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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 592 में से

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पृष्ठ 93

पाँचवाँ अध्याय ] ७९
द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम् । यज्ञं देवेषु यच्छताम् ॥
( ऋ० २।४१।२० )
आ वामुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु यज्ञियाः । इहाद्य सोम पीतये ॥
( ऋ० २।४१।२१ )
यह द्यावा-पृथिवी के मंत्र हैं ।
यहां प्रश्न होता है कि जब हविर्धानों के ले जाने का प्रसंग
था तो द्यावा-पृथिवी की तीन ऋचायें क्यों बोली गईं । इसका
उत्तर यह है कि द्यौ और पृथिवी देवों के दो हविर्धान हैं । जो
कुछ हवि यहां दिया जाता है वह सब द्यौ और पृथिवी के बीच
में ही होता है । इसलिये द्यावा-पृथिवी बोधक ऋचायें पढ़ी गईं ।
यमे इव यतमाने यदैतं प्र वां भरन् मानुषा देवयन्तः ।
आ सीदतं स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवतमिन्दवे नः ॥
( ऋ० १०।१३।२ )
‘यमे इव यतमाने यदैतं’ का अर्थ है कि ‘दोनों हविर्धान
जुड़वां बहनों के समान हाथ पसार कर चलते हैं’ । “प्रवां भरन्
मानुषा देवयन्तः” का अर्थ है कि ‘आदमी देवों की पूजा करते
हुये तुम दोनों को लाते हैं’, ‘स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवत-
मिन्दवे नः’ में ‘इन्दु’ के नाम से सोम का वर्णन है । इस आधी
ऋचा को पढ़ कर सोम राजा के बैठने का स्थान ठीक करता है ।
अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं वचो यतस्रुचा मिथुना या सपर्यतः ।
असंयत्तौ व्रते ते क्षेति पुष्यति भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वते ॥
( ऋ० १।८३।३ )
यह जो ‘उक्थ्यं वचः’ है वह दो हविर्धानों का तीसरा ढकना
है । क्योंकि ‘उक्थ्यंवचः’ यज्ञ का कर्म है इसलिये ऐसा कह कर
यज्ञ की उन्नति करता है ।
मंत्र में “यतस्रुचा……पुष्यति” तक में ‘यत्त’ वाले पद से
जो ‘क्रूरता’ प्रकट होती है उसका “असंयत्त”, पद से शमन करता