुतियां दें"। उन्होंने ऐसा ही किया। जो दोपहर के पहले
उपसद् आहुति दी उससे तो असुरों को दिन में से निकाला
और जो आहुति दोपहर के बाद दी उससे उनको रात से
निकाला। इस प्रकार वह असुर रात और दिन दोनों से निकल
गये। तब से पहली उपसद् आहुति पूर्वाह्न में दी जाती है और
दूसरी अपराह्न में। ऐसा करने से यज्ञ करने वाला, शत्रु के
लिये केवल इतना ही स्थान छोड़ता है जितना दिन और रात
के बीच में है। (६)
२४—उपसद् जितय अर्थात् विजय के देवता हैं। क्योंकि
इन्हीं के द्वारा देवों ने पूर्ण विजय पाई और अपने शत्रुओं को
नाश कर दिया। जो इस रहस्य को समझता है वह विजय पाता
है और शत्रुओं का नाश करता है। जो इस रहस्य को समझता
है वह इन लोकों, ऋतुओं, महीनों, पाखों और रात-दिनों में
देवताओं ने जो जो विजय पाई उस सबको प्राप्त कर लेगा।
देव डर गये कि कहीं असुरों को उनके वैमनस्य की सूचना
मिल जाय और वह उनका राज्य ले लें। वह दलों में बँट गये
और सोचने लगे। अग्नि वसुओं के साथ गया और विचारने
लगा। इन्द्र रुद्रों के साथ। वरुण आदित्यों के साथ। बृहस्पति
विश्वेदेवों की साथ। वे इस प्रकार दल बना कर सोचने लगे।
उन्होंने कहा, "हमारे जो यह प्रियतम शरीर हैं उनको राजा
वरुण के घर में रख दें। हममें से जो कोई लोभवश ऐसा न
करे वह हमारे साथ न चले।"
उन्होंने अपने शरीरों को वरुण राजा के घर में रख दिया।
राजा वरुण के घर में अपने शरीरों को रखने का नाम ही

चौथा अध्याय ] ६९
“तानूनप्त्रम्” (शरीरों को जोड़ना) है । इसीलिये कहावत है कि
जो कोई 'तानूनप्त्रम्' से युक्त होता है उसे कोई हानि नहीं
होती । इस लिये असुर उनके राज्य को नहीं जीत पाये । (७)
२५—'आतिथ्य इष्टि' यज्ञ का सिर है, 'उपसद्' गर्दन है ।
दो कुश बराबर होते हैं क्योंकि सिर और गर्दन बराबर हुआ
करते हैं। देवों ने 'उपसद्' से बाण का काम लिया । अग्नि उस
बाण का अनीक (अगला भाग) था, सोम लोहे वाला भाग
(शल्य), विष्णु नौक (तेजन) और वरुण पर्ण या तीर का पंख ।
देवों ने आज्य-रूपी इस बाण को छोड़ दिया और इससे असुरों
के दुर्गों को तोड़ कर उनमें घुस गये । आज्य आहुति में यही
चार देव होते हैं। यजमान पहले (गाय के) चार स्तनों से दूध
पीने का कृत्य करता है क्योंकि उपसद्-सम्बन्धी बाण के चार
भाग होते हैं, अनीक, शल्य, तेजन और पर्ण । फिर वह तीन
थनों से पान करने का कृत्य करता है क्योंकि उपसद्-सम्बन्धी
बाण के तीन भाग होते हैं अनीक, शल्य और तेजन । फिर दो
थनों का व्रत करता है क्योंकि उपसद् सम्बन्धी बाण में दो भाग
हैं अनीक और शल्य । फिर वह एक थन का व्रत करता है
क्योंकि उपसद् सम्बन्धी एक ही बाण होता है। एकता से ही
तो काम चलता है। कुल ऊपर जो लोक हैं वह विस्तृत हैं । जो
नीचे हैं वह सिकुड़े हुए । उतने थनों से आरंभ करता है जो विस्तृत
लोकों के सूचक हैं और क्रम से घटता है। इतना इन लोकों के
लिये हुआ ।
(अब पूर्वाह्न और अपराह्न उपसद् कृत्य में सामिधेनियों का
वर्णन है) ।
(१) उपसद्याय मीळ्हुष आस्ये जुहुता हविः । यो नो नेदिष्ठमाप्यम् ॥
(ऋ० ७।१५।१)

