ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] ६७
हैं । इस (पृथ्वी) को लोहे का दुर्ग बनाया, अन्त-
रिक्ष को चाँदी का, द्यौ लोक को सोने का । इस प्रकार इन्होंने
इन लोकों को दुर्ग बनाया । देवों ने कहा "इन असुरों ने इन
लोकों को दुर्ग बना लिया, अब हमको चाहिये कि इनके
मुकाबिले में और लोक बना लें।" ऐसा कह कर उन्होंने
मुकाबिले में पृथ्वी से 'सदस्' अर्थात् बैठने का स्थान बनाया ।
अन्तरिक्ष से "अग्नीध्रम्" अर्थात् अग्नि रखने का स्थान (कुण्ड)
बनाया, और द्यौ से दो हविर्धान (हवि रखने के पात्र) बनाये ।
इस प्रकार उन्होंने इन लोकों के मुकाविले में लोक बनाये । देवों
ने कहा, " 'उपसद्' नामक आहुतियाँ दें ।" क्योंकि उपसद् के
द्वारा बड़े पुर को जीत लेते हैं ('उपसद्' का अर्थ है 'घेरा' या
'मुहासिरा' जो एक शत्रु किसी नगर को चारों ओर से घेर लेता
है) । उन्होंने ऐसा ही किया । जब पहली 'उपसद्' आहुति दी
तो उन असुरों को इस पृथ्वी से निकाल दिया । दूसरी आहुति
में अन्तरिक्ष से, तीसरी में द्यौलोक से । इस प्रकार उनको इन
लोकों से निकाल दिया । यह असुर इन लोकों से निकल कर
ऋतुओं में जा घुसे । उन देवताओं ने कहा, "आओ", 'उपसद्
नामी आहुतियों को दें ।' यह उपसद् तीन हैं । एक-एक को दो-
दो बार पढ़ते हैं । इस प्रकार छः हुये । छः ही ऋतुएँ होती हैं ।
इस प्रकार उनको उन ऋतुओं में से निकाल दिया । ऋतुओं से
निकल कर यह असुर मासों (महीनों) में चले गये । देवों ने
कहा, "उपसद् आहुतियां दें ।" इस प्रकार उन्होंने आहुतियां
दीं । छः उपसद् थे । एक एक की दो दो बार आहुति दी । बारह
हो गईं । बारह ही महीने होते हैं । इस प्रकार बारह महीनों से
असुरों को निकाल दिया । असुर महीनों से निकल कर पक्षों (अर्द्ध
मास) में चले गये । अब देवों ने कहा "उपसद् आहुतियां दें" ।
ऐसा ही किया । उपसद् बारह थे । एक एक की दो दो आहुतियां