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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 592 में से

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पृष्ठ 80

६६ [ प्रथम पञ्चिका
जब प्रवर्ग्य पात्र रख दिया जाता है तो होता नीचे के दो
मंत्रों को पढ़ता है :—
श्येनो न योनिं सदनं धियाकृतं हिरण्ययमासदं देव एपति ।
एरिरन्त बर्हिषि प्रियं गिराऽश्वो न देवाँ अप्येति यज्ञियः ॥
(ऋ० ९।७१।६)
आस्मिनन्त्सप्तवात्वारोहंतु पूर्व्वारुहः । नृषिहं दीर्घश्रुत्तमं इन्द्रस्य
घर्मो अतिथिः ॥ (आश्व० ४।७)
दिन के किसी भाग में प्रवर्ग्यपात्र को उठावे, तो यह मन्त्र
पढ़ा जाय :—
हविर्हविष्मो महि सद्म दैव्यं नभो वसानः परि यात्यध्वरम् । राजा
पवित्ररथो वाजमारुहः सहस्र भृष्टिर्जयसि श्रवो बृहत् ॥
(ऋ० ९।८३।५)
नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :—
सूयवसाद् भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम ।
अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥
(ऋ० १।१६४।४०)
यह जो घर्म है वह देवों का जोड़ा (स्त्री-पुरुष) है । यह जो
घर्म पात्र है वह शिश्न (उपस्थ) है । उसके दो शफ (अर्थात्
उठाने के दो लोहे के कड़े) अण्डकोश हैं । उपनयमनी (लकड़ी
का बना दूध पीने का चमचा) जंघा हैं । कपाल में जो दूध है वह
वीर्य है । यह वीर्य उत्पत्ति के निमित्त अग्नि में डाला जाता है
क्योंकि अग्नि इन देवों की योनि है । जो इस रहस्य को समझ
कर यज्ञ करता है, वह अग्नि देवयोनि की आहुतियों में से उत्पन्न
होता है क्योंकि अग्नि देव-योनि है । और ऋक् युक्त, यजुर्युक्त,
सामयुक्त, वेदयुक्त और ब्रह्ममय, अमर हो जाता है । (५)
२३—देव और असुर इन लोकों में लड़ने लगे । असुरों ने
इन लोकों को गढ़ बना लिया जैसे शक्तिशाली राजा किया करते