७८ [ प्रथम पञ्चिका
(२) यः पञ्च चर्षणीरभि निषसाद दमे दमे । कविर्गृहपतिर्युवा ॥
(ऋ० ७।१५।२)
(३) स नो वेदो अमात्यमग्नी रक्षतु विश्वतः । उतास्मान् पात्वंहसः ॥
(ऋ० ७।१५।३)
(४) इमां मे अग्ने समिधमिमामुपसदं वनेः । इमा उ षु श्रुधी गिरः ॥
(ऋ० २।६।१)
(५) अया ते अग्ने विधेमोजो नपादश्वमिष्टे । एना सूक्तेन सुजात ।
(ऋ० २।६।२)
(६) तं त्वा गीर्भिर्गिर्वणसं द्रविणस्युं द्रविणोदः । सपर्यम सपर्यवः ॥
ऋ० २।६ ३)
तीन तीन सामिधेनी बोलनी चाहिये (तीन पूर्वाह्न में और
तीन अपराह्न में) । यह रूपसमृद्ध है । जब रूपसमृद्धता होती है
अर्थात् जो कृत्य करना होता है उसी का उन ऋचाओं में वर्णन
होता है तभी यज्ञ सफल होता है ।
याज्य और अनुवाक्य में यह ऋचायें बोलनी चाहिये जो
जघ्निवती हैं। अर्थात् जिनमें 'हन्', 'मारना' धातु का प्रयोग है ।
यह ये हैं:—
(१) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद् द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र
आहुतः ॥ (ऋ० ६।१६।३४ )
(२) य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृंगो न वंशगः । अग्ने पुरो रुरोजिथ ।
(ऋ० ६।१६।३६ )
(३) त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा । त्वं भद्रो असि क्रतुः ॥
( ऋ० १।६१।५ )
(४) गयस्फानो अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । सुमित्रः सोम नो भव ॥
( ऋ० १।६१।१२ )
(५) इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळहमस्य पांसुरे ॥
(ऋ० १।२२।१७ )

चौथा अध्याय.] ७१
(६) त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धार-
यन् ॥ ( ऋ० १।२२।१८ )
( प्रातःकाल का क्रम यही है अर्थात् पहले तीन याज्य और
पिछले तीन अनुवाक्य ) । अपराह्न काल का क्रम पलट जाता है
अर्थात् पिछले तीन याज्य और पहले तीन अनुवाक्य ।
इन्हीं उपसदों द्वारा देवों ने असुरों को जीता और उनके
दुर्गों को तोड़ कर उसमें घुस गये ।
उपसद् मन्त्र एक ही छन्दों में हों, भिन्न-भिन्न छन्दों में नहीं ।
यदि भिन्न-भिन्न छन्द के होंगे तो राजा का दण्ड यजमान की
गर्दन पर होगा । होता रोग को उत्पन्न करने की शक्ति रखता
है । इसलिये मन्त्र एक ही छन्द में हों, भिन्न-भिन्न छन्दों में
नहीं ।
जनश्रुति के लड़के उपगविः ने उपसदों के विषय में ब्राह्मण में
ऐसा कहा है—“इसी उपसद् के कारण अश्लील (कुरूप) श्रोत्रिय
का मुख भरा-भरा लगता है । और वह गाता सा प्रतीत होता
है ।” यह उसने इसलिये कहा कि उपसदों में जो आज्य हवि होती
है वह गर्दन में और मुख पर रक्खी सी होती है । ( शायद इसका
तात्पर्य यह है कि आहुति में दिया हुआ घृत गले और मुख पर
असर डालता है—ले० ) । (८)
२६—यह जो प्रयाज या अनुयाज हैं वे देवों के कवच हैं ।
( उपसद्-इष्टि में ) प्रयाज और अनुयाज नहीं होते जिससे तीर
तेज़ हो और पीछे न हटे । ( वेदी और आहवनीय के बीच की
सीमा में ) खड़ा होकर होता मन्त्रों को बोलता है जिससे यज्ञ
क़ाबू में रहे और चला न जाय ।
कहते हैं कि सोम राजा के पास घृत छूने का कृत्य (तानूनपत्रम् )
करना क्रूरता है। कारण यह है कि इन्द्र ने घृत के वज्र से ही

