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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ
अध्याय ३
पृष्ठ 442स्थायी लिंक
अध्याय ३
१३—इक्ष्वाकु वंश के वेधस राजा का पुत्र राजा हरिश्चन्द्र
निस्सन्तान था। उसकी सौ पत्नियां थीं। परन्तु उसके कोई पुत्र
न हुआ। उसके घर में पर्वत और नारद दो ऋषि रहते थे।
उसने नारद से पूछा :—
“सभी पुत्र की इच्छा करते हैं, ज्ञानी हों या अज्ञानी। हे
नारद, बताओ पुत्र से क्या लाभ होता है?”
नारद ने इस एक श्लोक का दस श्लोकों में उत्तर दिया :—
(१) अगर पिता जीते हुये, पुत्र का मुख देख ले तो उस
का ऋण छूट जाता है और वह अमर हो जाता है।
(२) प्राणियों के लिये जितने पृथिवी में भोग हैं, जितने
अग्नि में और जितने जलों में, उनसे भी अधिक पिता के लिये
पुत्र में।
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