सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

काण्ड) थे वह आकाश में चमकने वाला तीन फल वाला बाण

तीसरा अध्याय ] १९९
काण्ड) थे वह आकाश में चमकने वाला तीन फल वाला बाण
हो गया। प्रजापति का जो वीर्य बहा वह एक सरोवर बन
गया। देवों ने कहा, "प्रजापति का यह वीर्य्य दूषित न हो
( "मादुषत्" )। देवों ने 'मादुषत्' जो कहा तो "मादुषम्" हो
गया। यह "मादुष" का "मादुषत्व" है । यह जो मादुषम् था
यही मानुषम् हुआ । "मानुष" इसलिये कहते हैं कि वह दोष
के योग्य नहीं है अर्थात् उसमें दोष नहीं आने चाहिये ।
"मादुष" परोक्ष शब्द है। देव लोग परोक्षप्रिय होते हैं। (९)
३४-देवों ने इस वीर्य को अग्नि से घेर दिया । मरुतों ने
उसे हिलाया । परन्तु अग्नि ने उसको चलाया नहीं। उन्होंने
उसको वैश्वानर अग्नि से घेर दिया। मरुतों ने उसे हिलाया,
वैश्वानर अग्नि ने उसे चलाया । प्रजापति के वीर्य से जो
पहली चिनगारी उठी उसका आदित्य बना। जो दूसरी उठी
उसका भृगु बना। वरुण ने भृगु को लड़का मान लिया ।
इसीलिये भृगु को वारुणि कहते हैं । तीसरी जो चिनगारी उठी
उसके आदित्य हो गये । जो अंगारे थे उनका आङ्गिरस हुआ ।
जो अंगारे पहले न शांत होकर फिर उदीप्त हो गये। वे बृह-
स्पति हो गये। जो काली-काली अधजली राख रह गई वह
काले पशु बन गई। जो भूमि का भाग लाल हो गया था उसके
लाल पशु बन गये। जो भस्म रह गई उसका एक ऐसा व्यक्ति
बना जो इधर उधर फिरा और बारहसिंगा, भैंसा, हिरन, ऊँट,
गधा और जंगली जानवर बन गये ।
भूतवान ने इन पशुओं से कहा, "यह मेरा है। यह जो
इस जगह छूटा हुआ है मेरा है।" उन्होंने इस रुद्र सम्बन्धी
ऋचा को पढ़ कर उससे उसका भाग छुड़ा लिया :-
आ ते पितर्मरुतां सुम्नमेतु मा नः सूर्य्यस्य सन्दृशो युयोथाः। अभि
नो वीरो अर्व्वति क्षमेत प्र जायेमहि रुद्र प्रजाभिः। (ऋ० २।३३।१)

२०० [ तीसरी पञ्चिका
“हे मरुतों के पिता, ऐसा न हो कि हम सूर्य के दर्शन
न कर सकें। हे वीर रुद्र, ऐसा कर कि हम प्रजाओं से युक्त हो
जायें अर्थात् हमारे सन्तान उत्पन्न हों।”
“अभि नो वीरो अर्वति क्षमेत” के स्थान में “त्वं नो वीरो
अर्वति क्षमेथा” पढ़ना चाहिये। यदि “अभि” न कहेगा तो
यह देवता प्रजा के विरुद्ध (अभि) न होगा। “रुद्र” के स्थान
में 'रुद्रिय' कहना चाहिये जिससे इस नाम का भयानकपन न
रहे। यदि इसको हानिकारक समझे तो केवल नीचे का मन्त्र
पढ़ दे :—
शं नः करत्यर्वते सुगं मेषाय मेष्ये । नृभ्यो नारिभ्यो गवे ॥
(ऋ० १।४३।६)
यह मंत्र 'शं' से आरम्भ होता है और कल्याणकारक है।
'नृभ्यो' का अर्थ है “पुरुषों के लिये” “नारिभ्यो” से स्त्रियों से
तात्पर्य है। यह सब के कल्याण के लिये हैं।
यह रुद्र का मंत्र है परन्तु अनिरुक्त है अर्थात् इसमें रुद्र
का नाम नहीं आया। इसलिये यह सौ वर्ष की आयु का दाता
है। जो इस रहस्य को समझता है वह सौ वर्ष की आयु प्राप्त
करता है।
यह मंत्र गायत्री छन्द में है। गायत्री ब्राह्मण है। इस
प्रकार वह ब्राह्मण द्वारा रुद्र की उपासना करता है (जिससे
रुद्र का वीभत्सपन दूर हो जाय) । (१०)
३५—अग्नि-मारुत शस्त्र को वैश्वानरीय सूक्त से आरम्भ
करता है। यह जो वीर्य बहा वह वैश्वानर है। इसलिये होता
अग्नि-मारुत शस्त्र को वैश्वानरीय सूक्त से आरम्भ करता है।
पहली ऋचा को बिना ठहरे हुये पढ़े। जो अग्नि-मारुत शस्त्र
को पढ़ता है वह आग की भयानक लपटों को शांत कर देता
है। सांस साध कर अग्नि को पार करे। कहीं कुछ शब्द