७२ [ प्रथम पञ्चिका
वृत्र को मारा था। सोम की क्षति को पूरा करने के लिये सोम
पर जल छिड़कते हैं। और इस मंत्र को पढ़ते हैं :-
अंशुंरंशुष्टे देव सोमाप्या यतामिन्द्रायैकधनविद आतुभ्यमिन्द्रः प्याय-
तामात्वमिन्द्राय प्यायस्वाप्याययास्मान् त्सखीन्। सन्यामेधया स्वस्ति ते
देव सोम सुत्यामुदृचम शीय । (तै० १।२।११।२ )
जब वह सोम के पास घृत छूने का कृत्य करके उसके साथ
क्रूरता करते हैं तो उस पर जल छिड़क कर उसकी क्षति को पूरा
कर देते हैं और उसको बढ़ा देते हैं।
वह जो सोम राजा है वह द्यौ और पृथिवी का गर्भ है। नीचे
का मंत्र पढ़ के :-
एष्टा राय एष्टा वामानि प्रेषे भगाय। ऋतमृतवादिभ्यो नमो दिवे
नमः पृथिव्या इति।
प्रस्तर अर्थात् कुशों के दो बंडलों को (वेदी के दक्षिण कोने
में) फेंक देते हैं। द्यौ और पृथ्वी को नमस्कार करते हैं। इस प्रकार
वह उन दोनों को बढ़ाते हैं।(६)
ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त।

पाँचवाँ अध्याय
सोम क्रय तथा अग्नि प्रणयन
२७—सोम राजा गन्धर्वों के पास था। देवों और ऋषियों
ने विचारा कि यह सोम राजा हम तक कैसे आवे । वाणी बोली
कि गन्धर्व स्त्रियों को चाहते हैं। मैं स्त्री बन जाऊँगी तो तुम
(सोम के बदले ) मुझे बेच देना। देवों ने कहा, "नहीं, हम
तेरे बिना कैसे रहेंगे ?" उसने कहा, "मुझे उनके हाथ बेच दो।
यदि तुम चाहोगे तो मैं तुम्हारे पास लौट आऊँगी।" उन्होंने
ऐसा ही किया। और एक बड़ी नंगी स्त्री के रूप में उसे बेच
कर सोम ले लिया। उसी के अनुकरण रूप में एक बछिया के
बदले सोम मोल लिया जाता है। उस बछिया को फिर वापिस
खरीद लेते हैं क्योंकि वह वाणी वापिस आ गई थी। इसीलिये
(सोम खरीदने के बाद) मंत्र धीरे-धीरे बोलते हैं। क्योंकि
सोम खरीदने पर वाणी गन्धर्वों के पास होती है। परन्तु अग्नि-
प्रणयन के बाद वह फिर वापिस आ जाती है। (१)
( ७३ )

ब्राह्मण हो तो गायत्री छन्द बोले क्योंकि ब्राह्मण गायत्री

७४ [ प्रथम पञ्चिका
२८—(अग्नि प्रणयन* कृत्य का वर्णन आगे है)। अध्वर्यु
होता को आदेश करता है कि (जब अग्नि को उत्तरवेदी में ले
जाना हो तो) अग्नि प्रणयन के उचित मंत्र बोलो। (वह पढ़ता
है :—)
'प्रदेवं देव्या धिया भरता जातवेदसम् । हव्या नो वक्षदानुषक् ॥
(ऋ० १०।१७६।२)
ब्राह्मण हो तो गायत्री छन्द बोले क्योंकि ब्राह्मण गायत्री
वाला है। गायत्री तेजयुक्त और ब्रह्मवर्चस्-युक्त है। इस प्रकार
यह यजमान को तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी करता है।
यदि क्षत्रिय हो तो त्रिष्टुप् † छन्द में यह मन्त्र बोले :—
इमं महे विदथ्याय शूषं शश्वत् कृत्व ईड्याय प्रजभ्रुः ।
शृणोतु नो दम्येभिरनीकैः शृणोत्वग्निर्दिव्यैरजस्रः ॥
(ऋ० ३।५४।१)
त्रिष्टुभ् वाला क्षत्रिय है। त्रिष्टुभ् ओज, इन्द्रिय-बल और
पराक्रम युक्त है। इस प्रकार वह यजमान को ओज, इन्द्रिय-बल
और पराक्रम-युक्त कर देता है। इस मन्त्र में जो कहा "शश्वत्
कृत्व ईड्याय प्रजभ्रुः (अर्थात् सदा पूजनीय के लिये लाये)
इससे होता यजमान को उसके सम्बन्धियों के ऊपर श्रेष्ठ बनाता
है। यह जो कहा :—
शृणोतु नो दम्येभिरनीकैः शृणोत्वग्निर्दिव्यैरजस्रः ।
(अग्नि हमारी बात को तेज चिंगारियों से सुने। अग्नि
निरन्तर हमको दिव्य प्रकाश के द्वारा सुने।) इससे ऐसा ही

  • 'अग्नि-प्रणयन' का अर्थ है अग्नि को ले जाना। यह कृत्य तब
    होता है जब अग्नि को उत्तरवेदी में ले जाते हैं।
    † इस मंत्र का छन्द 'पंक्ति' है। ऋग्वेद में भी इसका "निचृत्-
    पंक्ति" ही छन्द दिया हुआ है। न जाने यहाँ त्रिष्टुम् क्यों दिया ?

