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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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७८ [ प्रथम पञ्चिका
अग्नि देवों का गोप या ग्वाला है। जो इस रहस्य को समझ
कर अग्नि-प्रणयन के कृत्य को इस मंत्र से समाप्त करता है वह
अपने और यजमान के लिये अग्नि को हर स्थान पर अपना
गोप या रक्षक पाता है और साल भर तक कल्याण लाभ
करता है।
वह इन आठ मंत्रों को पढ़ता है जो रूप-समृद्ध हैं। जिसमें
रूप-समृद्धता होती है अर्थात् जो मंत्र पढ़ा जाय उसमें वही क्रिया
वर्णित हो उसी से यज्ञ सफल होता है। इनमें पहला तीन बार
पढ़ा जाता है और आख़िरी तीन बार। इस प्रकार बारह हो जाते
हैं। साल में बारह मास होते हैं। संवत्सर को प्रजापति कहते
हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह इन प्रजापति-सम्बन्धी
ऋचाओं द्वारा सुखी होता है। पहली और पिछली ऋचा को
तीन बार पढ़ कर वह यज्ञ के दोनों सिरों को बांधता है जिससे
यज्ञ काबू में रहे और गिर न पड़े। (२)
२९—अध्वर्यु होता को आदेश देता है कि दोनों हविर्धानों
(वह बर्तन जिसमें हवि रक्खा जाय) के ले जाने के लिये उचित
मंत्र पढ़ो।
वह पढ़ता है।
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरेः।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥
(ऋ० १०।१३।१)
ये देव ब्रह्म से युक्त हुये। दोनों हविर्धानों को ब्रह्म से युक्त
करता है। इस प्रकार ब्रह्म की शक्ति पाकर विपत्ति में नहीं
पड़ता।
अब नीचे के तीन मंत्रों (तृचों) को बोलता है :-
प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा युवामिदा वृणीमहे। अग्निं च हव्यवाहनम् ॥
(ऋ० २।४१।१६)