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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

ब्राह्मणाच्छंसी प्रतिदिन यह मंत्र पढ़ता है :—

चौथा अध्याय ] ३८७
करना चाहिये ) । इन मंत्रों को पढ़ कर इन्द्र को बुलाता है जैसे
गाय के पास बैल को। यह पाठ यज्ञ के सिलसिले को कायम
रखने के लिये है। इससे सिलसिला कायम रहता है। (५)
२२—मैत्रावरुण सूक्तों से पहले हर दिन यह मंत्र बोलता
है :—
अप प्राच इन्द्र विश्वाँ अमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व ।
अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन् मदेम ॥
( ऋ० १०।१३१।१ )
“हे इन्द्र सब अमित्रों को दूर कर दो। हे विजयी, उनको
भगा दो। चाहे वे दक्षिण में हों या उत्तर में। जिससे कि हम
तेरी विस्तृत शरण से लाभ उठा सकें।”
इसमें अभय की बात है। वह अभय चाहता है।
ब्राह्मणाच्छंसी प्रतिदिन यह मंत्र पढ़ता है :—
ब्रह्मणा ते ब्रह्मयुजा युनज्मि...( ऋ० ३।३५।४ )
'युनज्मि' में 'जोड़' का भाव है। 'अहीन यज्ञों का यही
रूप है।
अच्छावाक प्रतिदिन यह मंत्र पढ़ता है :—
उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्...( ऋ० ६।४७।८ )
'अनु' अहीन यज्ञों का रूप है। और 'नेषि' सत्र का रूप
है।
इन मंत्रों को रोज पढ़े। अन्त के मंत्र एक से हैं। इन्द्र
यजमान के घर में व्यापक है। वह यज्ञ में है। जैसे बैल गाय
के पास जाता है और गाय प्रसिद्ध गोशाला में जाती है। इसी
प्रकार इन्द्र यज्ञ में जाता है।
अहीन यज्ञ को “शुनं हुवेम” ( ऋ० ३।३०।२२ ) से समाप्त
न करें। क्योंकि जो क्षत्रिय उसको अपने राज्य में आने देता

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है जो उसका शत्रु हो चुका है तो उसका राष्ट्र क्षीण हो
जाता है। (६)
२३—अहीन 'यज्ञ की युक्ति भी है और विमुक्ति भी।
( जोड़ना और अलग करना )।
अहीन इन ब्राह्मणाच्छंसीय मंत्रों से युक्त होता है ;—
व्यंतरिक्षमतिरद्...( ऋ० ८।१४।७-६ )
और इन मंत्रों से विमुक्त होता है:—
एवेदिंद्रम्...( ऋ० ७।२३।६ )
अच्छावाक् के इस मंत्र से युक्त होता है :—
आहं सरस्वती वतोः...( ऋ० ८।३८।१० )
इस मंत्र से विमुक्त होता है :—
नूनं सा ते...( ऋ० २।११।२१ )
मैत्रावरुण इस मंत्र से जोड़ता है :—
ते स्याम देववरुण...( ऋ० ७।६६।६ )
और इससे विमुक्त करता है :—
नू ष्टुत... ऋ० ४।१६।२१ )
जो अहीनों को युक्त करना और विमुक्त करना जानता
है। वह अहीन यज्ञ के सिलसिले को कायम रख सकता है।
चौबीसवें दिन जोड़ते हैं वह युक्ति है और अन्तिम अति-
रात्र के दिन अलग करते हैं यह विमुक्ति है।
अगर एकाह के मंत्रों से समाप्त करते हैं तो अहीन यज्ञ का
कृत्य नहीं हो सकता। अगर अहीन का कृत्य करके समाप्त
करते हैं तो जैसे थके बैल को अलग कर देते हैं, ऐसे ही यज-
मान भी यज्ञ से अलग हो जाता है। इसलिये एकाह और अहीन
कृत्यों से समाप्त करना चाहिये जैसे दूर की यात्रा करने वाले
मंजिल पर बैल बदल देते हैं। इस प्रकार यज्ञ सिलसिलेवार हो
जाता है और यजमान विश्राम ले लेते हैं।