पाँचवाँ अध्याय ] ७५
होता है। अग्नि बुढ़ापे तक निरन्तर उसके घर में रहती है।
यदि वैश्य हो तो नीचे का जगती ❊ छन्द वाला मन्त्र
बोले :-
अय॑मि॒ह प्र॑थ॒मो धा॑यि धा॒तृभि॒र्होता॒ यजि॑ष्ठो अध्व॒रेष्वीड्य॑: ।
यमप्न॑वानो॒ भृग॑वो विरुरुचुर्वने॑षु चि॒त्रं वि॒भवं॑ वि॒शे वि॑शे ॥
( ऋ० ४।७।१ )
वैश्य जगती वाला है। पशु जगती वाले हैं। इस प्रकार वह
यजमान को पशु-युक्त कर देता है। चौथे पाद में “वनेषु चित्रं
विभवं विशे विशे” में विश शब्द वैश्य के अर्थ में आया है।
इससे इसमें रूप समृद्धता है। जो रूप समृद्ध है वही यज्ञ में
सफलता देता है।
अयमुष्य प्र देवयुर्होता यज्ञाय नीयते। रथो न योरभीशुतो घृणी-
ञ्चेतति त्मना ॥ ( ऋ० १०।१७६.३ )
इस अनुष्टुभ् वाले मंत्र से वाणी को छोड़ता है ( अर्थात
जोर से बोलता है )। अनुष्टुभ् वाणी है। अनुष्टुभ् छन्द बोल
कर वह वाणी को वाणी में छोड़ता है।
‘अयमुष्य’ से यह तात्पर्य है कि “मैं जो पहले गन्धर्वों के
साथ थी अब वापिस आ गई।”
अयमग्निरुरुष्यत्यमृतादिव जन्मनः। सहसश्चित् सहीयान् देवो
जीवात्वे कृतः ॥ ( ऋ० १०।१७६।४ )
( यह अग्नि अपनी अमृत प्रकृति से हमको निडर बनाती
है ) इस मंत्र को पढ़ कर वह यजमान को अमर बनाता है।
दूसरे पाद “सहसश्चित् सहीयान् देवो जीवात्वे कृतः”
( देवता हमारे जीवन के लिये अपनी शक्ति द्वारा शक्तिशाली
बनाया गया ) से यह तात्पर्य है कि मंत्र को पढ़ कर अग्नि को
अपने जीवन का रक्षक बनाता है।
❊ यह वेद में त्रिष्टुभ् दिया हुआ है।

७६ [ प्रथम पञ्चिका
अब होता पढ़ता है :-
इला यास्त्वा पदे वयं नाभा पृथिव्या अधि। जातवेदो निधीमह्यग्ने
हव्याय वोह्लवे ॥ (ऋ० ३।२६।४)
(हे जातवेद अग्नि हम तुझको पृथिवी की नाभि में इला के
स्थान में हवि के ले जाने के लिये रखते हैं)। "इला के पद"
का अर्थ है उत्तरवेदी की नाभि। 'जातवेदोनिधीमहि' का अर्थ
है कि 'वह अग्नि हवि को ले जायगा।'
अब होता पढ़ता है :-
अग्ने विश्वेभिः स्वनीक देवैरूर्णावन्तं प्रथमः सीदयोनिम्। कुलायिनं
घृतवन्तं सवित्रे यज्ञं नय यजमानाय साधु ॥ (ऋ० ६।१५।१६)
(हे अग्नि सब देवों के साथ पहले अपनी ऊन से भरी हुई
योनि या स्थान में बैठ। सविता रूपी यजमानों के लिये घी वाले
यज्ञ की आहुतियों को ले जा)। 'अग्ने विश्वेभिः' कह कर वह
अग्नि को अन्य देवों के साथ बिठाता है। "कुलायिनं घृत वन्तं
सवित्रे" कह कर देवदास की लकड़ियों, गुग्गल, ऊन, और सुगन्ध
युक्त घास से अग्नि के लिये यज्ञ में चिड़िया के घोंसले के समान
स्थान बनाया जाता है, 'यज्ञं नय यजमानाय साधु' कह कर यज्ञ
को सीधा अग्नि पर रखता है।
अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :-
सीद होतः स्व उ लोके चिकित्वान् त्सादय यज्ञं सुकृतस्य योनौ।
देवावीर्देवान् हविषा यजास्यग्ने बृहद् यजमाने वयो धाः ॥
(ऋ० ३।२६।८)
[हे होता (अर्थात् अग्नि) अपने स्थान में बैठ, हे प्रसिद्ध
(अग्नि) सुकृत अर्थात् अच्छी तरह बने हुये घोंसले के सूराख
(योनि) में यज्ञ को बिठाल। हवि के साथ देवों के पास जाने
वाले अग्नि! देवों के लिये मन्त्र बोल (यज)। हे अग्नि यज-
मान के लिये वृद्धि और आयु को धारण करा]।