तीसरा अध्याय ] २०१
बोलने में भूल न हो जाय इससे उसको चाहिये कि किसी दूसरे
आदमी को शोधने के लिये नियत कर दे । मानो वह इस
संशोधक को पुल के तौर पर मान कर अग्नि को पार करता
है। इसमें कोई भूल होनी न चाहिये इसलिए जब होता मंत्र
बोले तो कोई उसकी अशुद्धि को शुद्ध करने वाला होना चाहिये ।
जो वीर्य बहा वह मरुत है। उसको हिला कर इन्होंने बहाया ।
इसलिये वह मरुतों का सूक्त पढ़ता है ।
बीच में योनि (स्तोत्रिय) और अनुरूप प्रगाथ का पाठ
करे ।
यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियं धियं वो देवया उ दधिध्वे ।
आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः ॥
वत्रासो न ये स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः । सहस्रि-
यासो अपां नोर्मय आस्रा गावो वन्धासो नोक्षणः ॥
( ऋ० १।१६८।१-२ )
यह योनि हुई ।
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद् वा सिञ्चध्वमुप
पृणध्वमादिद्धो देव ओहते ॥
तं होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत । दधाति रत्नं
विधते सुवीर्यंमग्निर्जनाय दाशुषे ॥ ( ऋ० ७।१६।११-१२ )
यह अनुरूप हुआ ।
बीच में योनि कहने का कारण यह है कि स्त्रियों की योनि
बीच में होती है । (वैश्वानरीय और अग्नि-मारुतीय) दो
सूक्तों को पढ़ने के बाद योनि इसलिये पढ़ी जाती है कि उसमें
पुरुष इन्द्रिय को स्थापित करता है, जिससे प्रजा उत्पन्न हो ।
जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं वाला
होता है । (११)
३६—जातवेद के सूक्त को पढ़ता है। जब प्रजापति ने

