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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

प्रथम पञ्चिका ] ८१
को तीन बार बोलते हैं जिससे बारह हो जायं। क्योंकि साल
में बारह महीने होते हैं। प्रजापति संवत्सर है। जो इस रहस्य
को समझता है वह प्रजापति सम्बन्धी इन ऋचाओं द्वारा समृद्धि
को पाता है।
पहली और पिछली ऋचा को तीन २ बार पढ़ कर वह
यज्ञ के दोनों सिरों को बांध देता है जिससे यज्ञ काबू में रहे और
गिर न जाय। (३)
३०—( उत्तर वेदी में अग्नि और सोम को लाना )।
अग्नि और सोम के लाने पर अध्वर्यु होता को आदेश देता
है कि उचित मंत्र पढ़ो।
वह सविता के मंत्र को पढ़ता हैः—
सावीर्हि देव प्रथमाय पित्र वर्ष्माणमस्मै वरिमाणमस्मै ।
अथ स्मभ्यं सवितर्वार्याणि दिवोदिव आ सुवा भूरि पश्वः ॥
(अथर्व ७।१४।३, आश्व० श्रौ० ४।१० )
यहां प्रश्न होता है कि जब अग्नि और सोम के लाने का
प्रसंग है तो सविता का मंत्र क्यों पढ़ा गया। ( इसका उत्तर
यह है ) कि सविता प्रसव का स्वामी है। इस मंत्र को पढ़कर
( अग्नि और सोम ) दोनों को सविता द्वारा उत्पन्न कराते हैं।
इस लिये सविता का मंत्र पढ़ते हैं।
अब वह ब्रह्मणस्पति की ऋचा पढ़ता है :—
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्रदेव्येतु सूनृता ।
अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥
( ऋ० १।४०।३ )
यहां प्रश्न होता है कि जब अग्नि और सोम के लाने का
प्रसंग है तो ब्रह्मणस्पति का मंत्र क्यों पढ़ते हैं। ( उत्तर यह है )
कि बृहस्पति ही ब्रह्मा है। इस मंत्र को पढ़कर ब्रह्मा को ( अग्नि
और सोम ) दोनों का पुरोगव अर्थात् नेता बना देता है और
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