पाँचवाँ अध्याय ] ७७
अग्नि देवों का होता है। उत्तरवेदी की नाभि ही उसका
अपना लोक है। 'साद्या यज्ञं सुकृतस्य योनौ' में यजमान ही यज्ञ
है। इसलिये यजमान के लिये आशीर्वाद है। "देवावीर्देवान् हविषा
यजात्याग्ने बृहद् यजमाने वयो धा' में प्राण ही वयः है। ऐसा
कह कर यजमान में प्राण धारण कराता है।
अब होता नीचे का मन्त्र पढ़ता है :-
निहोता होतृषदने विदानस्त्वेधो दीदिवाँ असदत्सुदक्षः । अदब्ध व्रत
प्रमतिर्वसिष्ठः सहस्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः ॥ (ऋ० २।६।१)
[ ज्ञानवान्, प्रकाशवान्, और दक्ष होता होतृ के स्थान में
बैठा। वह होता अग्नि कैसा है ? अदब्धव्रतप्रमति (उचित
व्रतों का जानने वाला), वसिष्ठ (उत्तम), सहस्रंभर (हज़ारों
का पोषण करने वाला), शुचिजिह्वः (चमकदार जीभ वाला]।
अग्नि देवों का होता है। उत्तर वेदी की जो नाभि है वह
उसका बैठने का स्थान है। 'बैठ गया' से तात्पर्य है कि 'वह रख
दिया गया'। 'उचित व्रत का जानने वाला और उत्तम' से तात्पर्य
है कि देवों का अग्नि वसिष्ठ अर्थात् उत्तम है। 'सहस्र भर' का
अर्थ है कि यद्यपि अग्नि एक है तो भी भिन्न २ अवसरों पर
प्रयुक्त होने के कारण उसमें बहुत्व हो जाता है। जो इस रहस्य
को समझता है वह हज़ारों का लाभ पाता है। नीचे का मंत्र पढ़
कर समाप्त करता है :-
त्वं दूतस्त्वमु नः परस्पास्त्वं वस्य आ वृषभप्रचेता ।
अग्ने तोकस्य नस्तने तनूनामप्रयुच्छन्दीद्यद्बोधि गोपाः ॥
(ऋ० २।६।२)
(तू हमारा दूत है। तू हमारा पीछे भी रक्षक है। हे बलवान्,
तू धन का लाने वाला है। हे अग्नि, हमारे घराने के फैलने में
शरीरों की रक्षा में असावधानी न कर। चमकने वाला गोप
जागता था)।

७८ [ प्रथम पञ्चिका
अग्नि देवों का गोप या ग्वाला है। जो इस रहस्य को समझ
कर अग्नि-प्रणयन के कृत्य को इस मंत्र से समाप्त करता है वह
अपने और यजमान के लिये अग्नि को हर स्थान पर अपना
गोप या रक्षक पाता है और साल भर तक कल्याण लाभ
करता है।
वह इन आठ मंत्रों को पढ़ता है जो रूप-समृद्ध हैं। जिसमें
रूप-समृद्धता होती है अर्थात् जो मंत्र पढ़ा जाय उसमें वही क्रिया
वर्णित हो उसी से यज्ञ सफल होता है। इनमें पहला तीन बार
पढ़ा जाता है और आख़िरी तीन बार। इस प्रकार बारह हो जाते
हैं। साल में बारह मास होते हैं। संवत्सर को प्रजापति कहते
हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह इन प्रजापति-सम्बन्धी
ऋचाओं द्वारा सुखी होता है। पहली और पिछली ऋचा को
तीन बार पढ़ कर वह यज्ञ के दोनों सिरों को बांधता है जिससे
यज्ञ काबू में रहे और गिर न पड़े। (२)
२९—अध्वर्यु होता को आदेश देता है कि दोनों हविर्धानों
(वह बर्तन जिसमें हवि रक्खा जाय) के ले जाने के लिये उचित
मंत्र पढ़ो।
वह पढ़ता है।
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरेः।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥
(ऋ० १०।१३।१)
ये देव ब्रह्म से युक्त हुये। दोनों हविर्धानों को ब्रह्म से युक्त
करता है। इस प्रकार ब्रह्म की शक्ति पाकर विपत्ति में नहीं
पड़ता।
अब नीचे के तीन मंत्रों (तृचों) को बोलता है :-
प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा युवामिदा वृणीमहे। अग्निं च हव्यवाहनम् ॥
(ऋ० २।४१।१६)