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
२०२ [ तीसरी पञ्चिका
सृष्टि बनाई तो वे सब मुँह फेर कर चले गये और पीछे न
लौटे। तब उसने इनको चारों ओर आग से घेर दिया। तब
उन्होंने अग्नि की ओर मुख किया। जब उन्होंने अग्नि की
ओर मुख किया तो प्रजापति ने कहा, "इन उत्पन्न हुये (जात)
को मैंने इस अग्नि के द्वारा पाया (अविदम्) ।" इससे जात-
वेद सूक्त हुआ। इसीलिये अंगिन को जातवेद कहते हैं।
अग्नि से घिरे हुये प्राणी चल न सकते थे। वे अंगारों के
बीच में खड़े थे। प्रजापति ने उन पर जल छिड़का। इसलिये
जातवेद सूक्त को पढ़ने के बाद जल के सूक्त को पढ़ता है।
“आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता” इति (ऋ० १०।६)
यह इसलिये पढ़ना चाहिये मानो अग्नि को शान्त कर रहा
है। प्रजापति ने जल छिड़कने के बाद कहा कि यह प्राणी मेरे
निज के हैं। उसने उनमें अहिर्बुध्न्य द्वारा परोक्ष तेज धारण
करा दिया। यह अहिर्बुध्न्य गार्हपत्य अग्नि है। अहिर्बुध्न्य का
मंत्र पढ़कर वह परोक्ष तेज धारण कराता है। इसीलिये कहते
हैं कि जो आहुति देता है वह आहुति न देने वाले से अधिक
तेज वाला है। (१२)
३७—गृहपति अग्नि के लिये ( अहिर्बुध्न्य मंत्र पढ़ कर )
देव पत्नियों के लिये मंत्र पढ़ता है। क्योंकि यजमान की पत्नी
गार्हपत्य अग्नि के पीछे बैठती है।
कुछ लोग कहते हैं कि पहले राका का मंत्र पढ़ना चाहिये
क्योंकि सोमपान का पहला अधिकार बहिन का है। परन्तु यह
नहीं चाहिये। पहले देवपत्नियों के लिये मंत्र पढ़ना चाहिये।
ऐसा करने से गार्हपत्य अग्नि पत्नियों में वीर्य्य धारण कराता
है। गार्हपत्य अग्नि के द्वारा होता ने पत्नियों को उत्पत्ति के अर्थ
वीर्य से प्रत्यक्षरूप से सम्पन्न कर दिया । जो इस रहस्य को
समझता है वह पशुओं और सन्तान से युक्त होता है। बहिन
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

तीसरा अध्याय ] २०३
उसी पेट से जन्मती है और स्त्री दूसरे पेट से, इसलिये स्त्री को
पहले भोजन देना चाहिये ।
अब वह राका का मंत्र पढ़ता है । राका ही पुरुष की इन्द्रिय
की सीवन को सिया करती है । जो इस रहस्य को समझता है
उसके पुत्र ( पुमान् सन्तान ) उत्पन्न होते हैं ।
अब पावीरवी मंत्र को पढ़ता है । वाणी ही सरस्वती
पावीरवी है । इसको पढ़कर वह यजमान में वाणी धारण
कराता है । इस पर प्रश्न होता है कि पहले यम का मंत्र पढ़ें
या पितरों का । पहले यम का पढ़ाना चाहिये :—
इमं यम प्रस्तर मा हि सीदाऽङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः । आ त्वा
मंत्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन् हविषा मादयस्व । ( ऋ० १०।१४।४ )
राजा को पहले पीने का अधिकार है । इसलिये यम का मंत्र
ही पहले पढ़े ।
इसके बाद ही काव्यों का मंत्र पढ़े :—
मातली कव्यैर्यमो अङ्गिरोभिर्बृहस्पति र्ऋक्वभिर्वावृधानः । यांश्चदेवा
वावृधुर्यं च देवान् त्स्वाहान्ये स्वधयान्येमदन्ति ॥ ( ऋ० १०।१४।३ )
काव्य देवों से छोटे और पितरों से बड़े हैं । इसलिये काव्यों
का मंत्र पढ़ने के बाद पितरों के तीन मंत्र पढ़ता है :—
( १ ) उदीरतामवर उत्परास उन् मध्यमाः पितरः सोम्यासः । असुं
य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु । ( ऋ० १०।१५।१ )
( २ ) आहं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च
विष्णोः । बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ।
( ऋ० १०।१५।३ )
( ३ ) इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः ।
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु ।
( ऋ० १०।१५।२ )

