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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

ब्राह्मण में है) । (२)

४१४ [ सातवीं पञ्चिका
दूध की आहुति दे, जिसमें दूसरे का बछड़ा लगाया गया हो
क्योंकि जैसा उस गाय का दूध है वैसा ही मरे हुये का अग्नि-
होत्र है। या किसी और गाय का दूध।
यह भी उपाय बताया जाता है। मृत अग्निहोत्री के सम्बन्धी
उन तीनों अग्नियों को जलता रक्खें जब तक कि मृतक की
अस्थियाँ ठंढी करके इकट्ठी न हों। अगर मृतक का शरीर न
मिले तो ३६० पलाश की लकड़ियां लेकर एक पुरुष की शक्ल
का बनावे और उसका अन्त्येष्टि संस्कार करे। और उन
बनावटी शरीरांगों को उन अग्नियों के पास लाकर अग्नियों को
शांत कर दे। यह पुरुष इस प्रकार बनाया जाय :- १५० लक-
ड़ियों का धड़, १४० की जाँघें, ५० की कमर, शेष का सिर।
यही इसका प्रायश्चित्त है। (१)
३—( पंचिका पाँच, अध्याय ५, ब्राह्मण २७ वही है जो इस
ब्राह्मण में है) । (२)
४—वे पूछते हैं कि यदि सायंकाल को दुहा हुआ सान्नाय्य
खराब हो जाय या खो जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ?
इसका प्रायश्चित्त यह है कि अग्निहोत्री प्रातःकाल के दूध के
दो भाग करे और आधे का दही बनाकर उसकी आहुति
दे दे।
अब सवाल है कि अगर प्रातःकाल दुहा हुआ सान्नाय्य
खराब हो जाय या खो जाय तो क्या प्रायश्चित्त है ? इसका
प्रायश्चित्त यह है कि इन्द्र और महेन्द्र के लिये पुरोडाश बनावे
और दूध के बजाय उसके भाग करके आहुति दे।
अब प्रश्न यह है कि यदि सान्नाय्य का सब दूध बिगड़ जाय
या नष्ट हो जाय तो क्या प्रायश्चित्त है ? इसका वही इन्द्र और
महेन्द्र के पुरोडाश का प्रायश्चित्त है।

दूसरा अध्याय ] ४१५
अब प्रश्न यह है कि अगर सभी हवियाँ बिगड़ जायें या
खो जायें तो क्या प्रायश्चित्त है ? इसका प्रायश्चित यह है कि
घी की आहुतियाँ ले और सब देवताओं का भाग अलग अलग
करे । और याज्य हवि को इष्टि के रूप में दे । तब दूसरी इष्टि
तैयार करे । यह यज्ञ ही उस यज्ञ का प्रायश्चित्त है। (३)
५-अब प्रश्न यह है कि अग्निहोत्र का सामान करने पर
अगर अग्नि में कोई अनुचित वस्तु गिर पड़े तो क्या प्रायश्चित्त
है ? इसका प्रायश्चित्त यह है कि इस सब को स्रुच में भर कर
पूर्व को ले जाकर आहवनीय अग्नि में डाल दे। फिर आहवनीय
के उत्तर के भाग से गर्म भस्म को लेकर मन में अग्नि के मंत्रों
को जपकर या प्रजापति के मंत्र को पढ़ कर आहुतियाँ दे दे।
इस प्रकार आहुति जल तो जाती है लेकिन यथा रीति हवन
नहीं होता। चाहे एक आहुति खराब हो चाहे अधिक, प्राय-
श्चित्त वही है। यदि दुष्ट पदार्थ को फेंककर अदुष्ट पदार्थ डाल कर
आहुति दे तो क्रमानुकूल आहुति दे । यह प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न यह है कि यदि अग्नि होत्र के लिये पकाई गई
हवि गिर जाय या उबल कर निकल जाय तो इस का क्या
प्रायश्चित है ? उस पर जल छिड़क दे । शान्ति के लिये ।
जल ही शान्ति है। सीधे हाथ से उसे छू कर यह मंत्र
जपता है :-
“दिवं तृतीयं देवान् यज्ञो गात् । ततो मा द्रविणमाष्टांतरिक्षं
तृतीयं पितॄन् यज्ञो गात् । ततो मा द्रविणमाष्ट पृथिवीं तृतीयं मनुष्यान्
यज्ञो गात् ह । ततो मा द्रविणमाष्ट ।”
“तीसरा यज्ञ के रूप में द्यौ लोक में देवों के पास जावे ।
यहाँ से मुझे धन मिले । तीसरा यज्ञ के रूप में अन्तरिक्ष में
पितरों के पास जावे । वहाँ से मुझे धन मिले । तीसरा यज्ञ के

४१६ [ सातवीं पञ्चिका
रूप में पृथिवी पर मनुष्यों के पास आवे । वहाँ से मुझे धन
मिले । अब वह नीचे का विष्णु और वरुण का मंत्र पढ़े :--
ययोरोजसा स्कभिता रजांसि ( अथर्व० ७।२५।१ )
क्योंकि यज्ञ में जो बुराई है उसकी विष्णु रक्षा करता है
और जो भलाई है उसकी वरुण । उन दोनों की शान्ति के
लिये । यही प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि जब हवि को तैयार करके अध्वर्यु आहव-
नीय अग्नि में पूर्व की ओर ले जाता है तो उस समय यदि
हवि गिर जाय या उबल कर निकल जाय तो इसका क्या
प्रायश्चित्त है ? यदि वह अपना मुँह पीछे को करेगा तो यज-
मान को स्वर्ग से विमुख कर देगा । इससे कोई दूसरा ही
उसके लिये उस गिरी हुई हवि को इकट्ठा करके यथा क्रम
आहुतियाँ दे देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि यदि स्रुक् टूट जाय तो क्या प्रायश्चित्त
है ? दूसरा स्रुक् ले और उससे आहुति दे । तब टूटे हुये स्रुक्
को आहवनीय अग्नि में छोड़ दे, हस्ता आगे को और प्याली
पीछे को । यह उसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि अगर आहवनीय की अग्नि ही जलती हो,
गार्हपत्य की बुझ गई हो तो क्या प्रायश्चित्त है ? अगर आहव-
नीय के पूर्व भाग को गार्हपत्य के लिये ले आवे तो अपनी
प्रतिष्ठा खो देगा । यदि पश्चिमी भाग ले आवे तो असुरों के
समान यज्ञ करेगा । यदि फिर अग्नि उत्पन्न करे तो यजमान
के लिये शत्रु बनावेगा । यदि बुझावे तो यजमान के प्राण चलें
जायँ । इसलिये सम्पूर्ण आहवनीय अग्नि को लेकर उस में
गार्हपत्य की राख मिला कर गार्हपत्य अग्नि में रख देवे ।
फिर पूर्व भाग को आहवनीय में रख देवे । यही इसका
प्रायश्चित्त है । (४)