पाँचवाँ अध्याय ] ७९
द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम् । यज्ञं देवेषु यच्छताम् ॥
( ऋ० २।४१।२० )
आ वामुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु यज्ञियाः । इहाद्य सोम पीतये ॥
( ऋ० २।४१।२१ )
यह द्यावा-पृथिवी के मंत्र हैं ।
यहां प्रश्न होता है कि जब हविर्धानों के ले जाने का प्रसंग
था तो द्यावा-पृथिवी की तीन ऋचायें क्यों बोली गईं । इसका
उत्तर यह है कि द्यौ और पृथिवी देवों के दो हविर्धान हैं । जो
कुछ हवि यहां दिया जाता है वह सब द्यौ और पृथिवी के बीच
में ही होता है । इसलिये द्यावा-पृथिवी बोधक ऋचायें पढ़ी गईं ।
यमे इव यतमाने यदैतं प्र वां भरन् मानुषा देवयन्तः ।
आ सीदतं स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवतमिन्दवे नः ॥
( ऋ० १०।१३।२ )
‘यमे इव यतमाने यदैतं’ का अर्थ है कि ‘दोनों हविर्धान
जुड़वां बहनों के समान हाथ पसार कर चलते हैं’ । “प्रवां भरन्
मानुषा देवयन्तः” का अर्थ है कि ‘आदमी देवों की पूजा करते
हुये तुम दोनों को लाते हैं’, ‘स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवत-
मिन्दवे नः’ में ‘इन्दु’ के नाम से सोम का वर्णन है । इस आधी
ऋचा को पढ़ कर सोम राजा के बैठने का स्थान ठीक करता है ।
अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं वचो यतस्रुचा मिथुना या सपर्यतः ।
असंयत्तौ व्रते ते क्षेति पुष्यति भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वते ॥
( ऋ० १।८३।३ )
यह जो ‘उक्थ्यं वचः’ है वह दो हविर्धानों का तीसरा ढकना
है । क्योंकि ‘उक्थ्यंवचः’ यज्ञ का कर्म है इसलिये ऐसा कह कर
यज्ञ की उन्नति करता है ।
मंत्र में “यतस्रुचा……पुष्यति” तक में ‘यत्त’ वाले पद से
जो ‘क्रूरता’ प्रकट होती है उसका “असंयत्त”, पद से शमन करता

८० [ प्रथम पञ्चिक
है “भद्रा शक्तिः” इत्यादि से यजमान के लिये आशीर्वाद देता है।
अब वह विश्वरूपी ऋचा पढ़ता है
विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासावीद् भद्रं द्विपदे चतुष्पदे ।
वि नाकमख्यत् सविता वरेण्योऽनु प्रयाणमुषसो विराजति ॥
( ऋ० ५।८१।२ )
इस मंत्र को रराटी की ओर देखते हुए पढ़ना चाहिये,
( रराटी दर्भ की माला है जो हविर्धान के बीच के खंभों पर
लटकी रहता है —ले० )। क्योंकि इस रराटी पर ही सफेद ओर
काली सभी तरह की चीजें टंगी रहती हैं। जो इस रहस्य को
समझ कर रराटी की ओर देखते हुये मंत्र को बोलता है वह अपने
लिये और यजमान के लिये हर एक प्रकार की चीज सम्पादित
कर लेता है।
इस मंत्र को पढ़ कर समाप्त करता है।
परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः ।
वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ ( ऋ० १।१०।१२ )
इस मंत्र को तब पढ़े जब दोनों हविर्धानों को दर्भ के गुच्छे
से ढका हुआ मान ले। जो इस रहस्य को समझ कर दोनों
हविर्धानों के ढक जाने पर इस मंत्र को पढ़ता है वह अपने और
यजमान के लिये ओढ़ी पहनी हुई स्त्रियों का ( जो नंगी न हों )
सम्पादन करता है।
दोनों हविर्धान यजु-मंत्र से ढके जाते हैं। अध्वर्यु इस यजु
से इस प्रकार ढकते हैं। जब अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दोनों
ओर से मेथी ( एक प्रकार की लकड़ियां ) चलावें तब समाप्त
करना चाहिये। क्योंकि तभी दोनों हविर्धान बन्द होते हैं। यह
आठ ऋचायें जो बोली गईं रूप-समृद्ध हैं। जो रूप-समृद्ध होती
हैं अर्थात् जिनमें उसी बात का विधान होता है। जो क्रिया की जाती
है उसी से यज्ञ में सफलता होती है। इनमें से पहले और पिछले

