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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 592 में से

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पृष्ठ 96

८२ [प्रथम पत्रिका
यजमान ब्रह्म से युक्त होकर हानि नहीं उठाता। 'प्रदे॒व्ये॑तु सूनृता'
से यज्ञ को 'सूनृत' या भद्र युक्त कर देता है। इसलिये ब्रह्मण-
स्पति का मंत्र पढ़ता है।
अब अग्नि की गायत्री छन्द की तीन ऋचाओं को पढ़ता है:-
होता॑ दे॒वो अम॑र्त्यः पुर॒स्तादे॑ति मा॒यया॑। वि॒दथा॑नि प्र॒चोद॑यन् ॥
(ऋ० ३।२७।७)
वा॒जी वाजे॑षु धीयतेऽध्व॒रेषु॒ प्र णी॑यते। विप्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ सा॒धन॑:॥
(ऋ० ३।२७।८)
धि॒या च॑क्रे वरे॒ण्यो भूतानां॒ गर्भ॑माद॒धे। दक्ष॑स्य पि॒तरं॑ त॒ना॥
(ऋ० ३।२७।६)
जब सोमराजा को (उत्तर वेदी पर) एक बार ले गये तो
असुरों और राक्षसों ने उसको 'सदस्' और हविर्धानों के बीच
में मारना चाहा। अग्नि ने माया से उसको बचा लिया। जैसा
कि मंत्र में है “पुरस्तादेति मायया” (माया से आगे २ चलता
है)। अग्नि ने उसे इस तरह बचाया। इसलिये (सोम के)
आगे २ अग्नि को ले चलते हैं।
अब नीचे लिखे तीन मंत्र और एक मंत्र बोलते हैं:—
(१) उप॑ त्वाग्ने दि॒वे दि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धिया व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि।
(२) राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्ध॑मानं॒ स्वे दमे॑॥
(३) स न॑: पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥
(ऋ० १।१।७-६)
(४) उप॑ प्रि॒यं प॑नि॒प्नतं॒ युवान॒माहु॑तीवृधम्॥ अगन्म बिभ्रतो नमः॥
(ऋ० ६।१६।२६)
क्योंकि यह दो अग्नियां, एक जो पहले लाई गई और दूसरी
जो पीछे लाई गई, यदि आपस में लड़ जायं तो यजमान को
कष्ट देंगी। इन तीन और एक मंत्रों को पढ़ कर वह उन में