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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 592 में से

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पृष्ठ 85

चौथा अध्याय.] ७१
(६) त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धार-
यन् ॥ ( ऋ० १।२२।१८ )
( प्रातःकाल का क्रम यही है अर्थात् पहले तीन याज्य और
पिछले तीन अनुवाक्य ) । अपराह्न काल का क्रम पलट जाता है
अर्थात् पिछले तीन याज्य और पहले तीन अनुवाक्य ।
इन्हीं उपसदों द्वारा देवों ने असुरों को जीता और उनके
दुर्गों को तोड़ कर उसमें घुस गये ।
उपसद् मन्त्र एक ही छन्दों में हों, भिन्न-भिन्न छन्दों में नहीं ।
यदि भिन्न-भिन्न छन्द के होंगे तो राजा का दण्ड यजमान की
गर्दन पर होगा । होता रोग को उत्पन्न करने की शक्ति रखता
है । इसलिये मन्त्र एक ही छन्द में हों, भिन्न-भिन्न छन्दों में
नहीं ।
जनश्रुति के लड़के उपगविः ने उपसदों के विषय में ब्राह्मण में
ऐसा कहा है—“इसी उपसद् के कारण अश्लील (कुरूप) श्रोत्रिय
का मुख भरा-भरा लगता है । और वह गाता सा प्रतीत होता
है ।” यह उसने इसलिये कहा कि उपसदों में जो आज्य हवि होती
है वह गर्दन में और मुख पर रक्खी सी होती है । ( शायद इसका
तात्पर्य यह है कि आहुति में दिया हुआ घृत गले और मुख पर
असर डालता है—ले० ) । (८)
२६—यह जो प्रयाज या अनुयाज हैं वे देवों के कवच हैं ।
( उपसद्-इष्टि में ) प्रयाज और अनुयाज नहीं होते जिससे तीर
तेज़ हो और पीछे न हटे । ( वेदी और आहवनीय के बीच की
सीमा में ) खड़ा होकर होता मन्त्रों को बोलता है जिससे यज्ञ
क़ाबू में रहे और चला न जाय ।
कहते हैं कि सोम राजा के पास घृत छूने का कृत्य (तानूनपत्रम् )
करना क्रूरता है। कारण यह है कि इन्द्र ने घृत के वज्र से ही