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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 592 में से

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पृष्ठ 90

७६ [ प्रथम पञ्चिका
अब होता पढ़ता है :-
इला यास्त्वा पदे वयं नाभा पृथिव्या अधि। जातवेदो निधीमह्यग्ने
हव्याय वोह्लवे ॥ (ऋ० ३।२६।४)
(हे जातवेद अग्नि हम तुझको पृथिवी की नाभि में इला के
स्थान में हवि के ले जाने के लिये रखते हैं)। "इला के पद"
का अर्थ है उत्तरवेदी की नाभि। 'जातवेदोनिधीमहि' का अर्थ
है कि 'वह अग्नि हवि को ले जायगा।'
अब होता पढ़ता है :-
अग्ने विश्वेभिः स्वनीक देवैरूर्णावन्तं प्रथमः सीदयोनिम्। कुलायिनं
घृतवन्तं सवित्रे यज्ञं नय यजमानाय साधु ॥ (ऋ० ६।१५।१६)
(हे अग्नि सब देवों के साथ पहले अपनी ऊन से भरी हुई
योनि या स्थान में बैठ। सविता रूपी यजमानों के लिये घी वाले
यज्ञ की आहुतियों को ले जा)। 'अग्ने विश्वेभिः' कह कर वह
अग्नि को अन्य देवों के साथ बिठाता है। "कुलायिनं घृत वन्तं
सवित्रे" कह कर देवदास की लकड़ियों, गुग्गल, ऊन, और सुगन्ध
युक्त घास से अग्नि के लिये यज्ञ में चिड़िया के घोंसले के समान
स्थान बनाया जाता है, 'यज्ञं नय यजमानाय साधु' कह कर यज्ञ
को सीधा अग्नि पर रखता है।
अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :-
सीद होतः स्व उ लोके चिकित्वान् त्सादय यज्ञं सुकृतस्य योनौ।
देवावीर्देवान् हविषा यजास्यग्ने बृहद् यजमाने वयो धाः ॥
(ऋ० ३।२६।८)
[हे होता (अर्थात् अग्नि) अपने स्थान में बैठ, हे प्रसिद्ध
(अग्नि) सुकृत अर्थात् अच्छी तरह बने हुये घोंसले के सूराख
(योनि) में यज्ञ को बिठाल। हवि के साथ देवों के पास जाने
वाले अग्नि! देवों के लिये मन्त्र बोल (यज)। हे अग्नि यज-
मान के लिये वृद्धि और आयु को धारण करा]।