चौथा अध्याय ] ३८९
दोनों सवनों में स्तोमों में नियत मंत्रों से एक या दो से
अधिक न बोले। अधिक बोलने से बड़े वन के समान हो जाता
है, तीसरे सवन में अपरिमित बोले क्योंकि स्वर्ग अपरिमित
है। स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये।
जो इस रहस्य को समझता है उसका अहीन यज्ञ आरंभ
होकर विना विघ्न के समाप्त होता है। (७)
२४—देवों ने वल ( कन्दरा ) में गायों को देखा। उन्होंने
यज्ञ के द्वारा उनको लेना चाहा। छठे दिन के द्वारा उन्होंने
इनको पा लिया। पहले सवन में नभाक ( खोदने का कुदाल )
द्वारा वल खोदा। फिर जब छिद्र हो गया तो पत्थरों को हटाया
और तीसरे सवन में वालखिल्य मंत्रों रूपी वज्र द्वारा 'वाचः
कूट' नामी एक पद से वल को तोड़ लिया और गायों को
निकाल लिया।
इस प्रकार यजमान प्रातः सवन में नभाक द्वारा वल को
तोड़ते हैं और उसके पत्थरों को ढीला कर लेते हैं। इसी लिये
होत्रक लोग प्रातः सवन में नाभाक तृचों को पढ़ते हैं। मैत्रा-
वरुण “यः ककुभो निधारयः” ( ८।४१।४-६ ) को, ब्राह्मणाच्छंसी
“पूर्वीष्ट इंद्रोपमातयः” ( ८।४०।६-११ ) को अच्छावाक “ताहि
मध्यं भराणा” ( ८।४०।३-५ ) को। तीसरे सवन में वालखिल्य
वज्र से और “वाचः कूट” एक पद द्वारा वल को खोद कर
गायों को पालते हैं। वालखिल्य सूक्त छः हैं। उनको तीन बारी
में पढ़ते हैं। पहले यह पद करके, फिर आधी आधी ऋचा
करके, फिर ऋचा वार ।
जब पद पद करके पढ़ता है तो हर प्रगाथ में एक पद
रखे। इस प्रकार के एक पद पाँच हैं। चार दशाह से लिये हैं
और एक महाव्रत से ।

३९० [ छठी पञ्चिका
महानामन पदों से आठ अक्षरों को जब जब आवश्यकता
हो पूरा कर लें। इतरों की परवाह नहीं।
जब आधे आधे मंत्र पढ़ें तो उन पाँच एकपदों को पढ़ें।
और महानाम्नी से आठ अक्षर पूरा कर लें।
जब ऋचावार बालखिल्यों को पढ़ें तो उन पाँच एकपदों
को पढ़ें और महानाम्नी मंत्रों से आठ अक्षर लेकर पूरा
कर लें।
जब छः बालखिल्यों को पहली बार पढ़ता है तो प्राण और
वाणी का विहार कर देता है। जब दूसरी बार पढ़ता है तो
आँख और मन को मिला देता है। जब तीसरी बार पढ़ता है
तो कानों और आत्मा को मिला देता है।
इस प्रकार विहार का सब काम समाप्त हो जाता है । और
बालखिल्य रूपी वज्र, तथा एक पद वाचःकूट और प्राणों का
निर्माण इन सब के सम्बन्ध का कार्य्य समाप्त हो जाता है।
बालखिल्य प्रगाथों को बिना विहार के (बिना दो सूक्तों
को मिलाये हुये चौथी बार पढ़ता है। प्रगाथ पशु हैं। पशुओं
की प्राप्ति के लिये। यहाँ बीच में एक पद नहीं मिलाना चाहिये।
अगर बीच में एक पद मिलायेगा तो 'वाचः कूट' के द्वारा
यजमान को पशुओं से अलग कर देगा उनको मारकर। यदि
किसी होत्रक को ऐसा करते देखे तो उससे कहे कि तुम ने
यजमान से पशुओं को मार कर अलग कर दिया। तुमने
उसको पशुओं से वंचित कर दिया। ऐसा हो ही जाता
है। इसलिये ऐसे अवसर पर एकपाद को मिलाना नहीं
चाहिये।
बालखिल्य के पिछले दो सूक्तों (७वां, ८वां) को पर्यास
के तौर पर जोड़ता है (मानों किसी बर्तन पर ढक्कन रख दिया)
इन दोनों को मिला देता है। वत्स के पुत्र सर्पि ने सुबल नामी