प्रथम पञ्चिका ] ८१
को तीन बार बोलते हैं जिससे बारह हो जायं। क्योंकि साल
में बारह महीने होते हैं। प्रजापति संवत्सर है। जो इस रहस्य
को समझता है वह प्रजापति सम्बन्धी इन ऋचाओं द्वारा समृद्धि
को पाता है।
पहली और पिछली ऋचा को तीन २ बार पढ़ कर वह
यज्ञ के दोनों सिरों को बांध देता है जिससे यज्ञ काबू में रहे और
गिर न जाय। (३)
३०—( उत्तर वेदी में अग्नि और सोम को लाना )।
अग्नि और सोम के लाने पर अध्वर्यु होता को आदेश देता
है कि उचित मंत्र पढ़ो।
वह सविता के मंत्र को पढ़ता हैः—
सावीर्हि देव प्रथमाय पित्र वर्ष्माणमस्मै वरिमाणमस्मै ।
अथ स्मभ्यं सवितर्वार्याणि दिवोदिव आ सुवा भूरि पश्वः ॥
(अथर्व ७।१४।३, आश्व० श्रौ० ४।१० )
यहां प्रश्न होता है कि जब अग्नि और सोम के लाने का
प्रसंग है तो सविता का मंत्र क्यों पढ़ा गया। ( इसका उत्तर
यह है ) कि सविता प्रसव का स्वामी है। इस मंत्र को पढ़कर
( अग्नि और सोम ) दोनों को सविता द्वारा उत्पन्न कराते हैं।
इस लिये सविता का मंत्र पढ़ते हैं।
अब वह ब्रह्मणस्पति की ऋचा पढ़ता है :—
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्रदेव्येतु सूनृता ।
अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥
( ऋ० १।४०।३ )
यहां प्रश्न होता है कि जब अग्नि और सोम के लाने का
प्रसंग है तो ब्रह्मणस्पति का मंत्र क्यों पढ़ते हैं। ( उत्तर यह है )
कि बृहस्पति ही ब्रह्मा है। इस मंत्र को पढ़कर ब्रह्मा को ( अग्नि
और सोम ) दोनों का पुरोगव अर्थात् नेता बना देता है और
६

८२ [प्रथम पत्रिका
यजमान ब्रह्म से युक्त होकर हानि नहीं उठाता। 'प्रदे॒व्ये॑तु सूनृता'
से यज्ञ को 'सूनृत' या भद्र युक्त कर देता है। इसलिये ब्रह्मण-
स्पति का मंत्र पढ़ता है।
अब अग्नि की गायत्री छन्द की तीन ऋचाओं को पढ़ता है:-
होता॑ दे॒वो अम॑र्त्यः पुर॒स्तादे॑ति मा॒यया॑। वि॒दथा॑नि प्र॒चोद॑यन् ॥
(ऋ० ३।२७।७)
वा॒जी वाजे॑षु धीयतेऽध्व॒रेषु॒ प्र णी॑यते। विप्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ सा॒धन॑:॥
(ऋ० ३।२७।८)
धि॒या च॑क्रे वरे॒ण्यो भूतानां॒ गर्भ॑माद॒धे। दक्ष॑स्य पि॒तरं॑ त॒ना॥
(ऋ० ३।२७।६)
जब सोमराजा को (उत्तर वेदी पर) एक बार ले गये तो
असुरों और राक्षसों ने उसको 'सदस्' और हविर्धानों के बीच
में मारना चाहा। अग्नि ने माया से उसको बचा लिया। जैसा
कि मंत्र में है “पुरस्तादेति मायया” (माया से आगे २ चलता
है)। अग्नि ने उसे इस तरह बचाया। इसलिये (सोम के)
आगे २ अग्नि को ले चलते हैं।
अब नीचे लिखे तीन मंत्र और एक मंत्र बोलते हैं:—
(१) उप॑ त्वाग्ने दि॒वे दि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धिया व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि।
(२) राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्ध॑मानं॒ स्वे दमे॑॥
(३) स न॑: पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥
(ऋ० १।१।७-६)
(४) उप॑ प्रि॒यं प॑नि॒प्नतं॒ युवान॒माहु॑तीवृधम्॥ अगन्म बिभ्रतो नमः॥
(ऋ० ६।१६।२६)
क्योंकि यह दो अग्नियां, एक जो पहले लाई गई और दूसरी
जो पीछे लाई गई, यदि आपस में लड़ जायं तो यजमान को
कष्ट देंगी। इन तीन और एक मंत्रों को पढ़ कर वह उन में