२०४ [ तीसरी पञ्चिका
अवर, पर, मध्यम इन सोम्य पितरों को बुलाकर वह सब
पितरों को प्रसन्न करता है, किसी को छोड़ता नहीं ।
दूसरे मंत्र में 'बर्हिषद्' से तात्पर्य यह है कि उनका प्रिय
धाम है। इस को पढ़ कर वह प्रिय घास के द्वारा उनको प्रसन्न
करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रिय धाम के द्वारा
फूलता फलता है।
"पितरों के नमस्कार" वाला मंत्र अन्त में पढ़ता है। इस
लिये अन्त में पितरों को नमस्कार होता है "पितृभ्यो नमः"।
यहां प्रश्न होता है कि इसके पहले आहाव अर्थात् 'शोंसावोम्'
कहना चाहिये या मंत्र को बिना आहाव के पढ़ना चाहिये ?
'आहाव' के साथ पढ़ना चाहिये। पितृयज्ञ में जो बात अधूरी
रह गई है उसे पूरा करना है। 'आहाव' पढ़ने से अधूरी क्रिया
पूरी हो जाती है। इसलिये 'आहाव' पढ़ना आवश्यक है। (१३)
३८—अब इन्द्र के अनुपान के मंत्रों को पढ़ता है :--
स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवाँ उतायम्।
उतोन्वस्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु ॥१॥
अयं स्वादुरिहमदिष्ट आस यस्येन्द्रो वृत्रहत्ये ममाद । पुरुणि यश्च्यौत्ना
शम्बरस्य वि नवतिं नव च देह्योहन् ॥२॥
अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुशतीमजीगः । अयं षडुर्वीर-
मिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे ॥३॥
अयं स यो वरिमार्णं पृथिव्या वर्ष्माणं दिवो अकृणोदयं सः । अयं
पीयूपं तिसृषु प्रवत्सु सोमो दाधारोर्वन्तरिक्षम् ॥४॥ ( ६।४७।१-४)
इन्हीं से इन्द्र ने तीसरे सवन के बाद सोम का अनुपान
किया था। इसलिये यह अनुपानीय मंत्र कहलाते हैं। जब
होता इन मंत्रों को पढ़ता है तो मानो देवता उस समय अनुपान
करके प्रसन्न होते हैं। जब होता 'आहाव' कहता है तो अध्वर्यु
'मद्' धातु से निकला हुआ शब्द बोलता है।

तीसरा अध्याय ] २०५
अब विष्णु और वरुण की ऋचा को पढ़ता है :-
ययो रोजसा स्कभिता रजांसि वीर्यैर्भिर्वीरतमा । शविष्ठया पत्येते
अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन्वरुणा पूर्वहूतौ ॥ ֎
"वे दो जिन्होंने अन्तरिक्ष बनाया, जो बहुत बलवान
और पराक्रमशील हैं, जो बिना किसी रोक टोक के राज करते
हैं ऐसे विष्णु और वरुण पहले बुलावे पर आवें।"
विष्णु यज्ञ के दोषों को दूर करता है और वरुण ठीक-ठीक
यज्ञ के फल पर आधिपत्य रखता है। यह दोनों को शान्त करने
के लिये है।
अब वह विष्णु की ऋचा बोलता है :-
विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो
अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ॥ (ऋ० १।१५४।१)
विष्णु यज्ञ में मति के तुल्य है। जैसे किसान कृषि की
भूल चूक को ठीक करता है, या जैसे राजा न्याय दरबार की
भूल चूक को ठीक करता है, ऐसे ही होता इस मंत्र को पढ़ कर
यज्ञ की भूल चूक को ठीक करता है।
अब वह प्रजापति के इस मंत्र को पढ़ता है :-
तन्तुं तन्वन् रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान् ।
अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम् ॥
(ऋ० १०।५३।६)
इसको पढ़ कर होता यजमान के लिये सन्तान को तानता
है। 'ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धियाकृतान्' यहाँ प्रकाशयुक्त मार्गों
से तात्पर्य "देवयानों" का है। इन्हीं को वह यजमान के लिये
ठीक करता है।
֎ पता नहीं कि यह मंत्र कहाँ का है।