सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 84

७८ [ प्रथम पञ्चिका
(२) यः पञ्च चर्षणीरभि निषसाद दमे दमे । कविर्गृहपतिर्युवा ॥
(ऋ० ७।१५।२)
(३) स नो वेदो अमात्यमग्नी रक्षतु विश्वतः । उतास्मान् पात्वंहसः ॥
(ऋ० ७।१५।३)
(४) इमां मे अग्ने समिधमिमामुपसदं वनेः । इमा उ षु श्रुधी गिरः ॥
(ऋ० २।६।१)
(५) अया ते अग्ने विधेमोजो नपादश्वमिष्टे । एना सूक्तेन सुजात ।
(ऋ० २।६।२)
(६) तं त्वा गीर्भिर्गिर्वणसं द्रविणस्युं द्रविणोदः । सपर्यम सपर्यवः ॥
ऋ० २।६ ३)
तीन तीन सामिधेनी बोलनी चाहिये (तीन पूर्वाह्न में और
तीन अपराह्न में) । यह रूपसमृद्ध है । जब रूपसमृद्धता होती है
अर्थात् जो कृत्य करना होता है उसी का उन ऋचाओं में वर्णन
होता है तभी यज्ञ सफल होता है ।
याज्य और अनुवाक्य में यह ऋचायें बोलनी चाहिये जो
जघ्निवती हैं। अर्थात् जिनमें 'हन्', 'मारना' धातु का प्रयोग है ।
यह ये हैं:—
(१) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद् द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र
आहुतः ॥ (ऋ० ६।१६।३४ )
(२) य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृंगो न वंशगः । अग्ने पुरो रुरोजिथ ।
(ऋ० ६।१६।३६ )
(३) त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा । त्वं भद्रो असि क्रतुः ॥
( ऋ० १।६१।५ )
(४) गयस्फानो अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । सुमित्रः सोम नो भव ॥
( ऋ० १।६१।१२ )
(५) इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळहमस्य पांसुरे ॥
(ऋ० १।२२।१७ )