पाँचवाँ अध्याय ] ८३
भिन्नता कर देता है और उनको उन उन के स्थान में पहुँचा देता
है, बिना स्वयं अपने को या यजमान को हानि पहुँचाये हुये ।
आहुति देते हुये इस मंत्र को बोलता है :—
अग्ने जुषस्व प्रति हर्य तद्वचो मन्द्र स्वधाव ऋतजात सुक्रतो॑ ।
यो विश्वतः प्रत्यङ् ङसि दर्शतो रण्वः सन् दृष्टौ पितुमाँ इव क्षयः ॥
( ऋ० १।१४४।७ )
इससे अग्नि को एक जुष्टि ❀(१) आहुति देता है ।
जब सोम राजा को ले जाते हैं तो होता नीचे के तीन मंत्र
जो गायत्री छन्द में हैं और सोम देवता के हैं पढ़ता है :—
(१) सोमो जिगाति गातुविद् देवानामेति निष्कृतम् । ऋतस्य
योनिमासदम् ॥
(२) सोमो अस्मभ्यं द्विपदे चतुष्पदे च पशवे । अनमीवा इषस्करत् ॥
(३) अस्माकमायुर्वर्धयन्नभिमातीः सहमानः । सोमः सधस्थमासदत् ॥
( ऋ० ३।६२।१३,१४,१५ )
इस मंत्र को पढ़ने से वह सोम को उसी के देवता और उसी के
छन्द से बढ़ाता है ।
‘सोमः सधस्थमासदत्’ यह अन्तिम शब्द जिनसे प्रकट होता
है कि सोम अपने स्थान पर बैठ रहा है होता को उस समय
पढ़ने चाहिये जब कि सोम को लिये जा रहे हैं और अग्नीध्र
के आगे बढ़ गये हैं तथा होता की पीठ अग्नीध्र की ओर हो
गई है । अब विष्णु देवता का नीचे का मंत्र जपता है :—
तमस्य राजा वरुणास्तमश्विना ऋतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः ।
दधार दक्षमुत्तममहर्विदं व्रजं च विष्णुः सखियाँ अपोर्णुते ।
( ऋ० १।१५६।४ )
❀हौग ने जुष्टि का अर्थ किया है- ‘as a favour’ or रियायती ।
सायण कहता है कि यह आहुति ‘अग्ने प्रियं’ अग्नि को प्रिय लगने
के लिये है ।

८४ [ प्रथम पञ्चिका
( उस मरुतों के राजा विष्णु की बुद्धि का वरुण और दोनों
अश्विन अनुकरण करते हैं। विष्णु अपने मित्रों सहित अन्धकार
के स्थान को खोल कर दिन को उत्पन्न करता है।)
विष्णु देवों का द्वारपाल है। इस लिये वह सोम के लिये
द्वार खोल देता है ।
जब सोम को सदस् में रखने के निकट होते हैं तो यह मंत्र
पढ़ता है :—
अन्तश्च प्रागा अदितिर्भवास्यवयाता हरसो दैव्यस्य । इन्द विन्द्रस्य
सख्यं जुषाणः श्रोधीव धुरमनुराय ऋध्याः । ( ऋ० ८।४८।२ )
जब सोम बैठ गया हो तो यह मंत्र पढ़ते हैं :—
श्येनो न योनि सदनं धिया कृतं हिरण्ययमसदं देव एषति । प-
रिखन्ति बर्हिषि प्रियं गिराश्वो न देवां अप्येति यज्ञियः ।
( ऋ० ६।७१।६ )
जैसे बाज पक्षी अच्छी तरह बनाये हुये घोंसले में बैठता
है वैसे ही सोम देवता स्वर्ण के आसन पर बैठता है। आसनों
पर प्यारी स्तुतियां चलती हैं और यज्ञ सम्बन्धी घोड़े के समान
वह देवताओं तक पहुँचता है ।
स्वर्ण के आसन से काले मृगचर्म का तात्पर्य है जिससे देवों
का हवि ढका जाता है ।
वरुण के इस मंत्र से समाप्त करता है :—
अस्तभ्नाद् द्यामसुरो विश्ववेदा अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः ।
आसीदद् विश्वा भुवनानि सम्राड् विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि ।
( ऋ० ८।४२।१ )
( असुर अर्थात् प्राणों के रक्षक देव ने द्यौ को थामा और
पृथिवी के विस्तार को नापा । उस सम्राट् ने सब लोकों में प्रवेश
किया। यह सब वरुण के व्रत हैं )